24.1 मूल प्रावधान
अध्याय 6: शास्तियां
24. पशुओं के अभिग्रहण का बलपूर्वक विरोध करने या उन्हें छुड़ाने के लिए शास्ति – जो कोई इस अधिनियम के अधीन अभिग्रहणीय पशुओं के अभिग्रहण का बल पूर्वक विरोध करेगा,
और जो कोई अभिग्रहण के पश्चात् उन्हें या तो कांजी हौस से, या उन्हें कांजी हौस को ले जा रहे या ले ही जाने वाले किसी व्यक्ति से, जो पास में हो और इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अधीन कार्य कर रहा है, छुड़ाएगा,
वह मजिस्ट्रेट के समक्ष सिद्धदोष होने पर, छह मास से अनधिक की कालावधि के लिए कारावास से. या पांच सौ रुपए से अनधिक के जुर्माने से, अथवा दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
24.2 विश्लेषणात्मक आलोचना
यह धारा ‘शास्तियां (Penalties)’ अध्याय के तहत आती है और उन अपराधों के लिए दंड निर्धारित करती है जो तब किए जाते हैं जब कोई व्यक्ति कानून के अनुसार जब्त किए जा रहे या जब्त किए गए पशुओं को छुड़ाने की कोशिश करता है। यह कानून के प्रवर्तन को सुनिश्चित करती है। जो कोई भी व्यक्ति उन पशुओं की ज़ब्ती (अभिग्रहण) का बलपूर्वक विरोध करेगा जिन्हें इस अधिनियम के तहत जब्त किया जाना वैध है, वह दोषी होगा।
जो कोई भी व्यक्ति ज़ब्ती के बाद पशुओं को कांजी हौस से या उस व्यक्ति से जो पशुओं को कांजी हौस ले जा रहा है या ले जाने वाला है और जो अधिनियम के तहत कानूनी शक्ति का उपयोग कर रहा है उससे छुड़ाएगा उसे इस धारा के तहत दोषी माना जाता था। उपरोक्त अपराधों का दोषी पाए जाने पर, व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष सिद्धदोष होने पर, छह मास (छह महीने) तक के कारावास (जेल) से, या पाँच सौ रुपये तक के जुर्माने से, अथवा दोनों से दंडित किया जाता था। इस अधिनियम मे प्रतिकार केवल एक सौ रुपये तक ही मिलता था पर अपने ही पशुओं को छुड़ाने के प्रयत्न को एक दोष बताकर पाच सौ रुपयों तक का दंड लगाया गया हैं। इससे यही साबित होता हैं की अंग्रेज केवल अपनी तिजोरी भरना चाहते थे।
पशुओं का ज़ब्त होना अक्सर गरीब पशुपालक की आजीविका पर सीधा हमला होता था। पशु मालिक अपने जानवरों को बचाने के लिए स्वाभाविक रूप से विरोध करते थे। इस प्रावधान ने स्थानीय ज़मींदारों और पुलिस को बलपूर्वक विरोध करने वाले किसी भी किसान या चरवाहे पर मुकदमा चलाने और उन्हें जेल भेजने का कानूनी हथियार प्रदान किया। यह एक ऐसी नीति थी जिसने असहमति या प्रतिरोध के अंतिम प्रयास को भी कठोरता से कुचलने का काम किया। इस धारा ने विरोध को आपराधिक कृत्य घोषित करके, ब्रिटिश प्रशासन की शक्ति का उपयोग व्यक्तिगत संपत्ति और राजस्व हितों के पक्ष में किया।
छह महीने तक के कारावास का प्रावधान करना, अतिचार जैसे अपेक्षाकृत छोटे आर्थिक विवाद के लिए, अत्यंत कठोर दंड था। यह दण्ड स्पष्ट रूप से दमनकारी प्रकृति का था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण आबादी में भय पैदा करना और यह सुनिश्चित करना था कि कोई भी व्यक्ति ज़ब्ती की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का साहस न करे। यह धारा राजस्व वसूली श्रृंखला की रक्षा करती थी।
24.3 संशोधन हेतु सुझाव
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 24 पर विश्लेषणात्मक आलोचना इस कानून के सबसे दमनकारी और क्रूर चेहरे को उजागर करती है। यह अत्यंत विडंबनापूर्ण है कि जिस कानून में पीड़ित को अधिकतम प्रतिकर केवल 100 रुपये मिलता था, उसी कानून में अपने ही पशुओं को बचाने के प्रयास के लिए 500 रुपये का भारी जुर्माना और 6 महीने की जेल का प्रावधान था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
1) कलोनीअल नीति का अंत
ब्रिटिश काल में यह धारा पशुपालकों के “प्रतिरोध” को कुचलने के लिए बनाई गई थी। अंग्रेजों के लिए पशु केवल राजस्व का साधन थे, जबकि भारतीय परिवारों के लिए वे जीवन का आधार थे। नए अधिनियम में “विरोध” को सीधे अपराध मानने के बजाय, यह समझने की नीति अपनानी चाहिए कि विरोध का कारण क्या है। यदि जब्ती अवैध या रंजिशपूर्ण है, तो मालिक के प्रतिरोध को “आत्मरक्षा” के समान माना जाना चाहिए, न कि दंडनीय अपराध।
2) संविधान के साथ अनुरूपता
6 महीने का कारावास और 500 रुपये का जुर्माना अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के विरुद्ध एक असंगत दंड है। अतिचार जैसे दीवानी (Civil) प्रकृति के मामले को इतनी कठोर आपराधिक सजा में बदलना संवैधानिक मर्यादा के अनुकूल नहीं है। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि “कारावास” को केवल अत्यंत हिंसक और असाधारण मामलों के लिए आरक्षित रखा जाए और सामान्य विवादों को सुलह से निपटाया जाए।
3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता
ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं को ले जाते समय होने वाले विवादों को अक्सर पुलिस केस बना दिया जाता है। शहरी क्षेत्रों में, जहाँ आवारा पशुओं को पकड़ने के दौरान भीड़ द्वारा हमले होते हैं, वहां यह धारा सार्वजनिक सुरक्षा के लिए जरूरी है, लेकिन इसका उपयोग केवल वास्तविक अपराधियों के विरुद्ध होना चाहिए, न कि उन मालिकों के विरुद्ध जो केवल अनभिज्ञता के कारण विरोध कर रहे हैं।
4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार
यदि पशु को छुड़ाने या पकड़ने का विरोध होता है, तो मामले को तुरंत मजिस्ट्रेट के पास भेजने के बजाय स्थानीय ग्राम पंचायत या वार्ड समिति के सामने रखा जाना चाहिए। स्थानीय निकाय यह तय कर सकते हैं कि क्या विरोध जायज था या नहीं। इससे निर्दोष पशुपालकों को जेल जाने से बचाया जा सकेगा।
5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन
विरोध और छुड़ाने के मामलों में 1996 के अधिनियम के तहत सुलह समिति का हस्तक्षेप अनिवार्य होना चाहिए। यदि मालिक अपनी गलती मानकर जुर्माना भरने को तैयार हो जाता है, तो उस पर “विरोध” का आपराधिक केस नहीं चलाया जाना चाहिए। सुलह के माध्यम से आपराधिक मुकदमों की संख्या को कम किया जा सकता है।
6) जब्त पशुओ का कल्याण
अक्सर पशु को छुड़ाने का विरोध इसलिए होता है क्योंकि मालिक को डर होता है कि कांजी हौस में पशु को प्रताड़ित किया जाएगा या वह भूखा मरेगा। यदि नए कानून में कांजी हौस के मानकों को उच्च रखा जाए और मालिक को पशु के स्वास्थ्य का आश्वासन मिले, तो प्रतिरोध की घटनाएं स्वतः कम हो जाएंगी।
7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी
आवारा पशुओं को पकड़ने के दौरान यदि कोई व्यक्ति बिना किसी कानूनी आधार के विरोध करता है, तो उसे दंडात्मक कार्यवाही के बजाय “सामाजिक सेवा” (Social Service) जैसे दंड दिए जाने चाहिए, जहाँ उसे पशुओं के टीकाकरण और नसबंदी अभियान में सहायता करनी पड़े।
8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति
आवासीय क्षेत्रों में यदि कोई पशु मालिक हिंसक तरीके से अपने पशु को छुड़ाता है जिसने किसी पर हमला किया था, तो उस पर सख्त आर्थिक शास्ति होनी चाहिए। यह राशि सीधे उस पीड़ित को सुरक्षा निधि के रूप में दी जानी चाहिए जिसे उस पशु ने चोट पहुंचाई है।
9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए
पुलिस का उपयोग डराने के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिए होना चाहिए। पशु पकड़ने की प्रक्रिया में “पशु मित्रों” की उपस्थिति अनिवार्य हो। यदि पशु मित्र प्रमाणित करते हैं कि जब्ती की प्रक्रिया मानवीय थी और मालिक ने बिना वजह हिंसा की, तभी कानूनी शास्ति लागू होनी चाहिए।
10) आधुनिकीकरण
पशुओं को पकड़ने और कांजी हौस ले जाने की पूरी प्रक्रिया की “बॉडी-वॉर्म कैमरा” या मोबाइल वीडियोग्राफी अनिवार्य होनी चाहिए। इससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि विरोध “बलपूर्वक” था या नहीं। डिजिटल साक्ष्यों के बिना किसी भी व्यक्ति को 6 महीने की जेल जैसे कठोर दंड के लिए आरोपित नहीं किया जाना चाहिए।
11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर
प्रत्येक क्षेत्र में “पशु विवाद मध्यस्थ” (Animal Dispute Mediators) नियुक्त किए जाने चाहिए। ये प्रशिक्षित युवा विरोध की स्थितियों में मालिक को शांत करने और उसे कानूनी प्रक्रिया समझाने का काम करेंगे। इससे विवाद हिंसक होने से बचेंगे और शिक्षित युवाओं को सामुदायिक पुलिसिंग और मध्यस्थता के क्षेत्र में रोजगार मिलेगा।
जेल की सजा का प्रावधान पशु अतिचर के मामले मे उचित नहीं हैं। हिंसक विरोध के मामलों मे सुलह समिति का हस्तक्षेप एवं पुलिस बल का संतुलित उपयोग कर विरोध के दोषियों को ज्यादा से ज्यादा जुर्माने की सजा दी जानी चाहिए।
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