20.1 मूल प्रावधान
20. परिवाद करने की शक्ति – कोई व्यक्ति जिसके पशु इस अधिनियम के अधीन अभिगृहीत किए हैं या ऐसे अभिगृहीत किए जाने पर, इस अधिनियम के उल्लंघन में निरुद्ध किए गए हैं. अभिग्रहण की तारीख से दस दिन के भीतर किसी समय, जिला मजिस्ट्रेट अथवा जिला जिला मजिस्ट्रेट द्वारा निदेश के बिना आरोपों को ग्रहण और उनका विचारण करने के लिए प्राधिकृत किसी मजिस्ट्रेट को परिवाद कर सकेगा।
मूल प्रावधान की पादटिका
1. 1891 के अधिनियम सं० 1 की धारा 6 द्वारा मूल अध्याय 5 के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
20.2 विश्लेषणात्मक आलोचना
यह धारा बताती है कि पीड़ित व्यक्ति कैसे और कहाँ शिकायत दर्ज कर सकता था। कोई भी व्यक्ति जिसे लगता है कि उसके पशुओं को इस अधिनियम के अधीन अवैध रूप से अभिगृहीत किया गया था, या ज़ब्ती के बाद इस अधिनियम का उल्लंघन करते हुए निरुद्ध (हिरासत में) रखा गया था, तो वह शिकायत (परिवाद) दर्ज कर सकता था। यह शिकायत पशुओं की ज़ब्ती की तारीख से दस दिन के भीतर दर्ज की जानी चाहिए ऐसा इस प्रावधान मे लिखा हैं। यह एक कठोर समय सीमा हैं। परिवाद जिला मजिस्ट्रेट या कोई भी मजिस्ट्रेट जिसे जिला मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपों को ग्रहण करने और उनका विचारण (Trial) करने के लिए प्राधिकृत किया गया हो, उसके पास दाखिल किया जा सकता था।
ग्रामीण भारत में, जहाँ संचार और परिवहन सीमित थे, और जहाँ पशुपालक अक्सर दूर-दराज के क्षेत्रों में होते थे, उनके लिए ज़ब्ती के बारे में जानना, पैसा जुटाना, और फिर मजिस्ट्रेट के कार्यालय तक पहुँचकर कानूनी शिकायत दर्ज करना, विशेषकर दस दिन के भीतर, लगभग असंभव था। उस समय अक्सर लोगों को पैदल चलना पड़ता था और निरक्षरता के कारण कई मामलों के बारे मे कहा शिकायत करना यह भी पता नहीं होता था।
शिकायत दर्ज करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट या उसके द्वारा प्राधिकृत मजिस्ट्रेट के पास जाना अनिवार्य था। यह प्रणाली स्थानीय विवादों को स्थानीय स्तर पर (जैसे ग्राम मुखिया या पंचायत) सुलझाने की पारंपरिक भारतीय प्रणाली को दरकिनार करती थी। मजिस्ट्रेट का कार्यालय अक्सर जिला मुख्यालयों में होता था, जो गाँव से बहुत दूर होता था। शिकायत दर्ज करने के लिए लंबी दूरी तय करने में समय, पैसा और कृषि कार्यों का नुकसान होता था। यह आर्थिक और शारीरिक बोझ शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया को इतना दुरूह बना देता था कि कई गरीब मालिक शिकायत न करना ही पसंद करते थे और इस अन्याय को सहन करते थे।
20.3 संशोधन हेतु सुझाव
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 20 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कैसे अंग्रेजों ने “न्याय के अधिकार” को एक ऐसी समय सीमा और भौगोलिक दूरी में बांध दिया था कि वह आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाए। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
1) कलोनीअल नीति का अंत
ब्रिटिश काल में दस दिन की समय सीमा और केवल जिला मजिस्ट्रेट के पास शिकायत करने की शक्ति एक सोची-समझी दमनकारी नीति थी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि गरीब पशुपालक कानूनी उलझनों और दूरी के कारण कभी अपनी आवाज न उठा सके। नए अधिनियम में इस केंद्रीकृत व्यवस्था को समाप्त कर “न्याय आपके द्वार” की नीति अपनानी चाहिए, जहां शिकायत दर्ज करना सरल और स्थानीय स्तर पर संभव हो।
2) संविधान के साथ अनुरूपता
यह धारा अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 39A के विरुद्ध है, क्योंकि यह न्याय को केवल उन लोगों तक सीमित करती है जो जिला मुख्यालय जा सकते हैं और अदालती खर्च उठा सकते हैं। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि परिवाद (शिकायत) दर्ज करने की समय सीमा को 10 दिन से बढ़ाकर कम से कम 30 से 60 दिन किया जाए, ताकि पीड़ित को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिले।
3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता
ग्रामीण क्षेत्रों में शिकायत दर्ज करने के लिए यात्रा का बोझ कम किया जाना चाहिए। जिन ग्रामीण क्षेत्रों मे इंटरनेट की सुविधा पोहोच गई हैं और शहरी क्षेत्रों में, विशेषकर जहां पालतू जानवरों के विवाद बढ़ रहे हैं, वहां ऑनलाइन पोर्टल या मोबाइल ऐप के माध्यम से 24×7 शिकायत दर्ज करने की सुविधा होनी चाहिए। शहरी सोसायटियों के लिए स्थानीय वार्ड स्तर पर “पशु विवाद निवारण डेस्क” की स्थापना की जानी चाहिए।
4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार
जिला मजिस्ट्रेट के पास जाने की अनिवार्यता को समाप्त कर प्रथम स्तर की शिकायत सुनने का अधिकार ग्राम पंचायतों और शहरी वार्ड समितियों को दिया जाना चाहिए। स्थानीय निकाय यह बेहतर जानते हैं कि अतिचार की घटना वास्तविक थी या रंजिश का परिणाम। इससे मजिस्ट्रेटों का कार्यभार कम होगा और स्थानीय विवाद स्थानीय स्तर पर ही सुलझ जाएंगे।
5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन
धारा 20 के तहत प्राप्त होने वाली हर शिकायत को औपचारिक कानूनी विचारण (Trial) से पहले अनिवार्य रूप से सुलह समिति को भेजा जाना चाहिए। 1996 के अधिनियम के तहत, यह समिति 7 से 15 दिनों के भीतर दोनों पक्षों को आमने-सामने बिठाकर समाधान निकालेगी। यदि समझौता हो जाता है, तो मामले को आगे बढ़ाने की आवश्यकता नहीं रहेगी।
6) जब्त पशुओ का कल्याण
शिकायत दर्ज होने के बाद जब तक उसका निपटारा नहीं होता, तब तक पशु की अभिरक्षा (Custody) का निर्धारण पशु कल्याण को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि विवाद के दौरान पशु को किसी तंग कांजी हाउस में रखने के बजाय, यदि संभव हो, तो मालिक को “शर्तिया रिहाई” पर सौंप दिया जाए ताकि पशु के स्वास्थ्य की उपेक्षा न हो।
7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी
यदि शिकायत किसी लावारिस या आवारा पशु की गलत जब्ती या उसके साथ हुई क्रूरता से संबंधित है, तो पशु मित्रों या एनजीओ को ऐसी शिकायत दर्ज करने का वैधानिक अधिकार मिलना चाहिए। शिकायत की प्रक्रिया के दौरान पशु के टीकाकरण और नसबंदी की स्थिति की जांच अनिवार्य होनी चाहिए।
8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति
आवासीय क्षेत्रों में यदि कोई मालिक अपनी पशु जब्ती को चुनौती देता है, तो उसे यह सिद्ध करना होगा कि उसने पशु प्रबंधन के नियमों का पालन किया था। यदि शिकायत झूठी पाई जाती है और जब्ती सही थी, तो मालिक पर अतिरिक्त जुर्माना लगाकर वह राशि सीधे पीड़ित व्यक्ति को क्षतिपूर्ति के रूप में दी जानी चाहिए।
9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए
शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया में सहायता के लिए स्थानीय “पशु मित्रों” को “विधिक सहायक” (Legal Aides) के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। पुलिस का कार्य यह सुनिश्चित करना होगा कि शिकायत करने वाले व्यक्ति को डराया या धमकाया न जाए। पशु मित्र यह सुनिश्चित करेंगे कि शिकायत में पशु की स्थिति का सही वर्णन किया गया है।
10) आधुनिकीकरण
मजिस्ट्रेट के कार्यालय के चक्कर काटने की व्यवस्था को पूरी तरह डिजिटल किया जाना चाहिए। एक “राष्ट्रीय पशु अतिचार शिकायत पोर्टल” बनाया जाए जहां फोटो और वीडियो साक्ष्यों के साथ शिकायत दर्ज की जा सके। शिकायत की स्थिति (Status) को ऑनलाइन ट्रैक किया जा सके और आदेश की प्रति भी डिजिटल रूप से प्राप्त हो।
11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर
इस आधुनिक शिकायत निवारण तंत्र को सुचारू बनाने के लिए प्रत्येक ब्लॉक स्तर पर “पशु न्याय मित्र” या “विधिक सलाहकार” के पद सृजित किए जा सकते हैं। स्थानीय युवाओं को पशु कानून और सुलह प्रक्रिया में प्रशिक्षण देकर इन पदों पर नियुक्त किया जा सकता है, जिससे वे पीड़ितों की सहायता कर सकें और खुद के लिए आजीविका कमा सकें।
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