पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 17
धारा 16 (विक्रय द्वारा) के तहत वसूले गए प्रभार और धारा 13 (मालिक द्वारा छुड़ाए जाने पर) के तहत प्राप्त की गई राशि, दोनों ही कांजी हौस रखवाले को दे दी जाती थी। यह रखवाले के उस खर्च की भरपाई थी जो उसने पशुओं को खिलाने-पिलाने पर किया था। भले ही रखवाले को खिलाने का खर्च वापस मिल जाता था, लेकिन उसे यह पैसा मालिक से नहीं, बल्कि एक औपचारिक सरकारी प्रक्रिया (धारा 16) के माध्यम से मिलता था। इससे रखवाले की निर्भरता और जवाबदेही पूरी तरह से सरकारी तंत्र पर बनी रहती थी।
