पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 16

16.1 मूल प्रावधान

16. जब स्वामी जुर्मानों और व्ययों का संदाय करने से इंकार करता है या लोप करता है तब प्रक्रिया – यदि स्वामी या उसका अभिकर्ता उपस्थित होता है और उक्त जुर्मानों और व्ययों को संदत्त करने से या (धारा 15 में वर्णित दशा में) उक्त जुर्मानों और व्ययों को निक्षिप्त करने से इंकार करता है या उसमें लोप करता है तो ऐसे अधिकारी द्वारा ऐसे स्थान और समय पर और ऐसी शर्तों के अध्यधीन जैसी धारा 14 में निर्दिष्ट हैं, उन पशुओं या उनमें से इतनों का जितने आवश्यक हों सार्वजनिक नीलाम द्वारा विक्रय कर दिया जाएगा।

जुर्मानों और व्ययों की कटौती – उग्रहणीय जुर्माने और खिलाने और पिलाने के व्यय, विक्रय के व्ययों सहित, यदि कोई हों, विक्रय के आगमों में से काट लिए जाएंगे।

अविक्रीत पशुओं का परिदान और आगमों का अतिशेष – शेष पशु और क्रयधन का अतिशेष, यदि कोई हो, निम्नलिखित को दर्शित करने वाले एक विवरण के सहित स्वामी या उसके अभिकर्ता को परिदत्त कर दिया जाएगा-

(क) अभिगृहीत पशुओं की संख्या:

(ख) समय जिसके दौरान वे परिवद्ध किए गए हैं.

(ग) उपगत प्रभारों और जुर्मानों की रकम,

(घ) विक्रीत पशुओं की संख्या,

(ङ) विक्रय के आगम, और

(च) वह रीति जिसमें उन आगमों का व्ययन किया गया है।

पावती स्वामी या उसका अभिकर्ता ऐसे विवरण के अनुसार उसको परिदत्त पशुओं के लिए और उसको संदत्त क्रय-धन के अतिशेष के लिए (यदि कोई हो) एक पावती देगा।

16.2 विश्लेषणात्मक आलोचना

यह धारा अनिवार्य रूप से जब्त पशुओं को बेचने की प्रक्रिया और उसके बाद की वित्तीय गणना से संबंधित है।

विक्रय (नीलामी):

यदि स्वामी या उसका अभिकर्ता जुर्माने और व्ययों का भुगतान करने से मना कर देता था, या धारा 15 के तहत निक्षेप राशि जमा करने में विफल रहता था, तो पशुओं को सार्वजनिक नीलामी द्वारा बेच दिया जाता था। नीलाम उसी अधिकारी द्वारा, उसी स्थान और समय पर, और उन्हीं शर्तों पर किया जाता था जो धारा 14 में निर्दिष्ट हैं। केवल उतने ही पशु बेचे जाते थे जितने आवश्यक शुल्क और जुर्माने को वसूलने के लिए ज़रूरी हों।

कटौती और वसूली:

नीलामी से प्राप्त कुल धन में से सबसे पहले वसूला जाने वाला जुर्माना, पशुओं को खिलाने और पिलाने पर हुआ खर्च, विक्रय पर हुआ खर्च, इत्यादि काट लिए जाते थे। पशुओं को बेचने का प्रावधान सरकार को यह कानूनी अधिकार देता था कि वह मालिक की इच्छा या आर्थिक संकट की परवाह किए बिना, अपनी बकाया राशि (जुर्माना और प्रभार) वसूल ले। यह एक कठोर नीति थी जो गरीबों के लिए आजीविका के साधन की परवाह किए बिना राजस्व वसूली को सर्वोच्च प्राथमिकता देती थी। नीलामी के बाद, जुर्माने और खिलाने के शुल्क के साथ-साथ, विक्रय के व्यय को भी मालिक से ही वसूला जाता था। यह एक अतिरिक्त वित्तीय बोझ था जो यह सुनिश्चित करता था कि मालिक को नीलामी से कम से कम पैसा मिले।

शेष पशुओं और धन का परिदान:

बेचने के बाद जो पशु बच जाते थे उन्हें मालिक को सौंप दिया जाता था। यदि विक्रय से प्राप्त धन, कटौतियों के बाद भी बच जाता था, तो उस अतिशेष धन को भी मालिक को सौंप दिया जाना चाहिए ऐसा इस प्रावधान मे लिखा हैं। पर इस बात की कोई पुष्टि नहीं हैं की ये धन मालिक को मिलता भी था या नहीं।

विवरण और पावती:

इस पूरी प्रक्रिया की एक विस्तृत विवरण (स्टेटमेंट) भी मालिक को दी जाएगी। इस विवरण में जब्त किए गए पशुओं की संख्या, वे कितने समय तक कांजी हौस में रहे, कुल शुल्क और जुर्माना कितना लगा, कितने पशु बेचे गए, विक्रय से कितना पैसा मिला, और उस पैसे का उपयोग कैसे किया गया इत्यादि शामिल होता था। मालिक को बेचे जाने के बाद बचे हुए पशुओं और अतिशेष धन के लिए पावती पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य था।

मालिक को केवल शेष पशु और पैसा ही नहीं सौंपा जाता था, बल्कि उसे एक औपचारिक विवरण और एक पावती पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया जाता था। पावती पर हस्ताक्षर करने का मतलब था कि मालिक ने विक्रय की पूरी प्रक्रिया की वैधता और कटौतियों की शुद्धता को स्वीकार कर लिया है। यदि मालिक को लगता था कि जुर्माना अनुचित था, या बिक्री अनुचित मूल्य पर की गई थी, तो भी उसे अपनी बची हुई संपत्ति लेने के लिए हस्ताक्षर करने पड़ते थे।

16.3 संशोधन हेतु सुझाव

प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:

1) कलोनीअल नीति का अंत

ब्रिटिश काल में नीलामी की यह प्रक्रिया केवल सरकारी राजस्व की शत-प्रतिशत वसूली सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई थी। इसमें पशुपालक की आजीविका उजड़ने का कोई दुख नहीं था। नए अधिनियम में “राजस्व सर्वोपरि” की इस क्रूर नीति को समाप्त कर “आजीविका संरक्षण” की नीति अपनानी चाहिए। नीलामी केवल तभी की जाए जब पशु का कोई स्वामी न मिले या वह पशु को रखने से लिखित रूप में मना कर दे। किसी भी परिस्थिति में किसान के आय के मुख्य स्रोत को केवल छोटे जुर्माने के लिए नीलाम नहीं किया जाना चाहिए।

2) संविधान के साथ अनुरूपता

धारा 16 का वर्तमान स्वरूप अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह मालिक को बिना किसी न्यायिक अपील या मानवीय सुनवाई के उसकी संपत्ति से वंचित करता है। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि नीलामी से पहले मालिक को अपनी आर्थिक असमर्थता प्रमाणित करने का अवसर मिले, जिससे उसे भुगतान के लिए अतिरिक्त समय या विशेष रियायत दी जा सके।

3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता

ग्रामीण क्षेत्रों में पशु परिवार के सदस्य की तरह होते हैं, वहां नीलामी के बजाय “सामुदायिक गारंटी” जैसे विकल्प होने चाहिए। शहरी क्षेत्रों में, जहाँ व्यावसायिक पशुपालन अथवा फैशन के कारण सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा होता है, वहां नीलामी की प्रक्रिया को अधिक सख्त और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए ताकि पशुओं को खुले में छोड़ने की प्रवृत्ति पर लगाम लगे।

4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार

नीलामी से प्राप्त धन और उसकी कटौती का विवरण जिला मजिस्ट्रेट के बजाय स्थानीय ग्राम पंचायत या नगर निकाय की “पशु कल्याण समिति” के समक्ष प्रस्तुत होना चाहिए। स्थानीय निकाय यह सुनिश्चित करेंगे कि “विक्रय के व्यय” के नाम पर अधिकारी मालिक का पैसा न हड़पें और नीलामी केवल वास्तविक मूल्य पर ही हो।

5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन

नीलामी की नौबत आने से पहले सुलह समिति का एक अनिवार्य “अंतिम प्रयास” सत्र होना चाहिए। 1996 के अधिनियम के सिद्धांतों के आधार पर, समिति यह तय कर सकती है कि क्या पशु को बेचे बिना किसी अन्य वित्तीय समाधान या किश्तों में भुगतान के माध्यम से मामले को सुलझाया जा सकता है।

6) जब्त पशुओ का कल्याण

नीलामी में पशु किसे बेचा जा रहा है, इसकी सख्त जांच होनी चाहिए। नया कानून यह अनिवार्य करेगा कि खरीदार एक शपथ पत्र दे कि वह पशु को कसाईखाने नहीं भेजेगा। यदि पशु वृद्ध या बीमार है और नीलामी के योग्य नहीं है, तो उसे बेचने के बजाय सरकारी या निजी संरक्षण गृह (Goshala/Shelter) में भेजा जाना चाहिए।

7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी

यदि किसी लावारिस या आवारा पशु की नीलामी की जाती है, तो खरीदार को पशु सौंपने से पहले उसका टीकाकरण अनिवार्य रूप से पूर्ण की जानी चाहिए। इसका व्यय नीलामी से प्राप्त राशि से ही काटा जाना चाहिए, जिससे समाज में स्वस्थ और नियंत्रित पशु आबादी सुनिश्चित हो सके।

8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति

ब्रिटिश कानून में नीलामी का पैसा केवल सरकारी खजाने में जाता था। नए कानून में नीलामी से प्राप्त राशि का सबसे पहला उपयोग उस पीड़ित को मुआवजा देने के लिए होना चाहिए जिसकी फसल या संपत्ति का नुकसान हुआ है। न्याय का केंद्र पीड़ित व्यक्ति और पशु का कल्याण होना चाहिए।

9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए

नीलामी की पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी होनी चाहिए और कम से कम दो “पशु मित्रों” की उपस्थिति अनिवार्य होनी चाहिए। पुलिस का कार्य नीलामी को शांतिपूर्ण बनाना होगा, जबकि पशु मित्र यह सुनिश्चित करेंगे कि नीलामी की प्रक्रिया में पशु के साथ कोई क्रूरता न हो और वित्तीय विवरण पूरी तरह सत्य हो।

10) आधुनिकीकरण

वित्तीय विवरण और कटौती का पूरा हिसाब मालिक को डिजिटल रूप में दिया जाना चाहिए और पोर्टल पर अपलोड होना चाहिए। नीलामी के बाद बचने वाले अतिशेष धन (Balance amount) का भुगतान नकद के बजाय सीधे मालिक के बैंक खाते में डिजिटल माध्यम (DBT) से होना चाहिए ताकि भ्रष्टाचार की संभावना खत्म हो सके।

11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर

नीलामी और पशु प्रबंधन की इस आधुनिक प्रणाली में ‘एनिमल ऑक्शन मैनेजर’ और ‘पशु कल्याण प्रचारक’ जैसे पदों पर स्थानीय शिक्षित युवाओं को लगाया जा सकता है। ये युवा पशुपालकों को वित्तीय संकट से उबरने और कानूनी प्रक्रिया पूरी करने में तकनीकी और प्रशासनिक मदद करेंगे।

कृपया इस ब्रिटिश कालीन कानून को निरस्त करने हेतु नीचे दिए लाल बटन को प्रेस करिए। अपना मेल एप एवं अकाउंट सिलेक्ट करिए, मेल अपने आप टाइप होकर आ जाएगा। आपको केवल सेन्ड करना हैं।

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