28.1 मूल प्रावधान
28. धारा 25, 26 या 27 के अधीन वसूल किए गए जुर्मानों का उपयोजन – धारा 25, धारा 26 या धारा 27 के अधीन वसूल किए गए सब जुर्माने सिद्धदोष करने वाले मजिस्ट्रेट को समाधानप्रद रूप में साबित हानि या नुकसान के लिए प्रतिकर के रूप में पूर्णतः या भागतः विनियोजित किए जा सकेंगे।
28.2 विश्लेषणात्मक आलोचना
यह धारा बताती है कि धारा 25 (पशुओं द्वारा अतिचार से हुई हानि), धारा 26 (सुअरों द्वारा अतिचार), और धारा 27 (कर्तव्य में असफल रहने वाले रखवाले) के तहत वसूल किए गए सभी जुर्मानों का क्या किया जाएगा? इन जुर्मानों का उपयोग पूर्णतः या भागतः (पूरी तरह से या आंशिक रूप से) उन लोगों को प्रतिकर (मुआवजा) देने के लिए किया जा सकता था, जिन्हें सिद्धदोष करने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष हानि या नुकसान संतोषजनक रूप से सिद्ध हो गया था। जुर्माने की राशि का कितना हिस्सा प्रतिकर के रूप में दिया जाएगा, यह तय करने का विवेक पूरी तरह से मजिस्ट्रेट के पास होता था।
यह प्रावधान स्पष्ट रूप से कहता है कि जुर्माना केवल तभी प्रतिकर के रूप में दिया जाएगा जब नुकसान मजिस्ट्रेट को समाधानप्रद रूप में साबित हो जाए। यह शर्त गरीब और अनपढ़ भारतीय किसान पर सबूत और कानूनी औपचारिकता का एक और बोझ डालती थी। मजिस्ट्रेट, जो औपनिवेशिक हितों की रक्षा करता था, आसानी से नुकसान को ‘समाधानप्रद’ नहीं मानता था, जिससे पीड़ित को मुआवज़ा मिलना अनिश्चित हो जाता था। इससे यह सुनिश्चित किया जाता था कि स्थानीय समुदायों को सीधे जुर्माने का लाभ न मिले, और यदि मजिस्ट्रेट को लगता था कि पैसा राज्य के राजस्व के लिए अधिक महत्वपूर्ण है, तो वह आसानी से इसे प्रतिकर के रूप में वितरित न करके सरकारी खजाने में जाने दे सकता था।
जबकि धारा 22 में अवैध ज़ब्ती के लिए ₹100 तक का प्रतिकर सीमित था, यह धारा वैध ज़ब्ती के बाद हुए नुकसान के लिए जुर्माने की राशि तक ही प्रतिकर को सीमित करती थी। यदि नुकसान की राशि वसूल किए गए जुर्माने से अधिक थी, तो भी पीड़ित को पूरा मुआवजा नहीं मिलता था।
28.3 संशोधन हेतु सुझाव
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 28 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कैसे अंग्रेजों ने “न्याय” को मजिस्ट्रेट के विवेक की बेड़ियों में जकड़ रखा था। यह धारा दिखाती है कि नुकसान की भरपाई करना शासन की प्राथमिकता नहीं थी, बल्कि यह केवल एक विकल्प (option) था जिसे मजिस्ट्रेट अपनी मर्जी से चुन सकता था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
1) कलोनीअल नीति का अंत
ब्रिटिश काल में जुर्माने की राशि का उपयोग मुआवजे के लिए करना अनिवार्य नहीं था, यह केवल “किया जा सकेगा” (may be) तक सीमित था। नए अधिनियम में इस विवेकाधीन शक्ति को समाप्त कर “अनिवार्य क्षतिपूर्ति” (Mandatory Compensation) की नीति अपनानी चाहिए। वसूल किए गए जुर्माने का पहला और प्राथमिक उद्देश्य पीड़ित व्यक्ति के नुकसान की शत-प्रतिशत भरपाई करना और पशु कल्याण होना चाहिए, न कि सरकारी राजस्व बढ़ाना।
2) संविधान के साथ अनुरूपता
यह धारा अनुच्छेद 300A और अनुच्छेद 14 के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है क्योंकि यह नुकसान साबित करने का पूरा बोझ पीड़ित पर डालती है और मुआवजे को मजिस्ट्रेट की इच्छा पर छोड़ देती है। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि “नुकसान का आकलन” करने की प्रक्रिया सरल हो और मुआवजा मिलना पीड़ित का कानूनी अधिकार हो, न कि मजिस्ट्रेट की कृपा।
3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता
ग्रामीण क्षेत्रों में फसल के नुकसान का पंचनामा स्थानीय स्तर पर होना चाहिए ताकि उसे सुलह समिति के सामने साबित करना आसान हो। शहरी क्षेत्रों में, जहाँ सार्वजनिक संपत्ति या किसी वाहन को पशु के कारण नुकसान पहुँचता है, वहां जुर्माने की राशि का उपयोग तुरंत मरम्मत और पीड़ित की सहायता के लिए होना चाहिए।
4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार
नुकसान “समाधानप्रद रूप में साबित” हुआ है या नहीं, इसका निर्णय मजिस्ट्रेट के बजाय स्थानीय ग्राम पंचायत या वार्ड समिति की रिपोर्ट के आधार पर होना चाहिए। स्थानीय निकाय घटनास्थल के गवाह होते हैं, इसलिए उनकी रिपोर्ट को प्राथमिक साक्ष्य माना जाना चाहिए ताकि पीड़ित को अदालती दलीलों में न उलझना पड़े।
5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन
धारा 28 के तहत जुर्माने के विनियोजन (Appropriation) के लिए सुलह समिति एक प्रभावी माध्यम बन सकती है। 1996 के अधिनियम के सिद्धांतों के तहत समिति यह तय कर सकती है कि जुर्माने की कितनी राशि पीड़ित को मिलनी चाहिए और कितनी व्यवस्था सुधार के लिए। इससे विवाद का अंत संतुष्टिपूर्ण तरीके से होगा।
6) जब्त पशुओ का कल्याण
यदि वसूल किया गया जुर्माना नुकसान की भरपाई के बाद बच जाता है, तो उस अधिशेष (Surplus) राशि का उपयोग अनिवार्य रूप से कांजी हाउस के आधुनिकीकरण और वहां रह रहे पशुओं के पोषण के लिए किया जाना चाहिए। धन का चक्र पशुओं और पीड़ितों के इर्द-गिर्द ही घूमना चाहिए।
7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी
ऐसी स्थितियों में जहाँ कोई व्यक्तिगत पीड़ित नहीं है (जैसे सार्वजनिक मार्ग पर अतिचार), वहां वसूल किए गए जुर्माने का उपयोग पूरी तरह से उसी क्षेत्र के आवारा पशुओं के टीकाकरण और नसबंदी के लिए किया जाना चाहिए। इससे कानून का सकारात्मक प्रभाव समाज पर पड़ेगा।
8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति
आवासीय क्षेत्रों में पशु हमले या गंदगी के कारण हुए नुकसान के लिए जुर्माने की राशि सीधे पीड़ित के बैंक खाते में जमा होनी चाहिए। क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया “कैशलेस” और “त्वरित” होनी चाहिए ताकि पीड़ित को न्याय का अहसास हो।
9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए
नुकसान के आकलन के समय “पशु मित्रों” की उपस्थिति अनिवार्य होनी चाहिए। वे एक निष्पक्ष गवाह के रूप में सुलह समिति को अपनी रिपोर्ट देंगे, जिससे प्रभावशाली लोगों द्वारा नुकसान को कम करके दिखाने या अधिकारियों द्वारा भ्रष्टाचार करने की संभावना समाप्त हो जाएगी।
10) आधुनिकीकरण
नुकसान के साक्ष्यों (Photos/Videos) को एक डिजिटल पोर्टल पर अपलोड करना अनिवार्य होना चाहिए। सुलह समिति को भौतिक रूप से साक्ष्य देखने के बजाय डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर मुआवजे का फैसला करना चाहिए। जुर्माने से मुआवजे तक के पूरे सफर की रीयल-टाइम ट्रैकिंग ऑनलाइन होनी चाहिए।
11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर
नुकसान का आकलन करने के लिए प्रत्येक ब्लॉक में “ग्रामीण क्षति मूल्यांकनकर्ता” (Rural Damage Assessors) के पद सृजित किए जा सकते हैं। स्थानीय शिक्षित युवाओं को कृषि और पशु प्रबंधन का प्रशिक्षण देकर इन पदों पर नियुक्त किया जा सकता है, जो सुलह समिति को सटीक रिपोर्ट देंगे और त्वरित न्याय सुनिश्चित करेंगे।
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