Administrative Lex, Animal Juriprudence, Civil Law, Criminal Lex

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 28

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 28 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कैसे अंग्रेजों ने “न्याय” को मजिस्ट्रेट के विवेक की बेड़ियों में जकड़ रखा था। यह धारा दिखाती है कि नुकसान की भरपाई करना शासन की प्राथमिकता नहीं थी, बल्कि यह केवल एक विकल्प (option) था जिसे मजिस्ट्रेट अपनी मर्जी से चुन सकता था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:

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पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 27

रखवाले के विरुद्ध शिकायतों की जांच का अधिकार स्थानीय निकाय को दिया जाना चाहिए। स्थानीय ग्राम पंचायत या नगर निकाय की “पशु कल्याण समिति” को रखवाले के कार्यों का साप्ताहिक ऑडिट करने और लापरवाही पाए जाने पर तुरंत दंड प्रस्तावित करने का अधिकार होना चाहिए। स्थानीय निगरानी से जवाबदेही बढ़ेगी। ऑडिट एवं जांच के बाद स्थानीय निकाय जो भी निर्णय दे भले ही उसके लिए अपील के अधिकार कांजी हौस के कर्मचारियों को दिए जाने चाहिए।

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पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 26

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 26 पर विश्लेषणात्मक आलोचना इस कानून के एक और भेदभावपूर्ण और दमनकारी पहलू को सामने लाती है। विशेष रूप से सुअरों का उल्लेख करना और फिर राज्य सरकार को जुर्माने की राशि मनमाने ढंग से बढ़ाने की शक्ति देना, औपनिवेशिक तंत्र की उस मानसिकता को दर्शाता है जो सामाजिक रूप से वंचित वर्गों को लक्षित करती थी। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:

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पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 25

यह वसूली तीन शर्तों में से किसी के भी तहत की जा सकती थी। पहली चाहे पशुओं को अतिचार करते हुए मौके पर ही ज़ब्त किया गया हो या नहीं; दूसरी चाहे पशु अपराध के लिए सिद्धदोष (दोषी पाए गए) व्यक्ति की संपत्ति हों और तीसरी शर्त चाहे अतिचार किए जाने के समय वे पशु दोषी व्यक्ति के भारसाधीन ही क्यों न हों। इस प्रावधान में ब्रिटिश नीति का प्रभाव कठोर और प्रतिशोधात्मक वित्तीय दण्ड थोपने में और न्याय के सिद्धांतों को दरकिनार करके राजस्व वसूली को प्राथमिकता देने में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

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पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 24

जो कोई भी व्यक्ति ज़ब्ती के बाद पशुओं को कांजी हौस से या उस व्यक्ति से जो पशुओं को कांजी हौस ले जा रहा है या ले जाने वाला है और जो अधिनियम के तहत कानूनी शक्ति का उपयोग कर रहा है उससे छुड़ाएगा उसे इस धारा के तहत दोषी माना जाता था। उपरोक्त अपराधों का दोषी पाए जाने पर, व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष सिद्धदोष होने पर, छह मास (छह महीने) तक के कारावास (जेल) से, या पाँच सौ रुपये तक के जुर्माने से, अथवा दोनों से दंडित किया जाता था। इस अधिनियम मे प्रतिकार केवल एक सौ रुपये तक ही मिलता था पर अपने ही पशुओं को छुड़ाने के प्रयत्न को एक दोष बताकर पाच सौ रुपयों तक का दंड लगाया गया हैं। इससे यही साबित होता हैं की अंग्रेज केवल अपनी तिजोरी भरना चाहते थे।

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पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 23

ब्रिटिश काल में वसूली की यह कठोरता केवल शासन की शक्ति दिखाने के लिए थी। नए अधिनियम में “बलपूर्वक प्रवर्तन” के बजाय “न्यायसंगत उत्तरदायित्व” की नीति अपनानी चाहिए। वसूली का मुख्य उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि पीड़ित पशुपालक की हुई हानि की तुरंत भरपाई करना होना चाहिए। यदि दोषी कोई सरकारी कर्मचारी है, तो वसूली उसके वेतन से सीधे की जानी चाहिए।

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पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 22

अवैध अभिग्रहण सिद्ध होने पर “पशु मित्रों” की रिपोर्ट को साक्ष्य माना जाना चाहिए। पुलिस का कार्य यह सुनिश्चित करना होगा कि मजिस्ट्रेट द्वारा आदेशित प्रतिकर की राशि दोषी व्यक्ति से तुरंत वसूल कर पीड़ित मालिक को दिलाई जाए। दोषी सरकारी कर्मचारी होने पर स्थानीय पशु कल्याण विभाग को उसकी रिपोर्ट स्थानीय निकाय एवं डिजिटल पोर्टल पर भेजनी चाहिए।

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पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 21

मजिस्ट्रेट, जो औपनिवेशिक तंत्र का अधिकारी था, अक्सर गरीब किसान या पशुपालक की शिकायत पर आसानी से विश्वास नहीं करता था। शिकायतकर्ता को अपनी बात को कानूनी रूप से साबित करने के लिए तुरंत गवाहों और सबूतों की आवश्यकता होती थी, जबकि विरोध पक्ष (अभिग्रहणकर्ता) अक्सर स्थानीय ज़मींदार या प्रभावशाली व्यक्ति होता था। इस प्रक्रिया ने गरीब भारतीय शिकायतकर्ता को शुरुआत से ही कमजोर और अविश्वसनीय स्थिति में डाल दिया।

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पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 20

ग्रामीण भारत में, जहाँ संचार और परिवहन सीमित थे, और जहाँ पशुपालक अक्सर दूर-दराज के क्षेत्रों में होते थे, उनके लिए ज़ब्ती के बारे में जानना, पैसा जुटाना, और फिर मजिस्ट्रेट के कार्यालय तक पहुँचकर कानूनी शिकायत दर्ज करना, विशेषकर दस दिन के भीतर, लगभग असंभव था। उस समय अक्सर लोगों को पैदल चलना पड़ता था और निरक्षरता के कारण कई मामलों के बारे मे कहा शिकायत करना यह भी पता नहीं होता था।

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