17.1 मूल प्रावधान
17. जुर्मानों, व्ययों और विक्रय के आगमों के अधिशेष का व्ययन – वह अधिकारी जिसके द्वारा विक्रय किया गया था ऐसे काटे गए जुर्मानों को जिला मजिस्ट्रेट को भेजेगा।
धारा 16 के अधीन काटे गए खिलाने और पिलाने के प्रभार कांजी हौस रखवाले को संदत्त किए जाएंगे जो धारा 13 के अधीन ऐसे प्रभारों लेखे अपने द्वारा प्राप्त सब राशियों को भी प्रतिधारित और विनियोजित करेगा।
पशुओं के विक्रय के आगमों के अधिशेष, जिनका दावा न किया गया हो, जिला मजिस्ट्रेट को भेज जाएंगे जो उन्हें तीन मास के लिए निक्षेप के रूप रखेगा और यदि उस कालावधि के भीतर उनके लिए कोई दावा न किया गया और सिद्ध न हुआ तो उसकी समाप्ति पर 1[यह समझा जाएगा कि वह उन्हें राज्य के राजस्वों के रूप में रखे हुए हैं]।
मूल प्रावधान की पादटिका
1. भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा “इसमें इसके पश्चात् जैसा उपबन्धित है उन्हें व्ययन करेगा” के स्थान पर प्रतिस्थापित।
17.2 विश्लेषणात्मक आलोचना
इस धारा के तहत पैसे को तीन मुख्य भागों में विभाजित किया गया है, जिनका अंतिम गंतव्य अलग-अलग था।
जुर्माना:
पशुओं को बेचने वाले अधिकारी द्वारा काटे गए जुर्मानों की पूरी राशि जिला मजिस्ट्रेट को भेज दी जाती थी। यह पैसा सीधे ब्रिटिश-नियंत्रित निधि में चला जाता था।
खिलाने और पिलाने के प्रभार:
धारा 16 (विक्रय द्वारा) के तहत वसूले गए प्रभार और धारा 13 (मालिक द्वारा छुड़ाए जाने पर) के तहत प्राप्त की गई राशि, दोनों ही कांजी हौस रखवाले को दे दी जाती थी। यह रखवाले के उस खर्च की भरपाई थी जो उसने पशुओं को खिलाने-पिलाने पर किया था। भले ही रखवाले को खिलाने का खर्च वापस मिल जाता था, लेकिन उसे यह पैसा मालिक से नहीं, बल्कि एक औपचारिक सरकारी प्रक्रिया (धारा 16) के माध्यम से मिलता था। इससे रखवाले की निर्भरता और जवाबदेही पूरी तरह से सरकारी तंत्र पर बनी रहती थी।
विक्रय के आगमों का अधिशेष (Unclaimed Surplus):
यदि पशुओं को बेचने के बाद सभी जुर्माने और व्यय काटने के बाद भी कोई पैसा बच जाता था और मालिक उस पर दावा नहीं करता था, तो यह अधिशेष भी जिला मजिस्ट्रेट को भेज दिया जाता था। जिला मजिस्ट्रेट इस पैसे को तीन मास के लिए अपने पास निक्षेप के रूप में रखता था। यदि इस तीन महीने की अवधि के भीतर स्वामी द्वारा इस अधिशेष पर कोई दावा नहीं किया जाता था और न ही वह दावा सिद्ध कर पाता था, तो अवधि समाप्त होने पर यह पैसा राजस्व के रूप में स्थायी रूप से सरकारी खजाने का हिस्सा बन जाता था।
यदि मालिक वित्तीय कठिनाई या सूचना के अभाव के कारण तीन महीने में अतिशेष धन का दावा नहीं कर पाता था, जो ग्रामीण क्षेत्रों में आम था, तो यह पैसा हमेशा के लिए औपनिवेशिक सरकार के खजाने में चला जाता था। इस नीति ने यह सुनिश्चित किया कि अतिचार अधिनियम के तहत होने वाला लाभ, जुर्माने और अदावाकृत अधिशेष दोनों, अंततः साम्राज्य के वित्तीय हितों को ही साधता रहे।
17.3 संशोधन हेतु सुझाव
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 17 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कैसे अंग्रेजों ने एक “वित्तीय जाल” बुना था। इसमें पशुओं की नीलामी से प्राप्त अधिशेष (Surplus) धन को भी हड़पने के लिए तीन महीने की एक अत्यंत छोटी समय सीमा तय की गई थी। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
1) कलोनीअल नीति का अंत
ब्रिटिश काल में जुर्माने और अधिशेष धन का अंतिम गंतव्य ‘सरकारी खजाना’ था। यह नीति दर्शाती है कि शासन का उद्देश्य न्याय नहीं, बल्कि धन संग्रह था। नए अधिनियम में इस औपनिवेशिक व्यवस्था को समाप्त कर “राजस्व से जनसेवा” की नीति अपनानी चाहिए। वसूले गए धन का उपयोग पशुपालन और स्थानीय सामुदायिक विकास के लिए होना चाहिए, न कि उसे राज्य के सामान्य राजस्व में विलीन कर देना चाहिए।
2) संविधान के साथ अनुरूपता
बिना उचित प्रयास के नागरिक के धन को ‘राज्य का राजस्व’ मान लेना अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि अधिशेष धन पर मालिक का अधिकार लंबे समय तक सुरक्षित रहे। तीन महीने की अवधि को बढ़ाकर कम से कम एक वर्ष किया जाना चाहिए और इस दौरान मालिक को खोजने के सक्रिय प्रयास किए जाने चाहिए। अगर पशु को टैग कर उसका डिजिटल डेटा सँजोया जाए तो यह अवधि कम हो सकती हैं।
3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता
शहरी क्षेत्रों में जहाँ डिजिटल भुगतान के कारण मालिक का पता लगाना आसान है, वहां अधिशेष धन को सीधे मालिक के बैंक खाते में भेजने की व्यवस्था होनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में, चूँकि सूचना पहुँचने में समय लगता है, वहां स्थानीय पंचायत को इस धन का रक्षक (Custodian) बनाया जाना चाहिए ताकि मालिक के आने पर उसे उसका हक मिल सके। डिजिटल इंडिया के तहत ग्रामीण क्षेत्रों मे भी पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाया जा सकता हैं। जहा डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं हैं वहा समय लग सकता हैं पर जहा डिजिटल क्रांति हो गई हैं ऐसे सभी क्षेत्रों मे कम से कम अवधि मे ज्यादा से ज्यादा काम किए जा सके ऐसी व्यवस्था और नियम बनाए जाने चाहिए।
4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार
जिला मजिस्ट्रेट के पास पैसा भेजने के बजाय, यह अधिशेष धन स्थानीय ग्राम पंचायत या नगर निकाय की “पशु कल्याण निधि” में जमा होना चाहिए। स्थानीय निकाय यह बेहतर जानते हैं कि संबंधित पशु का वास्तविक स्वामी कौन है। उन्हें यह अधिकार होना चाहिए कि वे इस धन का उपयोग स्थानीय पशु चिकित्सालयों या चारागाहों के सुधार के लिए करें।
5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन
यदि अधिशेष धन के स्वामित्व को लेकर एक से अधिक दावेदार सामने आते हैं, तो मामले को सुलह समिति को भेजा जाना चाहिए। 1996 के अधिनियम के सिद्धांतों के आधार पर, समिति साक्ष्यों की जांच करेगी और विवाद का निपटारा करेगी, जिससे अदालती कार्यवाही की जटिलता से बचा जा सकेगा।
6) जब्त पशुओ का कल्याण
कांजी हौस रखवाले को मिलने वाले “खिलाने-पिलाने के प्रभार” का नियमित ऑडिट होना चाहिए। नया कानून यह सुनिश्चित करेगा कि जो पैसा रखवाले को दिया जा रहा है, वह वास्तव में पशुओं के उचित पोषण पर ही खर्च हुआ हो। यदि पशु कुपोषित पाया जाता है, तो रखवाले को यह राशि प्राप्त करने का अधिकार नहीं होगा। अगर जब्त किया हुआ पशु वापसी के समय कुपोषित एवं बीमार पाया जाता हैं तो कांजी हौस के कर्मचारियों को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।
7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी
अधिशेष धन का वह भाग जिसका दावा सिद्ध नहीं हो पाता, उसे सरकारी खजाने में डालने के बजाय विशेष रूप से “आवारा पशु प्रबंधन” के लिए आरक्षित किया जाना चाहिए। इस धन का उपयोग क्षेत्र के आवारा पशुओं के अनिवार्य टीकाकरण, नसबंदी और उनके पुनर्वास के लिए किया जाना चाहिए।
8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति
आवासीय क्षेत्रों में नीलामी से प्राप्त अधिशेष धन का उपयोग एक “पीड़ित सहायता कोष” बनाने के लिए किया जाना चाहिए। यदि किसी लावारिस पशु के कारण किसी नागरिक को गंभीर चोट आती है या संपत्ति का नुकसान होता है, तो इस कोष से उसे तत्काल वित्तीय सहायता प्रदान की जानी चाहिए।
9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए
वित्तीय लेनदेन और अधिशेष धन के हस्तांतरण की प्रक्रिया में स्थानीय “पशु मित्रों” की निगरानी अनिवार्य होनी चाहिए। वे यह सुनिश्चित करेंगे कि अधिशेष धन की घोषणा पारदर्शी तरीके से की गई है और किसी भी अधिकारी द्वारा धन का गबन नहीं किया जा रहा है। पुलिस की भूमिका केवल वित्तीय अभिलेखों की सुरक्षा तक सीमित होनी चाहिए।
10) आधुनिकीकरण
अधिशेष धन (Unclaimed Surplus) की पूरी सूची एक सार्वजनिक ऑनलाइन पोर्टल पर उपलब्ध होनी चाहिए। “खोया-पाया” (Lost and Found) अनुभाग के माध्यम से लोग अपने पशु और उनसे जुड़े धन का विवरण देख सकें। तीन महीने की प्रतीक्षा अवधि के दौरान पोर्टल पर मालिक के नाम की खोज निरंतर जारी रहनी चाहिए। पशुओ के टैग और टैग पर आधारित डिजिटल डेटाबेस से पशु मालिक को खोजना सरल हो सकता हैं।
11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर
अधिशेष धन और पशु कल्याण निधि के प्रबंधन के लिए स्थानीय युवाओं को ‘पशु निधि लेखाकार’ (Animal Fund Accountant) के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। यह न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित करेगा, बल्कि वित्तीय व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही भी सुनिश्चित करेगा।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 18
18.1 मूल प्रावधान
18. [जुर्मानों तथा अदावाकृत विक्रय के आगमों का उपयोजना ।] भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा निरसित।
इस प्रावधान को भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा पूरी तरह से रद्द कर दिया गया है। इसका सीधा सा मतलब है कि यह धारा अब कानून का हिस्सा नहीं है और इसका कोई कानूनी प्रभाव नहीं है। इसे निरस्त कर दिया गया क्योंकि इसकी विषय वस्तु (जुर्माने और अदावाकृत विक्रय के पैसे का उपयोग) धारा 17 और अन्य प्रासंगिक वित्तीय अधिनियमों में पहले ही स्पष्ट कर दी गई थी, जिससे यह धारा अनावश्यक हो गई थी।
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