पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 19

19.1 मूल प्रावधान

19. अधिनियम के अधीन विक्रयों में अधिकारियों और कांजी हौस रखवालों द्वारा पशुओं का क्रय न किया जाना – कोई भी पुलिस अधिकारी या अन्य अधिकारी, या कांजी हौस रखवाला जो इसमें अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अधीन नियुक्त हो इस अधिनियम के अधीन किसी विक्रय में किसी पशु का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से क्रय नहीं करेगा।

कांजी हौस रखवालों द्वारा परिबद्ध पशुओं का निर्मोचन कब न किया जाना – कोई भी कांजी हौस रखवाला किसी परिवद्ध पशु की निर्मुक्ति या परिदान इस अध्याय के पूर्ववर्ती भाग के अनुसार करने से अन्यथा तब तक नहीं करेगा जब तक कि ऐसी निर्मुक्ति या परिदान मजिस्ट्रेट या सिविल न्यायालय द्वारा आदिष्ट न हो।

19.2 विश्लेषणात्मक आलोचना

कोई भी पुलिस अधिकारी, अन्य अधिकारी, या कांजी हौस रखवाला, जो इस अधिनियम के तहत नियुक्त था, वे इस अधिनियम के तहत होने वाली किसी भी बिक्री में किसी भी पशु को सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से नहीं खरीद सकते थे। ऐसा प्रतीत होता हैं की यह प्रावधान सरकारी कर्मचारियों के निजी हितों को रोकने हेतु इस प्रावधान को लिखा गया हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अधिकारी नीलाम को इस इरादे से प्रभावित न करें कि वे स्वयं कम कीमत पर पशु खरीद सकें।

अधिकारियों द्वारा पशु खरीदने पर प्रतिबंध लगाना सैद्धांतिक रूप से अच्छी प्रशासनिक नीति थी, लेकिन यह इस तथ्य को नहीं बदलती थी कि पूरी प्रक्रिया गरीब पशुपालकों पर आर्थिक दबाव डालने के लिए बनाई गई थी। यह केवल उत्पीड़न की प्रक्रिया को वैध और स्वच्छ बनाए रखने का एक प्रयास था, न कि उत्पीड़न को समाप्त करने का।

पूरा जुर्माना और शुल्क या निक्षेप प्राप्त होने पर ही कांजी हौस रखवाला किसी भी ज़ब्त पशु को परिदत्त (रिहा) कर सकता था। पर यदि कोई मजिस्ट्रेट या सिविल न्यायालय स्पष्ट रूप से पशु को रिहा करने या सौंपने का आदेश देता था तभी रखवाला उन नियमों को दरकिनार कर सकता था। यह नियम रखवाले की शक्ति को सीमित करता है ताकि वह व्यक्तिगत संबंधों, रिश्वत, या मनमानी के आधार पर किसी भी पशु को अवैध रूप से मुक्त न कर सके।

यदि मालिक को लगता था कि उसकी ज़ब्ती अवैध है, तो उसे अपनी आजीविका के साधन को बचाने के लिए कांजी हौस रखवाले के साथ बहस करने के बजाय महँगे और समय लेने वाले मजिस्ट्रेट या सिविल न्यायालय के पास जाना पड़ता था। इस नीति ने स्थानीय विवादों के निपटारे को केंद्रीकृत और औपनिवेशिक अदालती व्यवस्था तक सीमित कर दिया। यह गरीब और अनपढ़ भारतीयों को अदालतों के भय और खर्च के कारण न्याय की मांग छोड़ने के लिए मजबूर करता था, जिससे वे प्रशासनिक अन्याय के विरुद्ध लड़ने का साहस खो देते थे।

19.3 संशोधन हेतु सुझाव

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 19 पर आपकी विश्लेषणात्मक आलोचना इस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है कि कैसे अंग्रेजों ने “नैतिकता” के मुखौटे के पीछे अन्यायपूर्ण व्यवस्था को छिपाया था। अधिकारियों द्वारा पशु खरीदने पर प्रतिबंध केवल भ्रष्टाचार को कागजों पर रोकने का दिखावा था, जबकि न्याय पाने के लिए अदालतों का चक्कर काटना आम आदमी के लिए एक नया उत्पीड़न था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:

1) कलोनीअल नीति का अंत

ब्रिटिश काल में यह धारा अधिकारियों को खुद पशु खरीदने से तो रोकती थी, लेकिन उनके द्वारा अपने करीबियों या बिचौलियों के माध्यम से नीलामी प्रभावित करने पर कोई कड़ा नियंत्रण नहीं था। नए अधिनियम में इस “स्वच्छता के दिखावे” को समाप्त कर वास्तविक पारदर्शिता लानी चाहिए। अधिकारियों और उनके निकटतम संबंधियों के लिए नीलामी में भाग लेना पूरी तरह प्रतिबंधित होना चाहिए और इसका उल्लंघन गंभीर सेवा अपराध माना जाना चाहिए।

2) संविधान के साथ अनुरूपता

बिना अदालती आदेश के पशु की रिहाई न करना अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित न्याय के अधिकार का उल्लंघन है। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि मजिस्ट्रेट या सिविल कोर्ट जैसे महंगे और समय लेने वाले रास्तों के बजाय, स्थानीय स्तर पर ही न्याय सुलभ हो। यह व्यवस्था नागरिकों को प्रशासनिक तानाशाही से बचाएगी और उनके संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित करेगी।

3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता

शहरी क्षेत्रों में जहाँ पालतू जानवरों की जब्ती को लेकर ईगो (ego) या आपसी रंजिश के मामले ज्यादा होते हैं, वहां “न्यायिक आदेश” के इंतजार में पशु को लंबे समय तक कैद रखना क्रूरता है। नए कानून में शहरी क्षेत्रों के लिए “फास्ट-ट्रैक रिहाई” तंत्र होना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहाँ अदालतें दूर हैं, वहां रिहाई की प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत किया जाना चाहिए।

4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार

पशु की रिहाई के लिए मजिस्ट्रेट या सिविल कोर्ट के आदेश की अनिवार्यता को समाप्त कर यह शक्ति “स्थानीय ग्राम पंचायत” या “नगर पालिका की विवाद समाधान इकाई” को दी जानी चाहिए। यदि स्थानीय निकाय रिहाई का लिखित आदेश देता है, तो रखवाला उसे मानने के लिए बाध्य होगा। इससे अदालतों का बोझ कम होगा और मालिक को तत्काल राहत मिलेगी।

5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन

धारा 19 के तहत उत्पन्न होने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए सुलह समिति को “न्यायिक आदेश” के समकक्ष शक्तियां दी जानी चाहिए। 1996 के अधिनियम के तहत समिति द्वारा किया गया समझौता या आदेश रखवाले के लिए अंतिम होगा। इससे मालिक को मजिस्ट्रेट के पास जाने की आवश्यकता नहीं रहेगी और विवाद का निपटारा सौहार्दपूर्ण तरीके से होगा।

6) जब्त पशुओ का कल्याण

न्यायिक प्रक्रिया के दौरान पशु को कांजी हाउस में रखना उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। नए कानून में प्रावधान होना चाहिए कि विवाद की स्थिति में पशु को “अस्थानीय संरक्षण” (Interim Custody) के तहत किसी मान्यता प्राप्त एनजीओ या स्वयं मालिक को ही शर्तों के साथ सौंप दिया जाए। पशु का कल्याण किसी भी कानूनी प्रक्रिया से ऊपर होना चाहिए।

7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी

यदि कोई आवारा पशु पकड़ा गया है, तो उसकी रिहाई या स्थानांतरण के लिए किसी अदालती आदेश की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। पशु चिकित्सा अधिकारी की रिपोर्ट और टीकाकरण/नसबंदी की पुष्टि के आधार पर उसे तुरंत उपयुक्त पुनर्वास केंद्र या गौशाला में भेजा जाना चाहिए।

8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति

आवासीय क्षेत्रों में विवाद की स्थिति में, यदि मालिक पीड़ित को क्षतिपूर्ति देने के लिए सहमत हो जाता है, तो रखवाले को किसी उच्चाधिकारी के आदेश का इंतजार किए बिना पशु को क्षतिपूर्ति देने के तुरंत बाद रिहा कर देना चाहिए। यह “स्वैच्छिक क्षतिपूर्ति” तंत्र विवादों को जल्दी समाप्त करेगा।

9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए

नीलामी प्रक्रिया में अधिकारियों की मिलीभगत रोकने के लिए स्थानीय “पशु मित्रों” को “स्वतंत्र पर्यवेक्षक” (Observer) के रूप में तैनात किया जाना चाहिए। पुलिस की भूमिका यह सुनिश्चित करना होगा कि नीलामी में भाग लेने वाले लोग अधिकारियों के बेनामी एजेंट न हों।

10) आधुनिकीकरण

नीलामी और रिहाई की पूरी प्रक्रिया की डिजिटल रिकॉर्डिंग और “रियल-टाइम” ऑडिट होना चाहिए। यदि कोई अधिकारी या रखवाला नीलामी को प्रभावित करता पाया जाता है, तो डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर उस पर तुरंत कार्यवाही होनी चाहिए। अदालती आदेशों के बजाय “डिजिटल क्लियरेंस सर्टिफिकेट” का उपयोग रिहाई के लिए किया जाना चाहिए।

11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर

प्रत्येक तहसील स्तर पर “पशु विधिक लोकपाल” (Animal Legal Ombudsman) का पद सृजित किया जाना चाहिए। यह पद स्थानीय कानून के विशेषज्ञों या शिक्षित युवाओं के लिए होगा, जो मजिस्ट्रेट के पास जाने के बजाय स्थानीय स्तर पर ही रिहाई और नीलामी से जुड़े कानूनी विवादों को सुलझाएंगे, जिससे न्याय और रोजगार दोनों सुलभ होंगे।

कृपया इस ब्रिटिश कालीन कानून को निरस्त करने हेतु नीचे दिए लाल बटन को प्रेस करिए। अपना मेल एप एवं अकाउंट सिलेक्ट करिए, मेल अपने आप टाइप होकर आ जाएगा। आपको केवल सेन्ड करना हैं।

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