पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 31

31.1 मूल प्रावधान

1अध्याय 8: अनुपूरक

31. कतिपय कृत्यों को स्थानीय प्राधिकारी को अन्तरित करने की और अधिशेष प्राप्तियों को स्थानीय निधि में जमा करने का निदेश देने की राज्य सरकार की शक्ति – राज्य सरकार समय-समय पर शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा-

(क) अपने प्रशासनाधीन राज्यक्षेत्रों के किसी भाग के अन्दर जिसमें यह अधिनियम प्रवृत्त हो किसी स्थानीय प्राधिकारी को इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट के सब या किन्हीं कृत्यों का अन्तरण, उस स्थानीय प्राधिकारी की अधिकारिता के अध्यधीन स्थानीय क्षेत्र के अन्दर कर सकेगी।

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मूल प्रावधान की पादटिका

1. 1891 के अधिनियम सं० 1 की धारा 9 द्वारा अध्याय 8 जोड़ा गया।

2. खण्ड (ख) भागतः 1914 के अधिनियम सं० 10 द्वारा और भागतः भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा निरसित ।

31.2 आलोचनात्मक विश्लेषण

यह प्रावधान अधिनियम के अंतिम अध्याय, अनुपूरक (Supplementary), का हिस्सा है। यह प्रावधान राज्य सरकार को महत्वपूर्ण प्रशासनिक शक्तियाँ प्रदान करता है ताकि वह अधिनियम के कुछ कार्यों को स्थानीय स्तर पर सौंप सके। इस प्रावधान के अनुसार प्रांतीय सरकार अपने प्रशासन के अधीन उन क्षेत्रों में जहाँ यह अधिनियम लागू है, किसी स्थानीय प्राधिकारी को शक्तियों का अन्तरण (Transfer) कर सकती थी जैसे राज्य सरकार के सभी या किन्हीं कृत्यों (Functions) अथवा जिला मजिस्ट्रेट के सभी या किन्हीं कृत्यों को करने की शक्तियाँ। यह अन्तरण उस स्थानीय प्राधिकारी के लिए निर्धारित स्थानीय क्षेत्र और उसकी अधिकारिता की सीमाओं के भीतर ही किया जाता था।

यह प्रशासन की सुविधा के लिए शक्तियों का ऊपर से नीचे की ओर स्थानांतरण था। इसका उद्देश्य स्थानीय निकायों को सशक्त करना कम, और औपनिवेशिक सरकार के प्रशासनिक बोझ को कम करना अधिक था। स्थानीय प्राधिकारियों को अतिचार से संबंधित कार्यों (जैसे कांजी हौस चलाना, जुर्माना वसूलना) का अन्तरण करने से जुर्माने और दण्ड लगाने का अप्रिय कार्य स्थानीय भारतीय अधिकारियों के हाथ में आ जाता था, जबकि राजस्व पर अंतिम नियंत्रण ब्रिटिश सरकार का बना रहता था। यह स्थानीय अधिकारियों पर दबाव डालता था कि वे कठोरता से जुर्माने वसूलें।

तो इस तरह यह कानून ब्रिटिश प्रशासन की अत्याचारी नीतियों पर खरा उतरता हैं। आजीविका का मूलभूत अधिकार इस अधिनियम के अनुसार छीनने का पूरा प्रयास किया गया हैं। न्याय के अधिकार का भी उल्लंघन बार बार इस अधिनियम मे हुआ हैं। इस अधिनियम का आज के समय पर औचित्य कुछ भी नहीं हैं क्यू की इस अधिनियम मे स्थानीय पंचायती राज के विपरीत जाकर सभी शक्तियाँ जिला मजिस्ट्रेट को डी हैं। केवल राजस्व पर केंद्रित इस कानून मे पशुओं के हित की कोई बात नहीं हैं, न ही उस किसान को कोई न्याय मिल रहा हैं जिसके खेत और फसल का नुकसान हुआ हैं और न ही उस पशु पालक के साथ न्याय हो रहा हैं जिसके पशु अवैध तरीके से जब्त किए गए थे। इसीलिए इस कानून को निरस्त करना ही उचित हैं।

31.3 संशोधन हेतु सुझाव

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की अंतिम धारा 31 पर आपका विश्लेषण इस कानून के दमनकारी सफर का एक सटीक निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। शक्तियों का यह तथाकथित “अन्तरण” वास्तव में उत्तरदायित्व को थोपने और राजस्व पर नियंत्रण बनाए रखने की एक चाल थी। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:

1) कलोनीअल नीति का अंत

ब्रिटिश काल में शक्तियों का हस्तांतरण केवल प्रशासनिक बोझ कम करने के लिए था, जिसमें अंतिम नियंत्रण अंग्रेजों के पास ही रहता था। नए अधिनियम में “ऊपर से नीचे” (Top-down) के बजाय “नीचे से ऊपर” (Bottom-up) की नीति अपनानी चाहिए। इसमें स्थानीय प्राधिकारियों को केवल आदेश पालक नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाले स्वायत्त निकायों के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए।

2) संविधान के साथ अनुरूपता

यह धारा 73वें और 74वें संविधान संशोधन (पंचायती राज और नगर निकाय) की मूल भावना के विरुद्ध है क्योंकि यह शक्तियों को विकेंद्रीकृत करने के बजाय जिला मजिस्ट्रेट के माध्यम से नियंत्रित करती है। नया कानून अनुच्छेद 40 के तहत ग्राम पंचायतों को पूर्ण शक्ति प्रदान करे ताकि वे अपने क्षेत्र के पशु प्रबंधन और न्याय वितरण को स्वयं संचालित कर सकें।

3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता

ग्रामीण क्षेत्रों में कांजी हाउस का प्रबंधन और विवादों का निपटारा पूरी तरह ग्राम सभा के अधीन होना चाहिए। शहरी क्षेत्रों में, यह कार्य वार्ड समितियों और नागरिक समूहों (RWA) के सहयोग से होना चाहिए। राज्य सरकार का कार्य केवल दिशा-निर्देश देना और बजट सहायता प्रदान करना होना चाहिए, न कि हस्तक्षेप करना।

4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार

जिला मजिस्ट्रेट के स्थान पर स्थानीय निकाय ही इस अधिनियम के वास्तविक “भारसाधक” होने चाहिए। उन्हें नियम बनाने, जुर्माना तय करने और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार राहत देने का पूर्ण अधिकार मिलना चाहिए। यह स्थानीय शासन की अवधारणा को मजबूत करेगा।

5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन

अधिनियम की अंतिम शक्तियों के रूप में, राज्य सरकार को यह अनिवार्य करना चाहिए कि प्रत्येक स्थानीय निकाय में एक “स्थायी सुलह केंद्र” हो। 1996 के अधिनियम के तहत, ये केंद्र सभी छोटे-बड़े पशु विवादों का निपटारा करेंगे, जिससे पुलिस और अदालतों की भूमिका न्यूनतम रह जाएगी।

6) जब्त पशुओ का कल्याण

शक्तियों के हस्तांतरण के साथ-साथ राज्य सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि बजट का एक बड़ा हिस्सा स्थानीय निकायों को केवल “पशु कल्याण” (Infrastructure, Food, Medicine) के लिए दिया जाए। बिना वित्तीय संसाधनों के शक्तियों का हस्तांतरण केवल एक कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगा।

7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी

स्थानीय निकायों को यह विशेष शक्ति और उत्तरदायित्व दिया जाना चाहिए कि वे अपने क्षेत्र के शत-प्रतिशत आवारा पशुओं का डेटाबेस तैयार करें और उनका टीकाकरण व नसबंदी सुनिश्चित करें। इसके लिए उन्हें राज्य सरकार से विशेष अनुदान (Grant) प्राप्त करने का वैधानिक अधिकार होना चाहिए।

8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति

राज्य सरकार को ऐसे मानक नियम (Model Bylaws) बनाने चाहिए जिन्हें स्थानीय निकाय अपनी आवश्यकतानुसार अपना सकें। इसमें आवासीय क्षेत्रों में पालतू जानवरों के मालिकों की जिम्मेदारी और पीड़ितों को मिलने वाली त्वरित क्षतिपूर्ति का स्पष्ट ढांचा होना चाहिए।

9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए

नया अधिनियम यह प्रावधान करेगा कि स्थानीय प्राधिकारी “पशु मित्र स्वयंसेवकों” का एक पैनल बनाएंगे। पुलिस केवल तभी हस्तक्षेप करेगी जब ये स्थानीय प्राधिकारी सुरक्षा की मांग करेंगे। इससे प्रशासन का मानवीय चेहरा सामने आएगा और दमनकारी पुलिसिया कार्रवाई की छवि बदलेगी।

10) आधुनिकीकरण

राज्य सरकार को एक एकीकृत “डिजिटल पशु प्रबंधन पोर्टल” विकसित करना चाहिए, जिसे स्थानीय निकाय संचालित करेंगे। इसमें कांजी हाउस के पशुओं, वसूले गए जुर्मानों और पीड़ितों को दी गई क्षतिपूर्ति का पूरा विवरण “पब्लिक डोमेन” में उपलब्ध होना चाहिए। पारदर्शिता ही इस कानून की सफलता का आधार होगी।

11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर

शक्तियों के इस विकेंद्रीकरण से ग्राम और नगर स्तर पर ‘पशु कल्याण समन्वयकों’, ‘डेटा ऑपरेटरों’ और ‘पशु रक्षकों’ के हजारों पदों का सृजन होगा। स्थानीय युवाओं को अपने ही क्षेत्र में प्रशासन और समाज सेवा से जुड़ने का अवसर मिलेगा, जिससे पलायन रुकेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

निष्कर्ष और आगे का मार्ग

यह विस्तृत विश्लेषण सिद्ध करता है कि 1871 का यह अधिनियम अब अप्रासंगिक और दमनकारी हो चुका है। इसे पूरी तरह निरस्त कर एक ऐसे नए “एकीकृत पशु कल्याण और अतिचार प्रबंधन अधिनियम” की आवश्यकता है जो पशुओं को “राजस्व की वस्तु” नहीं, बल्कि “जीवंत प्राणी” माने, किसानों और पशुपालकों के हितों में संतुलन बनाए एवं भारतीय पंचायती राज और डिजिटल इंडिया की सोच को आत्मसात करे।

कृपया इस ब्रिटिश कालीन कानून को निरस्त करने हेतु नीचे दिए लाल बटन को प्रेस करिए। अपना मेल एप एवं अकाउंट सिलेक्ट करिए, मेल अपने आप टाइप होकर आ जाएगा। आपको केवल सेन्ड करना हैं।

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