पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 27

27.1 मूल प्रावधान

27. कर्तव्य पालन में असफल होने वाले कांजी हौस रखवाले पर शास्ति – कोई कांजी हौस रखवाला जो धारा 19 के उपबंधों के प्रतिकूल पशुओं का निर्मोचन अथवा क्रय या परिदान करेगा, या किन्हीं परिरुद्ध पशुओं के लिए पर्याप्त खाने और जल की व्यवस्था करने में लोप करेगा, या इस अधिनियम द्वारा उस पर अधिरोपित अन्य कर्तव्यों में से किसी का पालन करने में असफल होगा वह किसी अन्य शास्ति के अलावा, जिसके वह दायित्वाधीन हो, मजिस्ट्रेट के समक्ष सिद्धदोष होने पर, पचास रुपए से अनधिक के जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

ऐसे जुर्माने कांजी हौस रखवाले के वेतन में से कटौतियों द्वारा वसूल किए जा सकेंगे।

27.2 आलोचनात्मक विश्लेषण

यह धारा उन स्थितियों के लिए दंड निर्धारित करती है जब कांजी हौस का रखवाला अधिनियम द्वारा उस पर लगाए गए कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहता है या जानबूझकर कानून तोड़ता है। यदि रखवाला धारा 19 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए पशुओं को अवैध रूप से रिहा करता है, उनका क्रय (खरीद) करता है, या परिदान (डिलीवरी) करता है; यदि वह किसी भी ज़ब्त पशुओं के लिए पर्याप्त खाने और जल की व्यवस्था करने में विफल रहता है; यदि वह इस अधिनियम द्वारा उस पर अधिरोपित किए गए अन्य किसी भी कर्तव्य (जैसे रजिस्टर रखना, रिपोर्ट देना) का पालन करने में विफल रहता है; तो उसे दोषी मान इस धारा के तहत दंड दिया जा सकता था।

दंड के रूप मे उपरोक्त अपराधों के लिए दोषी पाए जाने पर, मजिस्ट्रेट के समक्ष सिद्धदोष होने पर, उसे ज्यादा से ज्यादा पचास रुपये (₹50) के जुर्माने से दंडित किया जा सकता था। यह जुर्माना कांजी हौस रखवाले के वेतन में से कटौतियों द्वारा वसूल किया जा सकता था। पचास रुपये तक का जुर्माना रखवाले के गंभीर अपराधों (जैसे अवैध निर्मोचन या पशुओं को भूखा रखना) के अनुपात में कम था। इस कम जुर्माने ने यह सुनिश्चित किया कि रखवाले को कोई गंभीर परिणाम न भुगतना पड़े, और वह मामूली रिश्वत या अवैध लाभ के लालच में कानून तोड़ता रहे। पशुओं को पर्याप्त भोजन और पानी न देना एक गंभीर क्रूरता थी, जिसका सीधा दंड ₹50 तक सीमित था। यह दर्शाता है कि ब्रिटिश प्रशासन की प्राथमिक चिंता पशुओं की देखभाल या मालिक के प्रति न्याय से अधिक प्रशासनिक व्यवस्था को बनाए रखना थी। जुर्माने को सीधे वेतन से कटौती द्वारा वसूल करने का प्रावधान यह सुनिश्चित करता था कि सरकार को पैसा वसूलने के लिए कोई जटिल कानूनी प्रक्रिया नहीं करनी पड़ेगी। यह राजस्व वसूली में दक्षता को दर्शाता है।

27.3 संशोधन हेतु सुझाव

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 27 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कैसे अंग्रेजों ने अधिकारियों की गलतियों और पशुओं के प्रति क्रूरता के लिए बहुत ही नरम रुख अपनाया था। जहाँ पशुपालकों के लिए भारी जुर्माने और जेल का प्रावधान था, वहीं रखवाले की गंभीर लापरवाही (जैसे पशुओं को भूखा रखना) के लिए मात्र 50 रुपये का मामूली दंड देना औपनिवेशिक न्याय के दोहरे मापदंडों को दर्शाता है। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:

1) कलोनीअल नीति का अंत

ब्रिटिश काल में रखवाले के लिए दंड की राशि बहुत कम थी, जिससे वह जवाबदेही के प्रति लापरवाह रहता था। नए अधिनियम में “अधिकारी संरक्षण” की इस नीति को समाप्त कर “शून्य सहिष्णुता” (Zero Tolerance) की नीति अपनानी चाहिए। यदि रखवाला पशुओं को भोजन-पानी देने में विफल रहता है या भ्रष्टाचार करता है, तो दंड की राशि न केवल बढ़ाई जानी चाहिए, बल्कि उसे सेवा से बर्खास्त करने जैसे कठोर प्रशासनिक प्रावधान भी होने चाहिए।

2) संविधान के साथ अनुरूपता

यह धारा अनुच्छेद 51A के अंतर्गत पशुओं के प्रति मानवीय व्यवहार और अनुच्छेद 14 के तहत उत्तरदायित्व की समानता का उल्लंघन करती है। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि “कर्तव्य में लापरवाही” को केवल एक विभागीय मामला न मानकर एक दंडनीय अपराध माना जाए। रक्षक ही जब भक्षक बन जाए, तो उसके लिए सजा आम नागरिक से अधिक कड़ी होनी चाहिए।

3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता

ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ कांजी हौस अक्सर दूरस्थ होते हैं और निरीक्षण कम होता है, वहां रखवाले की लापरवाही पशु की जान ले सकती है। शहरी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार (रिश्वत लेकर पशु छोड़ना) की समस्या अधिक है। नए कानून में इन दोनों स्थितियों के लिए अलग-अलग और प्रभावी मापदंड होने चाहिए ताकि रखवाला अपने निजी लाभ के लिए कानून का दुरुपयोग न करे।

4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार

रखवाले के विरुद्ध शिकायतों की जांच का अधिकार स्थानीय निकाय को दिया जाना चाहिए। स्थानीय ग्राम पंचायत या नगर निकाय की “पशु कल्याण समिति” को रखवाले के कार्यों का साप्ताहिक ऑडिट करने और लापरवाही पाए जाने पर तुरंत दंड प्रस्तावित करने का अधिकार होना चाहिए। स्थानीय निगरानी से जवाबदेही बढ़ेगी। ऑडिट एवं जांच के बाद स्थानीय निकाय जो भी निर्णय दे भले ही उसके लिए अपील के अधिकार कांजी हौस के कर्मचारियों को दिए जाने चाहिए।

5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन

यदि रखवाले की लापरवाही से पशु को कोई स्थाई क्षति पहुँचती है, तो 1996 के अधिनियम के सिद्धांतों के तहत सुलह समिति यह तय करेगी कि रखवाला निजी तौर पर मालिक को कितना हर्जाना देगा। यह प्रक्रिया विभागीय कार्यवाही से स्वतंत्र होनी चाहिए ताकि मालिक को तुरंत राहत मिले।

6) जब्त पशुओ का कल्याण

पशुओं को पर्याप्त भोजन और जल न देना “पशु क्रूरता निवारण अधिनियम” के तहत भी अपराध माना जाना चाहिए। नए कानून में यह अनिवार्य हो कि यदि रखवाले की लापरवाही से पशु की मृत्यु होती है, तो उस पर आपराधिक मुकदमा चलाया जाए। पशु कल्याण को केवल ₹50 के जुर्माने तक सीमित रखना एक सभ्य समाज के लिए अस्वीकार्य है।

7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी

यदि रखवाला आवारा पशुओं के टीकाकरण या नसबंदी के रिकॉर्ड में हेराफेरी करता है या पकड़े गए आवारा पशुओं को बिना प्रक्रिया पूर्ण किए छोड़ देता है, तो उस पर भारी आर्थिक दंड लगाया जाना चाहिए। यह दंड राशि सीधे पशुओं के चिकित्सा बजट में जोड़ी जानी चाहिए।

8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति

आवासीय क्षेत्रों में यदि रखवाला किसी रसूखदार मालिक के दबाव में आकर बिना जुर्माना वसूले पशु छोड़ देता है, तो वह जुर्माना स्वयं रखवाले के वेतन से वसूला जाना चाहिए। साथ ही, उस क्षेत्र के पीड़ित व्यक्ति को हुई परेशानी के लिए रखवाले को उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए।

9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए

कांजी हौस में पशुओं की स्थिति की निगरानी के लिए स्थानीय “पशु मित्रों” को “स्वतंत्र निरीक्षक” (Independent Inspectors) की शक्तियां दी जानी चाहिए। वे किसी भी समय कांजी हाउस का औचक निरीक्षण कर सकेंगे और उनकी रिपोर्ट के आधार पर रखवाले के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई की जा सकेगी।

10) आधुनिकीकरण

कांजी हौस में पशुओं के भोजन और पानी की व्यवस्था की निगरानी के लिए सीसीटीवी (CCTV) और डिजिटल स्टॉक रजिस्टर अनिवार्य होना चाहिए। पशुओं की संख्या और उनके स्वास्थ्य का डेटा रीयल-टाइम में पोर्टल पर अपडेट होना चाहिए। तकनीक का उपयोग रखवाले की मानवीय गलतियों और भ्रष्टाचार को रोकने में प्रभावी होगा।

11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर

कांजी हौस के प्रबंधन को पेशेवर बनाने के लिए ‘पशु गृह प्रबंधकों’ (Animal Shelter Managers) और ‘पशु कल्याण निरीक्षकों’ के नए पद सृजित किए जाने चाहिए। स्थानीय युवाओं को इन भूमिकाओं में नियुक्त कर उन्हें प्रशिक्षित किया जा सकता है, जिससे व्यवस्था में सुधार होगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

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