तेलंगाना में सरकारी परामर्श सेवाओं पर सेवा कर
मामले की सामान्य जानकारी: मामले का नाम: श्री रंगा रेड्डी बनाम पी सी सी टी- हैदराबाद- जीएसटी आदेश की तिथि: […]
मामले की सामान्य जानकारी: मामले का नाम: श्री रंगा रेड्डी बनाम पी सी सी टी- हैदराबाद- जीएसटी आदेश की तिथि: […]
General information about the case: Name of case: Mr. Ranga Reddy Male vs P C C T- Hyderabad- Gst Date
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यह विस्तृत विश्लेषण सिद्ध करता है कि 1871 का यह अधिनियम अब अप्रासंगिक और दमनकारी हो चुका है। इसे पूरी तरह निरस्त कर एक ऐसे नए “एकीकृत पशु कल्याण और अतिचार प्रबंधन अधिनियम” की आवश्यकता है जो पशुओं को “राजस्व की वस्तु” नहीं, बल्कि “जीवंत प्राणी” माने, किसानों और पशुपालकों के हितों में संतुलन बनाए एवं भारतीय पंचायती राज और डिजिटल इंडिया की सोच को आत्मसात करे।
आपका मासूम बच्चा, जो स्कूल से लौटकर आपका फोन खोलता है, और अचानक उसके सामने ऐसी सामग्री आ जाती है जो उसके कोमल मन को हमेशा के लिए बदल देती है। क्या आपने कभी सोचा है कि फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स या यूट्यूब जैसे विदेशी प्लेटफॉर्म भारत को एक डिजिटल यौन बाजार में क्यों बदल रहे हैं?
मुजरा करने का सिद्धांत कानूनी रूप से सही है क्योंकि यह किसी को दोहरी क्षतिपूर्ति मिलने से रोकता है। हालाँकि, यह प्रावधान औपनिवेशिक व्यवस्था की उस नीति को दर्शाता है जो राजस्व और पैसे के प्रवाह पर पूर्ण नियंत्रण चाहती थी, खासकर तब जब पैसा राज्य के नियंत्रण वाले कोष से बाहर जा रहा हो। यह मुजरा करने की प्रक्रिया गरीब किसान पर यह साबित करने का बोझ डालती थी कि उसे मजिस्ट्रेट से पहले कोई मुआवजा मिला है या नहीं, जिससे सिविल वाद की कार्यवाही और जटिल हो जाती थी।
यह दोनों न्यायालय अक्सर तहसील अथवा जिले के नगर मे ही स्थित रहते थे। इससे न्याय मे देरी की संभावना बढ़ जाती थी। बिना वकील को नियुक्त किए ये मामले सुलझते नहीं थे। ब्रिटिश नीति ने यह सुनिश्चित किया कि वास्तविक क्षतिपूर्ति पाने का रास्ता इतना कठिन हो कि अधिकांश गरीब किसान इसे अपनाने का साहस न करें। यह एक कानूनी प्रावधान था जो केवल धनी ज़मींदारों और संपन्न वर्गों के लिए उपयोगी था जो सिविल मुकदमे का खर्च उठा सकते थे। गोरों ने बड़ी कुटिलता से स्थानीय पंचोंद्वारा विवाद सुलझाने वाली भारतीय व्यवस्था को समाप्त कर प्रदीर्घ न्यायव्यवस्था इस देश पर केवल इसीलिए लागू की, क्यू की वे चाहते ही नहीं थे की भारतीय जनता को सरलता से न्याय मिले।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 28 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कैसे अंग्रेजों ने “न्याय” को मजिस्ट्रेट के विवेक की बेड़ियों में जकड़ रखा था। यह धारा दिखाती है कि नुकसान की भरपाई करना शासन की प्राथमिकता नहीं थी, बल्कि यह केवल एक विकल्प (option) था जिसे मजिस्ट्रेट अपनी मर्जी से चुन सकता था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
रखवाले के विरुद्ध शिकायतों की जांच का अधिकार स्थानीय निकाय को दिया जाना चाहिए। स्थानीय ग्राम पंचायत या नगर निकाय की “पशु कल्याण समिति” को रखवाले के कार्यों का साप्ताहिक ऑडिट करने और लापरवाही पाए जाने पर तुरंत दंड प्रस्तावित करने का अधिकार होना चाहिए। स्थानीय निगरानी से जवाबदेही बढ़ेगी। ऑडिट एवं जांच के बाद स्थानीय निकाय जो भी निर्णय दे भले ही उसके लिए अपील के अधिकार कांजी हौस के कर्मचारियों को दिए जाने चाहिए।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 26 पर विश्लेषणात्मक आलोचना इस कानून के एक और भेदभावपूर्ण और दमनकारी पहलू को सामने लाती है। विशेष रूप से सुअरों का उल्लेख करना और फिर राज्य सरकार को जुर्माने की राशि मनमाने ढंग से बढ़ाने की शक्ति देना, औपनिवेशिक तंत्र की उस मानसिकता को दर्शाता है जो सामाजिक रूप से वंचित वर्गों को लक्षित करती थी। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
यह वसूली तीन शर्तों में से किसी के भी तहत की जा सकती थी। पहली चाहे पशुओं को अतिचार करते हुए मौके पर ही ज़ब्त किया गया हो या नहीं; दूसरी चाहे पशु अपराध के लिए सिद्धदोष (दोषी पाए गए) व्यक्ति की संपत्ति हों और तीसरी शर्त चाहे अतिचार किए जाने के समय वे पशु दोषी व्यक्ति के भारसाधीन ही क्यों न हों। इस प्रावधान में ब्रिटिश नीति का प्रभाव कठोर और प्रतिशोधात्मक वित्तीय दण्ड थोपने में और न्याय के सिद्धांतों को दरकिनार करके राजस्व वसूली को प्राथमिकता देने में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।