22.1 मूल प्रावधान
22. अवैध अभिग्रहण या निरोध के लिए प्रतिकर – यदि अभिग्रहण या निरोध अवैध न्यायनिर्णीत किया जाए तो मजिस्ट्रेट अभिग्रहण या निरोध से हुई हानि के लिए एक सौ रुपए से अनधिक का युक्तियुक्त प्रतिकर प्रतिवादी को दिलाएगा जिसका संदाय पशुओं का निर्मोचन उपाप्त करने में परिवादी द्वारा संदत्त सब जुर्मानों और उपगत व्ययों सहित उस व्यक्ति द्वारा किया जाएगा जिसने अभिग्रहण दिया या पशुओं को निरुद्ध किया,
पशुओं का निर्मोचन – और यदि पशुओं का निर्मोचन नहीं किया गया है तो मजिस्ट्रेट ऐसा प्रतिकर दिलाने के अतिरिक्त, उनके निर्मोचन का आदेश देगा और यह निदेश करेगा कि इस अधिनियम के अधीन उद्ग्रहणीय सब जुर्माने और व्यय उस व्यक्ति द्वारा संदत्त किए जाएंगे जिसमें अभिग्रहण किया या पशुओं को निरुद्ध किया।
22.2 विश्लेषणात्मक आलोचना
अगर मजिस्ट्रेट शिकायत की जाँच के बाद यह फैसला सुनाता है कि पशुओं का अभिग्रहण या उन्हें हिरासत में रखना अवैध था, तब पीड़ित पशु मालिक को न्याय और क्षतिपूर्ति प्रदान करने की प्रक्रिया इस धारा के तहत निर्धारित की जाती थी।
अगर अभिग्रहण अवैध सिद्ध होता था तो मजिस्ट्रेट, परिवादी को अवैध ज़ब्ती या निरोध से हुई हानि के लिए ज्यादा से ज्यादा एक सौ रुपये (100 रुपए) का युक्तियुक्त प्रतिकर (reasonable compensation) देने का आदेश दे सकता था। आदेश के अनुसार दोषी अभिग्रहणकर्ता या रखवाला इस प्रतिकर का भुगतान परिवादी को देने के लिए बाध्य होते थे। प्रतिकर के साथ-साथ, दोषी व्यक्ति को वह सब पैसा भी वापस करना होता था जो पीड़ित ने पशुओं को छुड़ाने के लिए जुर्माने और अन्य व्ययों के रूप में पहले ही जमा कर दिया था।
यदि अवैधता सिद्ध होने के समय तक पशुओं को अभी तक छुड़ाया नहीं गया है, तो मजिस्ट्रेट प्रतिकर दिलाने के अलावा, तुरंत उनके निर्मोचन का आदेश देगा। मजिस्ट्रेट यह भी निर्देश देगा कि इस अधिनियम के तहत वसूल किए जाने वाले सभी जुर्माने और व्यय अब मालिक के बजाय दोषी व्यक्ति (अभिग्रहणकर्ता या निरोधक) द्वारा संदत्त (paid) किए जाएंगे।
प्रतिकर की अधिकतम राशि को केवल एक सौ रुपये तक सीमित करना, ब्रिटिश नीति का एक दमनकारी पहलू था। 1871 के संदर्भ में यह राशि बड़ी लग सकती है, लेकिन अवैध ज़ब्ती से एक किसान या चरवाहे को होने वाली वास्तविक हानि (जैसे समय का नुकसान, फसल को नुकसान, पशुओं की सेहत पर असर, और कानूनी खर्च) की तुलना में यह नाममात्र थी।
22.3 संशोधन हेतु सुझाव
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 22 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कैसे अंग्रेजों ने “प्रतिकर” (Compensation) के नाम पर केवल खानापूर्ति की थी। सौ रुपये की अधिकतम सीमा तय करना यह दर्शाता है कि औपनिवेशिक शासन के लिए भारतीय पशुपालकों का समय, श्रम और उनकी आजीविका की कोई वास्तविक कीमत नहीं थी। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
1) कलोनीअल नीति का अंत
ब्रिटिश काल में प्रतिकर की राशि को 100 रुपये पर सीमित करना एक अपमानजनक प्रावधान था। नए अधिनियम में “नाममात्र प्रतिकर” की नीति को समाप्त कर “वास्तविक क्षतिपूर्ति” (Actual Restitution) की नीति अपनानी चाहिए। प्रतिकर की राशि केवल एक निश्चित संख्या नहीं होनी चाहिए, बल्कि वह पशुपालक को हुए वास्तविक आर्थिक नुकसान, पशु की बाजार दर और मानसिक प्रताड़ना के आधार पर तय की जानी चाहिए।
2) संविधान के साथ अनुरूपता
यह धारा अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमापूर्ण जीवन और अनुच्छेद 300A के अंतर्गत संपत्ति की सुरक्षा के संवैधानिक वादे को पूरा करने में विफल है। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि यदि किसी अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा अवैध जब्ती की जाती है, तो उसे न केवल हर्जाना देना होगा, बल्कि उस पर “दंडात्मक हर्जाना” (Punitive Damages) भी लगाया जाएगा ताकि भविष्य में ऐसी अवैध कार्यवाहियों पर रोक लग सके।
3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता
ग्रामीण क्षेत्रों में पशु की अवैध जब्ती से खेती रुक जाती है, इसलिए प्रतिकर में “खेती के नुकसान” को भी शामिल किया जाना चाहिए। शहरी क्षेत्रों में, जहाँ पालतू जानवरों को अवैध रूप से पकड़ने पर उनके मालिकों को गहरा मानसिक आघात पहुँचता है, वहां प्रतिकर में “भावनात्मक क्षति” (Emotional Distress) का खंड भी जोड़ा जाना चाहिए।
4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार
मजिस्ट्रेट द्वारा प्रतिकर तय करने की प्रक्रिया लंबी हो सकती है। नए अधिनियम में ग्राम पंचायत या वार्ड समिति को प्रतिकार दिलाने का अधिकार होना चाहिए। यदि प्रथम दृष्टया जब्ती अवैध लगती है, तो स्थानीय निकाय तुरंत पशु की रिहाई और प्रारंभिक क्षतिपूर्ति का आदेश दे सकते हैं। अगर इसमे विवाद होता हैं तो इसे सुलह समिति के समक्ष रखा जा सकता हैं।
5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन
धारा 22 के तहत प्रतिकर की राशि तय करने के लिए सुलह समिति एक आदर्श मंच है। 1996 के अधिनियम के सिद्धांतों का उपयोग करते हुए, समिति दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति और नुकसान का सटीक मूल्यांकन कर सकती है। यदि दोषी व्यक्ति स्वेच्छा से अधिक हर्जाना देने को तैयार है, तो मामले को न्यायिक प्रक्रिया से बाहर ही सुलझाया जा सकता है।
6) जब्त पशुओ का कल्याण
यदि अवैध निरोध के दौरान पशु बीमार, घायल या कुपोषित हो जाता है, तो प्रतिकर की राशि स्वतः दोगुनी हो जानी चाहिए। नए कानून में प्रावधान होना चाहिए कि पशु की चिकित्सा का सारा खर्च और उसके भविष्य के उपचार की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की होगी जिसने उसे अवैध रूप से निरुद्ध किया था।
7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी
यदि किसी आवारा पशु को अवैध रूप से पकड़कर उसे कष्ट पहुँचाया गया है, तो दोषी व्यक्ति से प्राप्त प्रतिकर की राशि को पीड़ित पशुपालक के बजाय “पशु कल्याण कोष” में जमा किया जाना चाहिए। इस राशि का उपयोग उसी क्षेत्र के आवारा पशुओं के टीकाकरण और नसबंदी के लिए किया जाना चाहिए।
8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति
आवासीय क्षेत्रों में यदि किसी ने दुर्भावनापूर्ण तरीके से किसी के पालतू पशु को जब्त करवाया है, तो दोषी पर जुर्माना होना चाहिए।
9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए
अवैध अभिग्रहण सिद्ध होने पर “पशु मित्रों” की रिपोर्ट को साक्ष्य माना जाना चाहिए। पुलिस का कार्य यह सुनिश्चित करना होगा कि मजिस्ट्रेट द्वारा आदेशित प्रतिकर की राशि दोषी व्यक्ति से तुरंत वसूल कर पीड़ित मालिक को दिलाई जाए। दोषी सरकारी कर्मचारी होने पर स्थानीय पशु कल्याण विभाग को उसकी रिपोर्ट स्थानीय निकाय एवं डिजिटल पोर्टल पर भेजनी चाहिए।
10) आधुनिकीकरण
प्रतिकर की राशि का भुगतान चेक या नकद के बजाय सीधे “डिजिटल ट्रांसफर” (DBT) के माध्यम से होना चाहिए। अवैध जब्ती करने वाले व्यक्ति या अधिकारी का नाम एक “सार्वजनिक पोर्टल” पर दर्ज किया जाना चाहिए ताकि उनके पिछले रिकॉर्ड को देखा जा सके। इससे पारदर्शी जवाबदेही तय होगी।
11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर
क्षति और नुकसान का आकलन करने के लिए स्थानीय स्तर पर “पशु संपदा मूल्यांकनकर्ताओं” (Animal Asset Appraisers) की नियुक्ति की जा सकती है। ये प्रशिक्षित युवा मजिस्ट्रेट को यह बताने में मदद करेंगे कि अवैध जब्ती से मालिक को वास्तव में कितना आर्थिक नुकसान हुआ है, जिससे सही न्याय मिलेगा और युवाओं को रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे।
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