21.1 मूल प्रावधान
21. परिवाद पर प्रक्रिया – परिवाद स्वयं परिवादी द्वारा या परिस्थितियों से वैयक्तिक रूप से परिचित किसी अभिकर्ता द्वारा किया जा सकेगा। वह लिखित या मौखिक हो सकता है। यदि वह मौखिक हो तो उसका सार मजिस्ट्रेट द्वारा लिख लिया जाएगा।
यदि परिवादी या उसके अभिकर्ता की परीक्षा पर मजिस्ट्रेट यह विश्वास करने का कारण देखता है कि परिवाद सुआधारित है तो वह उस व्यक्ति को समन करेगा जिसके खिलाफ परिवाद किया गया हो और मामले की जांच करेगा।
21.2 विश्लेषणात्मक आलोचना
इस धारा के अनुसार परिवाद दर्ज करने और उसकी जाँच शुरू करने की प्रक्रिया के दो मुख्य चरण हैं:
परिवाद की प्रकृति:
शिकायत या तो स्वयं परिवादी (शिकायतकर्ता) द्वारा की जा सकती थी, या किसी ऐसे अभिकर्ता (एजेंट) द्वारा की जा सकती थी जो परिस्थितियों से व्यक्तिगत रूप से परिचित हो। शिकायत लिखित या मौखिक हो सकती थी। यदि यह मौखिक थी, तो मजिस्ट्रेट उसका सारांश लिखता था।
मजिस्ट्रेट द्वारा कार्रवाई:
मजिस्ट्रेट पहले परिवादी या उसके अभिकर्ता की परीक्षा (जाँच-पड़ताल) करता था। यदि मजिस्ट्रेट इस जाँच के बाद विश्वास करने का कारण देखता था कि परिवाद सुआधारित (well-founded) थी यानी, उसमें सच्चाई थी, तो वह आगे की कार्रवाई करता था। ‘सुआधारित’ पाए जाने पर, मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को समन (Summon) करेगा जिसके खिलाफ शिकायत की गई है और मामले की जाँच-पड़ताल शुरू करेगा।
मजिस्ट्रेट, जो औपनिवेशिक तंत्र का अधिकारी था, अक्सर गरीब किसान या पशुपालक की शिकायत पर आसानी से विश्वास नहीं करता था। शिकायतकर्ता को अपनी बात को कानूनी रूप से साबित करने के लिए तुरंत गवाहों और सबूतों की आवश्यकता होती थी, जबकि विरोध पक्ष (अभिग्रहणकर्ता) अक्सर स्थानीय ज़मींदार या प्रभावशाली व्यक्ति होता था। इस प्रक्रिया ने गरीब भारतीय शिकायतकर्ता को शुरुआत से ही कमजोर और अविश्वसनीय स्थिति में डाल दिया।
न्याय के लिए शिकायत करने हेतु पारंपरिक भारतीय परिवेश मे स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं को पहले शक्तियां होती थी, इससे गाव के मामले गाव मे ही सुलझ जाते थे और बात ज्यादा समय तक प्रलंबित नहीं रहती थी। पर अंग्रेजी न्याय व्यवस्था बनाई ही ऐसी गई थी की न्याय मे देरी हो। ऐसे मे कई बार इस कानून के तहत होनेवाली शिकायातो का निवारण होने तक जब्त किए हुए पशु कुपोषण का शिकार होकर या तो कमजोर हो जाते थे या मर जाते थे।
21.3 संशोधन हेतु सुझाव
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 21 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कैसे अंग्रेजों ने “न्याय की प्रक्रिया” को ही एक दंड में बदल दिया था। मजिस्ट्रेट द्वारा मौखिक शिकायत का सार लिखना और फिर “विश्वास करने का कारण” ढूंढना, असल में गरीब पशुपालकों को हतोत्साहित करने का एक तरीका था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
1) कलोनीअल नीति का अंत
ब्रिटिश काल में मजिस्ट्रेट के पास यह असीमित शक्ति थी कि वह तय करे कि शिकायत “सुआधारित” है या नहीं। यह अक्सर गरीब भारतीयों के प्रति पूर्वाग्रह का कारण बनता था। नए अधिनियम में इस औपनिवेशिक विवेकाधिकार को समाप्त कर “अनिवार्य पंजीकरण” (Mandatory Registration) की नीति अपनानी चाहिए। हर शिकायत, चाहे वह मौखिक हो या लिखित, उसे तुरंत पंजीकृत किया जाना चाहिए और उसकी जांच निष्पक्षता से होनी चाहिए।
2) संविधान के साथ अनुरूपता
यह धारा अनुच्छेद 14 के तहत “कानून के समक्ष समानता” के अधिकार को प्रभावित करती है, क्योंकि एक प्रभावशाली व्यक्ति की बात पर मजिस्ट्रेट जल्दी विश्वास कर लेता था। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि शिकायतकर्ता की सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना उसकी बात को सम्मान और गंभीरता से सुना जाए। यह अनुच्छेद 21 के तहत “त्वरित न्याय” के अधिकार को भी सुदृढ़ करे।
3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता
ग्रामीण क्षेत्रों में मौखिक शिकायतों के लिए स्थानीय भाषा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। जहा इंटरनेट सुविधा उपलब्ध हो चुकी हैं ऐसे ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में, जहाँ लोग अधिक जागरूक हैं, वहां वीडियो साक्ष्य या फोटो के माध्यम से की गई शिकायत को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। शहरी सोसायटियों में “पशु विवादों” के लिए शिकायत दर्ज करने हेतु डिजिटल कियोस्क (Kiosks) की व्यवस्था होनी चाहिए। ये सभी शिकायते स्थानीय निकाय की समिति के समक्ष निपटनी चाहिए।
4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार
मजिस्ट्रेट को केवल उन गंभीर मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए जो स्थानीय स्तर पर नहीं सुलझ पाए। जहा तक हो सके वहा तक इस विषय के सभी मामले स्थानीय निकाय द्वारा ही सुलजाये जाए। अगर कोई व्यक्ति स्थानीय निकाय द्वारा गठित सुलह समिति के निर्णय से सहमत न हो तभी मजिस्ट्रेट के समक्ष अपील का अधिकार होना चाहिए।
5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन
धारा 21 के तहत समन जारी करने के बजाय, मामला सीधे सुलह समिति को भेजा जाना चाहिए। 1996 के अधिनियम के तहत, यह समिति समन जैसी औपचारिक और डरावनी प्रक्रिया के बजाय दोनों पक्षों को अनौपचारिक रूप से बुलाएगी। अधिकांश मामले संवाद के माध्यम से ही सुलझ सकते हैं, जिससे अदालती बोझ कम होगा।
6) जब्त पशुओ का कल्याण
जब तक मजिस्ट्रेट की जांच चलती थी, पशु को कांजी हाउस में रखना उसकी जान जोखिम में डालना था। नए कानून में “अनिवार्य पशु निरीक्षण” का प्रावधान होना चाहिए। जांच के दौरान हर 48 घंटे में पशु की स्वास्थ्य रिपोर्ट पोर्टल पर उपलोड की जानी चाहिए। यदि जांच में देरी होती है, तो पशु को “अस्थायी कस्टडी” में मुक्त किया जाना चाहिए। जहा डिजिटल व्यवस्था नहीं हैं ऐसी जगहों पर ये स्वास्थ्य जांच हर 72 घंटों मे की जानी एवं पूरी रिपोर्ट की प्रतियां कांजी हौस, स्थानीय निकाय एवं पशु कल्याण समिति को दी जानी चाहिए।
7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी
यदि शिकायत आवारा पशुओं से संबंधित है, तो स्थानीय निकाय को जांच के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि पशु का स्वास्थ्य प्रबंधन सही रहा है या नहीं। यदि जांच के दौरान यह पाया जाता है कि पशु की नसबंदी या टीकाकरण नहीं हुआ है, तो उसे तत्काल करने के निर्देश कांजी हौस रखवाले/कर्मचारी को देना चाहिए एवं इसका मेडिकल रिपोर्ट भी रिकार्ड किया जाए।
8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति
आवासीय क्षेत्रों में स्थानीय निकाय की जांच का मुख्य केंद्र क्षतिपूर्ति होना चाहिए। यदि जांच में यह सिद्ध हो जाता है कि पशु मालिक की लापरवाही थी, तो सुलह समिति को जांच पूरी होने से पहले ही “अंतरिम क्षतिपूर्ति” (Interim Compensation) दिलाने का अधिकार होना चाहिए ताकि पीड़ित को तुरंत आर्थिक सहायता मिल सके।
9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए
समन तामील करने और जांच के दौरान साक्ष्य जुटाने में “पशु मित्रों” की सहायता ली जानी चाहिए। पुलिस का उपयोग केवल सुरक्षा के लिए हो। पशु मित्र स्वतंत्र गवाहों के रूप में स्थानीय निकाय की सुलह समिति को सही स्थिति बताने में मदद करेंगे, जिससे रसूखदार लोगों द्वारा जांच को प्रभावित करने की संभावना कम हो जाएगी।
10) आधुनिकीकरण
समिति द्वारा “शिकायत का सार” हाथ से लिखने के बजाय, पूरी मौखिक शिकायत की वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग की जानी चाहिए। यह डिजिटल साक्ष्य जांच को अधिक पारदर्शी बनाएगा। जांच की प्रगति और समिति के आदेश को ऑनलाइन पोर्टल पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि शिकायतकर्ता को कार्यालय के चक्कर न काटने पड़ें।
11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर
इस आधुनिक जांच प्रक्रिया के लिए “पशु विवाद अन्वेषक” (Animal Dispute Investigators) के नए पद सृजित किए जा सकते हैं। स्थानीय शिक्षित युवाओं को कानून और पशु व्यवहार का प्रशिक्षण देकर नियुक्त किया जा सकता है। ये अन्वेषक मजिस्ट्रेट को स्वतंत्र और निष्पक्ष रिपोर्ट देंगे, जिससे न्याय जल्दी होगा और युवाओं को रोजगार मिलेगा।
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