पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 15

15.1 मूल प्रावधान

15. अभिग्रहण की वैधता पर विवाद उठाने वाले किन्तु निक्षेप करने वाले स्वामी को परिदान – यदि स्वामी या उसका अभिकर्ता उपस्थित होता है और उक्त जुर्मानों और व्ययों का संदाय करने से इस आधार पर इंकार करता है कि अभिग्रहण अवैध था और कि स्वामी धारा 20 के अधीन परिवाद करने ही वाला है तो उन पशुओं की बाबत उपगत प्रभारों और जुर्मानों के निक्षेप पर वे पशु उसे परिदत्त कर दिए जाएंगे।

15.2 विश्लेषणात्मक आलोचना

यह प्रावधान, हालांकि सैद्धांतिक रूप से मालिक को अपने पशुओं को तुरंत वापस पाने की अनुमति देता है, पर इसके लिए यह शर्त रखता है कि मालिक को जुर्माना और प्रभारों की पूरी राशि निक्षेप के रूप में जमा करनी होगी।

विवाद की स्थिति:

पशुओं का स्वामी या उसका प्रतिनिधि कांजी हौस आता था, लेकिन वह जुर्माने और प्रभारों का भुगतान करने से इंकार कर देता था। इंकार करने का कारण यह होता है कि मालिक का मानना था कि पशुओं की अभिग्रहण अवैध थी।

कानूनी कार्रवाई की घोषणा:

मालिक यह भी घोषणा करता था कि वह जल्द ही इस अवैध ज़ब्ती के संबंध में धारा 20 के तहत कानूनी शिकायत (परिवाद) दर्ज करने वाला है। मालिक को न केवल निक्षेप जमा करना था, बल्कि यह घोषणा भी करनी थी कि वह धारा 20 के तहत शिकायत दर्ज करने वाला है। यह कानूनी औपचारिकता अनपढ़ या कम जानकार भारतीय मालिकों के लिए भ्रम पैदा करती थी। निक्षेप जमा करने के बाद, मालिक को कानूनी शिकायत दर्ज करने, अदालत में भाग लेने और अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए समय और पैसा खर्च करना पड़ता था। यह लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया गरीब किसानों को अक्सर डरा देती थी, और वे न्याय पाने के बजाय निक्षेप राशि को ही गंवाकर चुपचाप बैठ जाना पसंद करते थे।

निक्षेप और परिदान:

ऐसी स्थिति में, कांजी हौस रखवाला जुर्माने और पशुओं पर हुए सभी प्रभारों की राशि को निक्षेप (Deposit) के रूप में स्वीकार करेगा। यह ‘निक्षेप’ भुगतान नहीं है, बल्कि एक प्रकार की जमानत राशि थी। इस निक्षेप को प्राप्त करने पर, पशुओं को तुरंत मालिक को परिदत्त (Delivery) कर दिया जाता था।

गरीब किसान या पशुपालक, जिनके पास पहले से ही पैसा कम होता था और जो तुरंत जुर्माना नहीं भर सकते थे, उनके लिए यह ‘निक्षेप’ राशि जुटाना एक बड़ी आर्थिक बाधा बन जाता था। ब्रिटिश नीति ने यहाँ यह सुनिश्चित किया कि न्याय तक पहुँच केवल उन लोगों के लिए सुलभ हो जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं। यदि मालिक निक्षेप राशि नहीं जुटा पाता, तो उसके पास धारा 14 के तहत पशुओं के बिकने का जोखिम उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता था, भले ही ज़ब्ती अवैध हो।

15.3 संशोधन हेतु सुझाव

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 15 पर विश्लेषण बताता कि कैसे अंग्रेजों ने न्याय के द्वार पर ‘निक्षेप’ (डिपॉजिट) की एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी थी जिसे लांघना गरीब भारतीयों के लिए असंभव था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:

1) कलोनीअल नीति का अंत

ब्रिटिश काल में अवैध जब्ती के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए भी पैसा जमा करना अनिवार्य था। यह “पहले भुगतान करो, फिर न्याय मांगो” की नीति थी। नए अधिनियम में इस औपनिवेशिक मानसिकता को समाप्त कर ‘न्याय की सुलभता’ को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति जब्ती को अवैध बताता है, तो उसे बिना भारी जमा राशि के भी अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए।

2) संविधान के साथ अनुरूपता

यह धारा अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 39A (समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता) के सिद्धांतों को बाधित करती है। नया कानून यह सुनिश्चित करेगा कि आर्थिक अभाव किसी भी नागरिक के लिए न्याय पाने में बाधा न बने। निक्षेप की राशि को पूरी तरह समाप्त कर एक साधारण ‘बंध-पत्र’ (Bond) या स्थानीय गारंटी की व्यवस्था होनी चाहिए।

3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता

शहरी क्षेत्रों में जहाँ पालतू जानवरों की जब्ती को लेकर अक्सर विवाद होते हैं, वहां मालिक को ‘निक्षेप’ के बजाय अपनी पहचान और स्वामित्व के दस्तावेज जमा करने पर पशु की अंतरिम कस्टडी मिलनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहाँ नकद की कमी होती है, वहां पंचायत की सिफारिश पर पशु को तुरंत छोड़ा जाना चाहिए।

4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार

अवैध जब्ती के दावों को तय करने का अधिकार कांजी हाउस रखवाले या अदालतों के बजाय स्थानीय ग्राम पंचायत या वार्ड समिति को दिया जाना चाहिए। स्थानीय निकाय 24 घंटे के भीतर यह निर्णय ले सकते हैं कि जब्ती वैध थी या नहीं। इससे मालिक को निक्षेप जमा करने और अदालत के चक्कर काटने से मुक्ति मिलेगी।

5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन

धारा 15 के तहत उत्पन्न होने वाले विवादों को सीधे सुलह समिति को भेजा जाना चाहिए। 1996 के अधिनियम के तहत, यदि समिति को प्रथम दृष्टया लगता है कि जब्ती अवैध थी, तो वह बिना किसी निक्षेप के पशु को मुक्त करने का आदेश दे सकती है। यह न्यायिक बोझ को कम करेगा और तुरंत राहत प्रदान करेगा।

6) जब्त पशुओ का कल्याण

विवाद की स्थिति में जब तक पशु का फैसला नहीं हो जाता, तब तक पशु के भोजन और आवास का खर्च उस व्यक्ति से वसूला जाना चाहिए जिसने अवैध रूप से पशु पकड़ा है। इससे झूठे दावों और रंजिश में पशु पकड़ने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी और पशु का कल्याण सुनिश्चित होगा।

7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी

यदि किसी आवारा पशु की जब्ती को लेकर कोई पशु मित्र या संस्था विवाद उठाती है, तो उन्हें किसी निक्षेप के बजाय पशु के टीकाकरण और नसबंदी की जिम्मेदारी लेने पर पशु का संरक्षण दिया जाना चाहिए।

8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति

आवासीय क्षेत्रों में यदि जब्ती अवैध पाई जाती है, तो जिस अधिकारी या व्यक्ति ने पशु पकड़ा था, उसे पशु मालिक को मानसिक उत्पीड़न के लिए हर्जाना देना चाहिए। इसके विपरीत, यदि जब्ती सही है, तो मालिक को निक्षेप के बजाय सीधे पीड़ित को क्षतिपूर्ति देने का आदेश होना चाहिए।

9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए

अवैध जब्ती के विवादों के दौरान ‘पशु मित्र’ गवाह की भूमिका निभा सकते हैं। पुलिस का कार्य केवल शांति व्यवस्था बनाए रखना होगा। पशु मित्रों की उपस्थिति यह सुनिश्चित करेगी कि रखवाला मालिक पर निक्षेप जमा करने का अनुचित दबाव न बनाए।

10) आधुनिकीकरण

‘निक्षेप’ की पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाया जाना चाहिए, लेकिन विकल्प के तौर पर ‘ई-बॉन्ड’ (E-Bond) की सुविधा होनी चाहिए। यदि जब्ती अवैध साबित होती है, तो जमा राशि 24 घंटे के भीतर सीधे मालिक के बैंक खाते में वापस (Auto-refund) होनी चाहिए। पोर्टल पर विवाद की स्थिति और उसका समाधान पारदर्शी रूप से दर्ज होना चाहिए।

11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर

प्रत्येक तहसील या वार्ड स्तर पर ‘पशु न्याय सहायकों’ (Animal Justice Assistants) की नियुक्ति की जा सकती है। ये युवा शिक्षित लोग पशुपालकों को कानूनी प्रक्रियाओं को समझने और बिना निक्षेप के अपना पक्ष रखने में मदद करेंगे, जिससे न्याय की प्रक्रिया में पारदर्शिता और रोजगार दोनों बढ़ेंगे।

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