पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 26

26.1 मूल प्रावधान

26. सुअरों द्वारा भूमि फसलों अथवा सार्वजनिक सड़कों को किए गए नुकसान के लिए शास्ति – सुअरों का कोई स्वामी या रखवाला जो किसी भूमि या भूमि की किसी फसल या उपज अथवा किसी सार्वजनिक सड़क पर ऐसे सुअरों को अतिचार करने देते हुए उपेक्षा से या अन्यथा उसका नुकसान करेगा या नुकसान कराएगा अथवा करने देगा वह मजिस्ट्रेट के समक्ष सिद्धदोष होने पर दस रुपए से अनधिक के जुर्माने से दंडित किया जाएगा।

1[राज्य सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, समय-समय पर, अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किसी स्थानीय क्षेत्र के संबंध में निदेश दे सकेगी कि इस धारा का पूर्वगामी भाग ऐसे पढ़ा जाएगा मानो उसमें केवल सुअरों के प्रति निर्देश के स्थान पर पशुओं के प्रति साधारणतया या अधिसूचना में वर्णित प्रकार के पशुओं के प्रति निर्देश हो अथवा मानो “दस रुपए” शब्दों के लिए “पचास रुपए” शब्द प्रतिस्थापित कर दिए हों अथवा मानो उसमें ऐसा निर्देश और ऐसा प्रतिस्थापन दोनों हों ।]

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मूल प्रावधान की पादटिका

1. 1891 के अधिनियम सं० 1 की धारा 8 द्वारा अंतःस्थापित ।

2. 1914 के अधिनियम सं० 10 की धारा 26 द्वारा अंतिम पैरा निरसित ।

26.2 आलोचनात्मक विश्लेषण

यह धारा विशेष रूप से सुअरों द्वारा किए गए अतिचार और नुकसान पर ध्यान केंद्रित करती है, लेकिन बाद में सरकार को अन्य पशुओं के लिए भी इसी तरह के दंड को लागू करने का अधिकार देती है। यह दंड की राशि और उसके विस्तार से संबंधित है।

सुअरों का मालिक या रखवाला जो उपेक्षा (लापरवाही) से या जानबूझकर सुअरों को अतिचार करने देता है जिससे किसी निजी भूमि, फसल, उपज, या सार्वजनिक सड़क को नुकसान होता है, वह दोषी माना जाता था। मजिस्ट्रेट के समक्ष दोषी पाए जाने पर, उसे अधिक से अधिक दस रुपये (₹10) के जुर्माने से दंडित किया जाता था।

सरकार को शासकीय राजपत्र में अधिसूचना जारी करके यह निर्देश देने की शक्ति है कि यह धारा किसी विशिष्ट स्थानीय क्षेत्र में केवल सुअरों के बजाय, साधारण तौर पर ‘पशुओं’ पर लागू होगी, या अधिसूचना में वर्णित किसी विशेष प्रकार के पशुओं पर लागू होगी। राज्य सरकार यह भी निर्देश दे सकती है कि जहाँ “दस रुपए” शब्द का उल्लेख है, उसे “पचास रुपए” शब्दों से बदल दिया जाए। सरकार दोनों (पशुओं का विस्तार और जुर्माने में वृद्धि) एक साथ भी कर सकती है।

सुअरों को कानून में विशेष रूप से शामिल करना (धारा 10 और 11 में सामान्य पशुओं के अलावा) औपनिवेशिक भारत के सामाजिक और जातीय संदर्भ से जुड़ा था। सुअर अक्सर समाज के निम्न जाति/वर्ग द्वारा पाले जाते थे। इस धारा ने स्थानीय अधिकारियों और उच्च वर्ग के ज़मींदारों को निम्न वर्ग के पशुपालकों पर जुर्माना लगाने और उन्हें परेशान करने का एक कानूनी उपकरण दिया। दस रुपये का जुर्माना उस समय ग्रामीण गरीबों के लिए एक बड़ी राशि थी। इस तरह, ब्रिटिश कानून ने साधनहीन समुदायों को लक्षित करने और उन पर आर्थिक दंड थोपने के लिए एक तंत्र प्रदान किया।

धारा 26 ब्रिटिश नीति की उस रणनीति को दर्शाती है जिसके तहत उन्होंने समाज के कमजोर वर्गों के पालतू जानवरों को लक्षित किया, और केंद्रीकृत शक्ति का उपयोग करके मनमाने ढंग से आर्थिक दंड को बढ़ाने का प्रावधान किया, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि औपनिवेशिक व्यवस्था के कृषि और राजस्व हित सामाजिक न्याय की परवाह किए बिना सुरक्षित रहें।

26.3 संशोधन हेतु सुझाव

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 26 पर विश्लेषणात्मक आलोचना इस कानून के एक और भेदभावपूर्ण और दमनकारी पहलू को सामने लाती है। विशेष रूप से सुअरों का उल्लेख करना और फिर राज्य सरकार को जुर्माने की राशि मनमाने ढंग से बढ़ाने की शक्ति देना, औपनिवेशिक तंत्र की उस मानसिकता को दर्शाता है जो सामाजिक रूप से वंचित वर्गों को लक्षित करती थी। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:

1) कलोनीअल नीति का अंत

ब्रिटिश काल में सुअरों को विशेष रूप से लक्षित करना सामाजिक और जातीय भेदभाव पर आधारित था। नए अधिनियम में किसी विशेष पशु के आधार पर कानून बनाने की इस भेदभावपूर्ण नीति को पूरी तरह समाप्त किया जाना चाहिए। कानून “पशु विशेष” के बजाय “नुकसान की प्रकृति” और “मालिक की जिम्मेदारी” पर आधारित होना चाहिए, ताकि किसी भी समुदाय विशेष को प्रताड़ित न किया जा सके।

2) संविधान के साथ अनुरूपता

यह धारा अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) की भावना के प्रतिकूल है। राज्य सरकार को बिना किसी स्पष्ट मापदंड के केवल अधिसूचना द्वारा जुर्माना पांच गुना बढ़ाने की शक्ति देना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि जुर्माने की दरें तर्कसंगत हों और उनके निर्धारण में स्थानीय परिस्थितियों का वैज्ञानिक और निष्पक्ष मूल्यांकन शामिल हो।

3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता

ग्रामीण क्षेत्रों में सुअर पालन अक्सर भूमिहीन और सीमांत समुदायों की आजीविका का मुख्य साधन होता है। वहां दंडात्मक कार्यवाही के बजाय उनके लिए सुरक्षित बाड़ों (Enclosures) के निर्माण पर जोर देना चाहिए। शहरी क्षेत्रों में, जहाँ सार्वजनिक सड़कों पर पशुओं के कारण स्वच्छता और यातायात की समस्या होती है, वहां जुर्माना “सफाई और प्रबंधन शुल्क” के रूप में लिया जाना चाहिए, न कि केवल दमन के रूप में।

4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार

सार्वजनिक सड़कों या फसलों को हुए नुकसान के मामलों को मजिस्ट्रेट के पास ले जाने के बजाय स्थानीय वार्ड समिति या ग्राम पंचायत द्वारा सुलझाया जाना चाहिए। स्थानीय निकाय यह तय कर सकते हैं कि क्या नुकसान जानबूझकर किया गया था या यह केवल एक दुर्घटना थी। इससे छोटे पशुपालकों को बेवजह अदालती कार्यवाही से सुरक्षा मिलेगी।

5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन

धारा 26 के तहत उत्पन्न विवादों को सुलह समिति के माध्यम से हल किया जाना चाहिए। 1996 के अधिनियम के सिद्धांतों का पालन करते हुए, समिति यह सुनिश्चित करेगी कि यदि नुकसान छोटा है, तो पशुपालक को केवल चेतावनी या न्यूनतम हर्जाने पर छोड़ दिया जाए। यह समुदायों के बीच आपसी सामंजस्य बनाए रखने में सहायक होगा।

6) जब्त पशुओ का कल्याण

यदि किसी विवाद के कारण पशु को जब्त किया जाता है, तो कानून में यह स्पष्ट होना चाहिए कि पशु की प्रजाति के आधार पर उसके साथ कोई भेदभाव नहीं होगा। हर पशु को समान रूप से स्वच्छ आवास, पर्याप्त भोजन और चिकित्सा सुविधा मिलनी चाहिए। सुअर जैसे पशुओं के लिए स्वच्छता के विशेष मानकों का पालन कांजी हौस में सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी

अधिनियम में केवल दंड देने के बजाय, आवारा पशुओं (सुअर सहित) के लिए व्यवस्थित टीकाकरण और जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम का प्रावधान होना चाहिए। जुर्माने से प्राप्त राशि का उपयोग इन पशुओं की नसबंदी और उनके लिए चिन्हित क्षेत्रों के विकास हेतु किया जाना चाहिए, ताकि वे फसलों या सड़कों तक न पहुँचें।

8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति

आवासीय क्षेत्रों में यदि किसी पशु के कारण सार्वजनिक संपत्ति या फसल का नुकसान होता है, तो प्राप्त जुर्माने का एक निश्चित हिस्सा उस क्षेत्र के सौंदर्यीकरण और मरम्मत के लिए उपयोग किया जाना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को नुकसान हुआ है, तो उसे त्वरित और उचित क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिए।

9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए

पशुपालकों, विशेषकर वंचित समुदायों के उत्पीड़न को रोकने के लिए “पशु मित्रों” की भूमिका महत्वपूर्ण होनी चाहिए। वे यह सुनिश्चित करेंगे कि पुलिस या प्रभावशाली लोग इस धारा का उपयोग किसी गरीब पशुपालक को डराने के लिए न करें। पुलिस की भूमिका केवल शांति व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित होनी चाहिए।

10) आधुनिकीकरण

जुर्माने की राशि को राजपत्र में अधिसूचित करने के बजाय, इसे स्थानीय निकायों के डिजिटल डैशबोर्ड पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए। “नुकसान” का आकलन करने के लिए फोटो और वीडियो साक्ष्यों का उपयोग अनिवार्य हो, ताकि भ्रष्टाचार और झूठे आरोपों की गुंजाइश खत्म हो सके।

11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर

स्थानीय स्तर पर ‘पशु आवास पर्यवेक्षकों’ और ‘स्वच्छता सहायकों’ की नियुक्ति की जा सकती है जो पशुपालकों को आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से पशुपालन का प्रशिक्षण देंगे। यह न केवल विवादों को कम करेगा, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए सेवा-आधारित रोजगार के नए द्वार भी खोलेगा।

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