पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 30

30.1 मूल प्रावधान

30. मुजरा करना – सिद्धदोष करने वाले मजिट्रेट के आदेश से इस अधिनियम के अधीन ऐसे व्यक्ति को संदत्त किसी प्रतिकर को, ऐसे वाद में प्रतिकर के रूप में उसके द्वारा दावा की गई या उसे दिलाई गई किसी राशि के प्रति मुजरा किया जा सकेगा या उसमें से काटा जा सकेगा।

30.2 विश्लेषणात्मक आलोचना

यह धारा एक लेखांकन (Accounting) नियम से संबंधित है जिसे ‘मुजरा’ (Set-off) कहा जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी व्यक्ति को अतिचार से हुए नुकसान के लिए दो बार मुआवजा न मिले।

यदि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के आदेश से (जैसे धारा 22 के तहत) इस अधिनियम के अधीन कोई प्रतिकर (मुआवजा) दिया गया है और वही व्यक्ति बाद में किसी सिविल न्यायालय में मुकदमा (वाद) दायर करता है (जैसा कि धारा 29 में बताया गया है) और न्यायालय द्वारा उसे प्रतिकर के रूप में कोई राशि दिलाई जाती है, तो इस स्थिति में, मजिस्ट्रेट द्वारा पहले से संदत्त (paid) किया गया प्रतिकर उस राशि के प्रति मुजरा किया जा सकेगा या उसमें से काटा जा सकेगा जो उसे सिविल न्यायालय द्वारा दिलाई गई है। मतलब यदि किसी किसान को मजिस्ट्रेट से ₹50 का मुआवजा मिला, और बाद में सिविल कोर्ट ने उसे ₹500 का मुआवजा दिलाया, तो ₹50 को ₹500 में से घटा दिया जाएगा, और उसे केवल शेष ₹450 ही मिलेंगे।

मुजरा करने का सिद्धांत कानूनी रूप से सही है क्योंकि यह किसी को दोहरी क्षतिपूर्ति मिलने से रोकता है। हालाँकि, यह प्रावधान औपनिवेशिक व्यवस्था की उस नीति को दर्शाता है जो राजस्व और पैसे के प्रवाह पर पूर्ण नियंत्रण चाहती थी, खासकर तब जब पैसा राज्य के नियंत्रण वाले कोष से बाहर जा रहा हो। यह मुजरा करने की प्रक्रिया गरीब किसान पर यह साबित करने का बोझ डालती थी कि उसे मजिस्ट्रेट से पहले कोई मुआवजा मिला है या नहीं, जिससे सिविल वाद की कार्यवाही और जटिल हो जाती थी।

30.3 संशोधन हेतु सुझाव

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 30 पर विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि कैसे अंग्रेजों ने न्याय की प्रक्रिया को एक ‘गणितीय गणना’ तक सीमित कर दिया था। मुजरा (Set-off) का यह सिद्धांत भले ही दोहरे लाभ को रोकने के लिए था, लेकिन इसने गरीब किसान के लिए कानूनी उलझनों को और बढ़ा दिया था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:

1) कलोनीअल नीति का अंत

ब्रिटिश काल में मुजरा करने का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना था कि राज्य या दोषी व्यक्ति को एक पैसे का भी अतिरिक्त भुगतान न करना पड़े। नए अधिनियम में इस “कंजूस गणना” वाली नीति को बदलकर “पूर्ण पुनर्वास” की नीति अपनानी चाहिए। यदि मजिस्ट्रेट द्वारा दी गई तात्कालिक सहायता (प्रतिकर) बहुत कम थी, तो सिविल कोर्ट को उसे मुजरा करने के बजाय “प्रारंभिक व्यय” के रूप में मानकर पूर्ण मुआवजे का आदेश देना चाहिए।

2) संविधान के साथ अनुरूपता

यह धारा अनुच्छेद 21 के अंतर्गत न्याय की गरिमा को प्रभावित करती है क्योंकि यह पीड़ित को मिलने वाली छोटी सी राहत को भी बड़े मुआवजे में से काट लेती है। नया कानून यह सुनिश्चित करेगा कि “मुजरा” केवल तभी हो जब पीड़ित को वास्तव में अपनी हानि से अधिक धन मिल रहा हो। मानसिक प्रताड़ना या कानूनी लड़ाई के खर्च को इस कटौती से बाहर रखा जाना चाहिए।

3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता

ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ किसान की आजीविका पशु और फसल पर टिकी है, वहां छोटी राशियों को बड़े मुआवजे में से काटना उनके घाव पर नमक छिड़कने जैसा है। शहरी क्षेत्रों में, जहाँ बड़े व्यापारिक संस्थानों के बीच विवाद होते हैं, वहां मुजरा का सिद्धांत सख्ती से लागू हो सकता है, लेकिन आम नागरिकों के लिए इसमें लचीलापन होना चाहिए।

4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार

मुजरा (कटौती) का हिसाब लगाने का काम अदालतों के बजाय स्थानीय ग्राम पंचायत या वार्ड समिति को दिया जाना चाहिए। स्थानीय निकाय यह बेहतर जानते हैं कि मालिक को वास्तव में कितनी सहायता मिली है और उसे अभी और कितने धन की आवश्यकता है।

5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन

सुलह समिति 1996 के अधिनियम के तहत यह तय कर सकती है कि क्या पहले दी गई राशि को अंतिम मुआवजे में समायोजित करना आवश्यक है या नहीं। समिति पीड़ित की आर्थिक स्थिति को देखते हुए “मुजरा” के प्रावधान को माफ करने की सिफारिश भी कर सकती है ताकि पीड़ित को अधिकतम लाभ मिले।

6) जब्त पशुओ का कल्याण

यदि मुजरा के कारण मुआवजे की राशि कम हो जाती है, तो कम की गई उस राशि को सरकारी राजस्व में डालने के बजाय सीधे उस कांजी हौस के कल्याण कोष में जमा किया जाना चाहिए जहाँ वह पशु रखा गया था। इससे धन का उपयोग पशुओं की भलाई के लिए ही होगा।

7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी

ऐसी स्थितियों में जहाँ मुआवजा किसी आवारा पशु द्वारा किए गए नुकसान के लिए है, वहां मुजरा का सिद्धांत लागू ही नहीं होना चाहिए। वहां पूरी राशि का उपयोग पीड़ित की सहायता और शेष का उपयोग उसी क्षेत्र में आवारा पशुओं के टीकाकरण और नसबंदी के लिए किया जाना चाहिए।

8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति

आवासीय क्षेत्रों में यदि किसी पालतू पशु ने हमला किया है, तो मजिस्ट्रेट द्वारा दिलाई गई “मेडिकल सहायता” को सिविल कोर्ट द्वारा दिलाए गए “मानसिक क्षतिपूर्ति” में से नहीं काटा जाना चाहिए। दोनों नुकसान अलग-अलग प्रकृति के हैं, इसलिए उन्हें मुजरा के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए।

9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए

भुगतान और मुजरा की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए “पशु मित्रों” की गवाही महत्वपूर्ण होनी चाहिए। वे यह सुनिश्चित करेंगे कि पीड़ित को पहले जो राशि मिली थी, वह वास्तव में उस तक पहुँची थी या नहीं, ताकि कागजी खानापूर्ति के आधार पर गलत कटौती न हो सके।

10) आधुनिकीकरण

मुजरा और कटौती का पूरा हिसाब एक “डिजिटल लेजर” (Digital Ledger) के माध्यम से होना चाहिए। जैसे ही मजिस्ट्रेट कोई प्रतिकर दे, वह मालिक की ‘यूनिक आईडी’ पर दर्ज हो जाना चाहिए। इससे सिविल कोर्ट को हिसाब लगाने में आसानी होगी और किसान को पुराने रसीद और कागजात संभालकर रखने का बोझ नहीं उठाना पड़ेगा।

11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर

वित्तीय हिसाब-किताब और मुजरा की जटिलताओं को सुलझाने के लिए ‘विधिक सांख्यिकी सहायक’ (Legal Statistical Assistants) के पद सृजित किए जा सकते हैं। स्थानीय युवा इस पद पर रहकर किसानों को उनके मुआवजे की सही गणना करने में मदद करेंगे, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी और रोजगार के अवसर मिलेंगे।

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