पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 25

25.1 मूल प्रावधान

1[25. पशुओं द्वारा अतिचार कारित करने से हुई रिष्टि के लिए शास्ति की वसूली2[ठीक आगामी धारा के अधीन या] पशुओं द्वारा किसी भूमि पर अतिचार कारित करने से हुई रिष्टि के अपराध के लिए अधिरोपित कोई जुर्माना उन सब पशुओं या उनमें से किसी के विक्रय द्वारा वसूल किया जा सकेगा जिनके द्वारा अतिचार किया गया था चाहे वे अतिचार करते हुए अभिगृहीत किए गए थे या नहीं और चाहे वे अपराध के लिए सिद्धदोष व्यक्ति की सम्पत्ति हों या अतिचार किए जाने के समय उसके भाराधीन ही हों।

मूल प्रावधान की पादटिका

1. पशुओं का रेल पर अतिचार करने की दशा में धारा 25 के लागू होने के संबंध में देखिए भारतीय रेल अधिनियम, 1890 (1890 का 9) की धारा 125 (3)।

2. 1891 के अधिनियम सं० 1 की धारा 7 द्वारा अंतःस्थापित ।

25.2 विश्लेषणात्मक आलोचना

इस धारा के अनुसार पशुओं द्वारा अतिचार करने और उससे हुई हानि (रिष्टि) के लिए लगाए गए जुर्माने की वसूली पशुओं को बेचकर की जा सकती है। यह वसूली अतिचार के कारण हुई हानि के अपराध के लिए अधिरोपित किए गए जुर्माने के लिए की जाती है। जुर्माना उन सभी पशुओं या उनमें से कुछ को बेचकर वसूल किया जा सकता था जिनके द्वारा अतिचार किया गया था।

यह वसूली तीन शर्तों में से किसी के भी तहत की जा सकती थी। पहली चाहे पशुओं को अतिचार करते हुए मौके पर ही ज़ब्त किया गया हो या नहीं; दूसरी चाहे पशु अपराध के लिए सिद्धदोष (दोषी पाए गए) व्यक्ति की संपत्ति हों और तीसरी शर्त चाहे अतिचार किए जाने के समय वे पशु दोषी व्यक्ति के भारसाधीन ही क्यों न हों। इस प्रावधान में ब्रिटिश नीति का प्रभाव कठोर और प्रतिशोधात्मक वित्तीय दण्ड थोपने में और न्याय के सिद्धांतों को दरकिनार करके राजस्व वसूली को प्राथमिकता देने में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

यदि कोई पशुपालक अपने मवेशियों को अतिचार करने के बाद वापस ले जाता है, तो भी बाद में सरकारी अधिकारी उस पर जुर्माना लगाने के बाद, उसके घर से उन पशुओं को बेचकर जुर्माना वसूल सकते हैं। यह प्रावधान संपत्ति की सुरक्षा के सिद्धांत का घोर उल्लंघन था और इसने ग्रामीण आबादी पर स्थायी डर और अनिश्चितता का माहौल बना दिया।

यह धारा दोषी व्यक्ति पर लगाए गए जुर्माने की वसूली उसकी संपत्ति से या उसके नियंत्रण में रहे पशुओं से करती है। यह सुनिश्चित करता था कि भले ही मालिक सीधे तौर पर दोषी न हो, लेकिन यदि पशु उसके नियंत्रण में थे, तो भी वह जुर्माने की वसूली के लिए ज़िम्मेदार होगा। यह एक कठोर दायित्व थोपता था जो गरीब और अनपढ़ भारतीयों के लिए न्याय की माँग को और जटिल बनाता था।

इस धारा ने औपनिवेशिक तंत्र को एक शक्तिशाली उपकरण दिया, जिससे वे न्यायिक प्रक्रिया के बावजूद भी पशुओं को बेचकर अनिवार्य रूप से अपने जुर्मानों को वसूल सकें। यह जुर्माने की वसूली को सशस्त्र पुलिसिया कार्रवाई का रूप दे सकता था। इस तरह यह धारा केवल राजस्व को प्राथमिकता देती हैं।

25.3 संशोधन हेतु सुझाव

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 25 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कैसे अंग्रेजों ने राजस्व वसूली के लिए एक ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया था, जिससे कोई भी पशुपालक बच न सके। यह धारा न केवल दमनकारी थी, बल्कि ‘न्याय के प्राकृतिक सिद्धांतों’ के भी विरुद्ध थी क्योंकि इसमें पशुओं को कभी भी और कहीं से भी उठाकर बेचने की शक्ति दी गई थी। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:

1) कलोनीअल नीति का अंत

ब्रिटिश काल में इस धारा का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना था कि सरकारी खजाने में जुर्माना पहुंचना चाहिए, चाहे उसके लिए किसी की पूरी आजीविका ही क्यों न छीन ली जाए। नए अधिनियम में “प्रतिशोधात्मक वसूली” की इस नीति को समाप्त कर “पारदर्शी उत्तरदायित्व” की नीति अपनानी चाहिए। वसूली के लिए केवल पशुओं को ही निशाना बनाने के बजाय अन्य वित्तीय विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि पशुपालक का आधारभूत जीवन प्रभावित न हो।

2) संविधान के साथ अनुरूपता

यह धारा अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) का सीधा उल्लंघन करती है, क्योंकि यह अधिकारियों को किसी भी समय पशुओं को जब्त कर बेचने की असीमित शक्ति देती है। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि वसूली की प्रक्रिया में मानवीय गरिमा और अनुच्छेद 21 के तहत आजीविका के अधिकार का सम्मान किया जाए। किसी भी कुर्की या बिक्री से पहले मालिक को नोटिस और सुनवाई का अधिकार मिलना अनिवार्य होगा।

3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता

ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ पशु ही किसान की एकमात्र संपत्ति है, वहां इस प्रकार की कठोर वसूली पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए। शहरी क्षेत्रों में, जहाँ व्यावसायिक डेयरी संचालक जानबूझकर पशुओं को सड़कों पर छोड़ते हैं, वहां जुर्माने की वसूली सख्त हो सकती है, लेकिन उसका तरीका पारदर्शी और डिजिटल रिकॉर्ड पर आधारित होना चाहिए। फैशन के लिए पाले हुए पशुओं को भी इसमे सम्मिलित किया जाना चाहिए। कुत्ता, बिल्ली, पंछी पालना एक फैशन हो चुका हैं।

4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार

पशुओं को बेचकर जुर्माना वसूलने का निर्णय किसी पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट के बजाय स्थानीय ग्राम पंचायत या वार्ड समिति की अनुशंसा पर होना चाहिए। स्थानीय निकाय यह तय करेंगे कि क्या मालिक वास्तव में भुगतान करने में असमर्थ है या वह जानबूझकर कानून तोड़ रहा है। इससे अनावश्यक कठोरता पर लगाम लगेगी।

5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन

धारा 25 के तहत वसूली की नौबत आने से पहले सुलह समिति का हस्तक्षेप अनिवार्य होना चाहिए। 1996 के अधिनियम के सिद्धांतों के आधार पर, समिति यह प्रयास करेगी कि क्या जुर्माना किश्तों में दिया जा सकता है या क्या पशुओं को बेचे बिना कोई अन्य समाधान संभव है।

6) जब्त पशुओ का कल्याण

यदि जुर्माना वसूली के लिए पशुओं को बेचना ही पड़े, तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नीलामी से पहले और नीलामी के दौरान पशुओं के कल्याण (भोजन, पानी, चिकित्सा) की पूरी जिम्मेदारी विभाग की होगी। पशु को “वस्तु” के बजाय “जीवित इकाई” मानकर उसके साथ क्रूरता न करने के कड़े नियम होने चाहिए।

7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी

ऐसी स्थितियों में जहाँ पशु किसी व्यक्ति के भारसाधीन थे पर उनका कोई स्पष्ट मालिक नहीं है, वहां से वसूल की गई राशि का उपयोग सीधे उसी क्षेत्र के आवारा पशुओं के टीकाकरण और नसबंदी के लिए किया जाना चाहिए। इससे वसूली का लाभ सीधे समाज और पशुओं को मिलेगा।

8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति

आवासीय क्षेत्रों में पशुओं की बिक्री से प्राप्त राशि का पहला हिस्सा उस पीड़ित को मिलना चाहिए जिसकी संपत्ति या शरीर को नुकसान पहुँचा है। ब्रिटिश कानून में यह पैसा राजस्व में जाता था, जबकि नए कानून में इसे “पीड़ित पुनर्वास” के लिए उपयोग किया जाना चाहिए।

9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए

पशुओं की जब्ती और बिक्री की प्रक्रिया के दौरान “पशु मित्रों” की उपस्थिति अनिवार्य होनी चाहिए ताकि पुलिसिया कार्रवाई के नाम पर पशुओं या मालिकों के साथ अभद्रता न हो। पशु मित्र यह सुनिश्चित करेंगे कि केवल उन्हीं पशुओं को लिया जाए जो कानून के दायरे में आते हैं।

10) आधुनिकीकरण

पशुओं की पहचान के लिए “डिजिटल टैगिंग” और “ई-कुर्की” (e-Attachment) का उपयोग होना चाहिए। यदि किसी पशु द्वारा अतिचार हुआ है, तो उसका रिकॉर्ड डिजिटल पोर्टल पर होना चाहिए।

11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर

इस पूरी व्यवस्था के प्रबंधन के लिए प्रत्येक जिले में “पशु संपदा अधिकारी” और “डिजिटल सर्वेक्षक” के पद सृजित किए जा सकते हैं। स्थानीय युवा इन पदों पर रहकर वसूली की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने और पशुपालकों को तकनीकी सहायता प्रदान करने का कार्य करेंगे, जिससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

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