29.1 मूल प्रावधान
अध्याय 7 प्रतिकर के लिए वाद
29. प्रतिकर के लिए वाद लाने के अधिकार की व्यावृत्ति – इसमें अन्तर्विष्ट कोई बात किसी व्यक्ति को, जिसकी भूमि की फसलों या अन्य उपज को पशुओं के अतिचार से नुकसान हुआ हो, किसी सक्षम न्यायालय में प्रतिकर के लिए वाद लाने से प्रतिषिद्ध नहीं करती है।
29.2 विश्लेषणात्मक आलोचना
यह धारा एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी आश्वासन देती है। वह व्यक्ति जिसकी भूमि, फसल, या अन्य उपज को पशुओं के अतिचार (अनधिकृत प्रवेश) से नुकसान हुआ था; इस अधिनियम में शामिल कोई भी बात (जैसे जुर्माने का प्रावधान या मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत) उस व्यक्ति को किसी सक्षम न्यायालय (Civil Court) में प्रतिकर (मुआवजे) के लिए वाद दायर करने से प्रतिषिद्ध (मना) नहीं करती थी। यह धारा सैद्धांतिक रूप से अच्छी लगती है क्योंकि यह मालिक के सिविल अधिकार को बचाती है। हालाँकि, यह व्यावहारिक रूप से गरीब भारतीय किसान पर दोहरी कानूनी प्रक्रिया का बोझ डालती थी। मालिक को पहले जुर्माना पाने के लिए मजिस्ट्रेट के पास जाना पड़ता था, और फिर वास्तविक, बड़ा मुआवजा पाने के लिए एक अलग, सिविल न्यायालय में वाद दायर करना पड़ता था।
यह दोनों न्यायालय अक्सर तहसील अथवा जिले के नगर मे ही स्थित रहते थे। इससे न्याय मे देरी की संभावना बढ़ जाती थी। बिना वकील को नियुक्त किए ये मामले सुलझते नहीं थे। ब्रिटिश नीति ने यह सुनिश्चित किया कि वास्तविक क्षतिपूर्ति पाने का रास्ता इतना कठिन हो कि अधिकांश गरीब किसान इसे अपनाने का साहस न करें। यह एक कानूनी प्रावधान था जो केवल धनी ज़मींदारों और संपन्न वर्गों के लिए उपयोगी था जो सिविल मुकदमे का खर्च उठा सकते थे। गोरों ने बड़ी कुटिलता से स्थानीय पंचोंद्वारा विवाद सुलझाने वाली भारतीय व्यवस्था को समाप्त कर प्रदीर्घ न्यायव्यवस्था इस देश पर केवल इसीलिए लागू की, क्यू की वे चाहते ही नहीं थे की भारतीय जनता को सरलता से न्याय मिले।
29.3 संशोधन हेतु सुझाव
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 29 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कैसे अंग्रेजों ने न्याय के नाम पर एक जटिल भूलभुलैया खड़ी की थी। एक ओर मजिस्ट्रेट की छोटी राहत और दूसरी ओर सिविल न्यायालय की लंबी प्रक्रिया, असल में गरीब किसान को न्याय से वंचित रखने का एक सोचा-समझा षड्यंत्र था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
1) कलोनीअल नीति का अंत
ब्रिटिश काल में ‘दोहरी न्याय प्रक्रिया’ का उद्देश्य भारतीय किसान को थका देना था ताकि वह अंततः अपने अधिकार छोड़ दे। नए अधिनियम में “एकल खिड़की न्याय” (Single Window Justice) की नीति अपनानी चाहिए। पीड़ित को मुआवजे के लिए दो अलग-अलग अदालतों (मजिस्ट्रेट और सिविल कोर्ट) के चक्कर न काटने पड़ें, बल्कि एक ही मंच पर आपराधिक दंड और दीवानी क्षतिपूर्ति दोनों का निर्णय होना चाहिए।
2) संविधान के साथ अनुरूपता
यह धारा अनुच्छेद 39A (निःशुल्क और त्वरित कानूनी सहायता) की भावना के विरुद्ध है, क्योंकि यह केवल आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को सिविल कोर्ट जाने की सुविधा देती है। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना हर पीड़ित को समान रूप से और कम खर्च में पूर्ण क्षतिपूर्ति मिले।
3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता
ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ सिविल कोर्ट बहुत दूर होते हैं, वहां पंचायत स्तर पर ही पूर्ण मुआवजे का निर्धारण होना चाहिए। शहरी क्षेत्रों में, जहाँ अपार्टमेंट या सोसायटियों के विवाद होते हैं, वहां स्थानीय निकाय की समिति को त्वरित समाधान तंत्र प्रदान किया जाना चाहिए ताकि छोटे विवादों के लिए सिविल कोर्ट की वर्षों लंबी प्रक्रिया में न फंसना पड़े।
4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार
सिविल कोर्ट जाने की अनिवार्यता को समाप्त कर स्थानीय ग्राम पंचायत या नगर निकाय की ‘विवाद समाधान समिति’ को पूर्ण क्षतिपूर्ति तय करने का वैधानिक अधिकार दिया जाना चाहिए। स्थानीय पंच परिस्थितियों को बेहतर समझते हैं, जिससे न्याय अधिक विश्वसनीय और त्वरित होगा।
5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन
धारा 29 के तहत सिविल वाद लाने के बजाय, मामले को अनिवार्य रूप से सुलह समिति को भेजा जाना चाहिए। 1996 के अधिनियम के सिद्धांतों के तहत, समिति द्वारा किया गया समझौता सिविल कोर्ट की डिक्री (आदेश) के समान प्रभावी होना चाहिए। इससे वकील और लंबी अदालती फीस का बोझ समाप्त होगा।
6) जब्त पशुओ का कल्याण
जब तक मुआवजे का मामला (चाहे वह समिति में हो या कोर्ट में) चलता है, पशु को “कानूनी बंधक” नहीं बनाया जाना चाहिए। पशु को उचित संरक्षण में रखा जाए और उसकी देखभाल का खर्च उस पक्ष से वसूला जाए जो विवाद में दोषी पाया जाए। न्याय की देरी में पशु का स्वास्थ्य नहीं बिगड़ना चाहिए।
7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी
यदि किसी आवारा पशु के कारण भारी नुकसान हुआ है, तो वाद केवल मुआवजे के लिए नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा के लिए भी होना चाहिए। कोर्ट या समिति को यह अधिकार हो कि वह स्थानीय प्रशासन को उस क्षेत्र में विशेष टीकाकरण और नसबंदी अभियान चलाने का आदेश दे सके।
8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति
आवासीय क्षेत्रों में यदि कोई पशु मालिक बार-बार लापरवाही करता है, तो पीड़ित को सिविल वाद के बजाय सुलह समिति के माध्यम से भारी क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिए। इसमें ‘मानसिक प्रताड़ना’ के मुआवजे का स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए।
9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए
नुकसान के साक्ष्य जुटाने में “पशु मित्रों” की रिपोर्ट को सुलह समिति की सुनवाई में प्राथमिक साक्ष्य (Primary Evidence) माना जाना चाहिए। इससे पीड़ित को महंगे वकील और जटिल गवाहियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। पुलिस का कार्य केवल आदेश के निष्पादन में सहयोग करना होगा। अगर अपील होती हैं तो अपीलीय कोर्ट मे भी इसे पराठिमीक साक्ष्य माना जाना चाहिए।
10) आधुनिकीकरण
मुआवजे के लिए वाद (Claim) दर्ज करने की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल होनी चाहिए। सुलह समिति के निर्णय पर अगर अपील होती हैं तो ई-कोर्ट (e-Court) के माध्यम से छोटे दावों का निपटारा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा होना चाहिए। फैसले की प्रति और मुआवजे का भुगतान सीधे डिजिटल माध्यम से सुरक्षित किया जाना चाहिए।
11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर
इस आधुनिक न्याय तंत्र में ‘पशु विवाद मध्यस्थों’ और ‘क्षति आकलन विशेषज्ञों’ के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। स्थानीय युवाओं को इन विधिक प्रक्रियाओं में प्रशिक्षित कर उन्हें न्याय सहायक के रूप में नियुक्त किया जा सकता है, जो किसानों को जटिल कागजी कार्रवाई से बचाएंगे।
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