पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 19
यदि मालिक को लगता था कि उसकी ज़ब्ती अवैध है, तो उसे अपनी आजीविका के साधन को बचाने के लिए कांजी हौस रखवाले के साथ बहस करने के बजाय महँगे और समय लेने वाले मजिस्ट्रेट या सिविल न्यायालय के पास जाना पड़ता था। इस नीति ने स्थानीय विवादों के निपटारे को केंद्रीकृत और औपनिवेशिक अदालती व्यवस्था तक सीमित कर दिया। यह गरीब और अनपढ़ भारतीयों को अदालतों के भय और खर्च के कारण न्याय की मांग छोड़ने के लिए मजबूर करता था, जिससे वे प्रशासनिक अन्याय के विरुद्ध लड़ने का साहस खो देते थे।
