14.1 मूल प्रावधान
14. यदि पशुओं के लिए एक सप्ताह के अन्दर दावा न किया गया तो प्रक्रिया – यदि पशुओं के बारे में दावा उनके परिबद्ध किए जाने की तारीख से सात दिन से अन्दर न किया गया तो कांजी हौस रखवाला उस बात की रिपार्ट निकटतम पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को या ऐसे अन्य अधिकारी को करेगा जिसे जिला मजिस्ट्रेट इस निमित्त नियुक्त करे।
ऐसा अधिकारी तब अपने कार्यालय के किसी सहजदृश्य भाग में एक सूचना लगाएगा जिसमें निम्नलिखित का कथन होगा-
(क) पशुओं की संख्या और वर्णन,
(ख) वह स्थान जहां वे अभिगृहीत किए गए थे,
(ग) वह स्थान जहां वे परिबद्ध किए गए हैं,
और डौंडी पिटवाकर उसकी उद्घोषणा अभिग्रहण के स्थान के निकटतम ग्राम और बाजार स्थल में कराएगा।
यदि पशुओं के लिए दावा सूचना की तारीख से सात दिन के अन्दर न किया जाए तो उक्त अधिकारी या उस प्रयोजन के लिए प्रतिनियुक्त उसके स्थापन के किसी अधिकारी द्वारा, ऐसे स्थान और समय पर ऐसी शर्तों के अध्यधीन, जैसी जिला मजिस्ट्रेट साधारण या विशेष आदेश द्वारा समय-समय पर निदिष्ट करे, उनका सार्वजनिक नीलाम द्वारा विक्रय कर दिया जाएगा :
परन्तु यदि जिला मजिस्ट्रेट की राय हो कि किन्हीं ऐसे पशुओं का पूर्वोक्त रूप में विक्रय किए जाने पर उचित कीमत मिलने की सम्भाव्यता नहीं है तो उनका व्ययन ऐसी रीति में किया जा सकेगा जैसी वह ठीक समझे ।
14.2 विश्लेषणात्मक आलोचना
जब अतिचार करने वाले पशुओं को ज़ब्त किए जाने के बाद उनके मालिक द्वारा एक सप्ताह के भीतर उन्हें छुड़ाया नहीं जाता था तब अनिवार्य रूप से पशुओं को बेचने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए ये प्रावधान दिया गया हैं। यह प्रक्रिया कई चरणों में होती है:
- रिपोर्ट करना: यदि पशुओं को ज़ब्त किए जाने की तारीख से सात दिन के भीतर उनके मालिक द्वारा दावा नहीं किया जाता था, तो कांजी हौस रखवाला तुरंत इसकी रिपोर्ट निकटतम पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को, या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा नियुक्त किसी अन्य अधिकारी को करेगा।
- सार्वजनिक सूचना: रिपोर्ट प्राप्त होने पर, वह अधिकारी एक सूचना अपने कार्यालय के एक सहजदृश्य भाग में लगाएगा। इस सूचना मे पशुओं की संख्या और उनका वर्णन, वह स्थान जहाँ पशुओं को अभिगृहीत गया था और वह स्थान जहाँ वे वर्तमान में परिबद्ध रखे गए थे, इत्यादि विवरण लिखा जाता था।
- ढोल पिटवाकर उद्घोषणा: इसके साथ ही, उस अधिकारी द्वारा पशुओं को पकड़े जाने के स्थान के निकटतम गाँव और बाज़ार स्थल में डौंडी पिटवाकर, ढोल बजाकर सार्वजनिक घोषणा द्वारा, भी इसकी सूचना दी जाती थी।
- सार्वजनिक नीलामी द्वारा विक्रय: यदि यह सार्वजनिक सूचना लगाने की तारीख से भी सात दिन के भीतर पशुओं के लिए दावा नहीं किया जाता है, तो उन पशुओं को सार्वजनिक नीलामी (Public Auction) द्वारा बेच दिया जाता था। यह नीलामी उस अधिकारी द्वारा कि जाती थी, जो जिला मजिस्ट्रेट द्वारा निर्धारित स्थान, समय और शर्तों के अधीन होगा।
- अपवाद (परन्तु): एक महत्वपूर्ण अपवाद यह है कि यदि जिला मजिस्ट्रेट को लगता है कि नीलामी करने पर पशुओं की उचित कीमत नहीं मिलेगी, तो वह अपनी विवेक बुद्धि का उपयोग करके उन पशुओं का व्ययन (बेच या निपटा) किसी भी अन्य तरीके से कर सकता है जिसे वह सही समझे।
पशुओं को बेचने की प्रक्रिया अनिवार्य रूप से ज़ब्ती के बाद लगभग चौदह दिनों के भीतर शुरू हो जाती थी (सात दिन दावा करने के लिए + सात दिन सूचना के बाद)। ग्रामीण और खानाबदोश समुदायों के लिए, जो अक्सर दूर होते थे या वित्तीय संकट में होते थे, इतने कम समय में सूचना प्राप्त करना, पैसा जुटाना और दावा करना अत्यधिक कठिन था।
यह कठोर समय सीमा यह सुनिश्चित करती थी कि मालिक के पास अपनी आजीविका बचाने के लिए पर्याप्त समय न हो, जिससे पशुओं को नीलाम करना आसान हो जाता था। यह नीति गरीब पशुपालकों को उनकी संपत्ति से वंचित करने में सहायक थी। यह नियम संपत्ति के संवैधनिक अधिकार का उल्लंघन होने के बावजूद भी आज तक ये अधिनियम देश मे लागू हैं।
पशुओं को नीलाम करने का प्रावधान, अक्सर बाज़ार मूल्य से कम कीमत पर उनकी बिक्री का कारण बनता था। इस प्रक्रिया से मालिक को भारी आर्थिक नुकसान होता था, और जो पैसा मिलता था, वह जुर्माने और प्रभारों की भरपाई में चला जाता था। नीलामी के अपवाद में जिला मजिस्ट्रेट का विवेक सबसे अधिक दमनकारी हो सकता था। ‘उचित कीमत’ न मिलने की आशंका पर उन्हें ‘जिस रीति में ठीक समझे’ व्ययन करने की शक्ति दी गई थी। यह अस्पष्ट शक्ति उन्हें पशुओं को निजी हाथों में सौंपने या मनमाने ढंग से निपटाने का अधिकार देती थी। ऐसे मे कई बार पशुओं को कत्तलखाने मे भी भेज दिया जाता था, जो की एक तरह से पशुओं के जीवन के अधिकार का उल्लंघन था।
14.3 संशोधन हेतु सुझाव
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 14 पर आपकी विश्लेषणात्मक आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कैसे अंग्रेजों ने ‘नीलामी’ और ‘व्ययन’ के नाम पर गरीब भारतीयों की आजीविका छीनने और पशुओं के जीवन को खतरे में डालने की एक क्रूर व्यवस्था बनाई थी। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
1) कलोनीअल नीति का अंत
ब्रिटिश काल में ‘डौंडी पिटवाकर’ घोषणा करना और मात्र 14 दिनों में पशु बेच देना एक दमनकारी तंत्र था। यह नीति खानाबदोश और गरीब समुदायों को जानबूझकर अपनी संपत्ति से हाथ धोने पर मजबूर करती थी। नए अधिनियम में इस ‘समय-बद्ध लूट’ को समाप्त कर ‘पुनर्वास और स्वामित्व’ की नीति अपनानी चाहिए, जहाँ प्राथमिकता पशु को उसके मालिक तक पहुँचाने की हो, न कि उसे बेचने की। अगर पशुओं के टैग करने की विधि नियमित हो जाती हैं तो यह काम और जल्द हो सकता हैं।
2) संविधान के साथ अनुरूपता
बिना पर्याप्त अवसर दिए किसी की संपत्ति (पशु) को नीलाम कर देना अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) और न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है। इसके अलावा, जिला मजिस्ट्रेट को ‘जिस रीति में ठीक समझे’ व्ययन करने की शक्ति देना अनुच्छेद 14 (समानता) का उल्लंघन है। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि नीलामी केवल अंतिम विकल्प हो और किसी भी स्थिति में पशु को कसाईखानों या असुरक्षित हाथों में न भेजा जाए।
3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता
शहरी क्षेत्रों में, जहाँ लोग सोशल मीडिया और इंटरनेट का उपयोग करते हैं, वहां केवल ढोल पिटवाना पर्याप्त नहीं है। डिजिटल सूचना प्रणाली अनिवार्य होनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में, चूँकि पशुपालक दूर-दराज के इलाकों में हो सकते हैं, दावा करने की समय सीमा को 7 दिन से बढ़ाकर कम से कम 30 दिन किया जाना चाहिए, ताकि मालिक को सूचना प्राप्त करने और प्रबंध करने का उचित अवसर मिले। अगर उचित टैग कर डेटाबेस बनाया जाए तो ऐसे मामलों मे ग्रामीण क्षेत्रों के मालिकों को प्रत्यक्ष नोटिस जल्द से जल्द दी जा सकती हैं।
4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार
पशुओं की बिक्री का निर्णय जिला मजिस्ट्रेट या पुलिस के बजाय स्थानीय ग्राम पंचायत या वार्ड समिति की सहमति से होना चाहिए। स्थानीय निकाय यह बेहतर जानते हैं कि पशु किसका है और क्या मालिक किसी वास्तविक संकट (जैसे बीमारी या प्राकृतिक आपदा) के कारण नहीं आ सका है। स्थानीय संस्थाओं को समय सीमा बढ़ाने का अधिकार मिलना चाहिए।
5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन
नीलामी की प्रक्रिया शुरू करने से पहले सुलह समिति की एक अंतिम बैठक अनिवार्य होनी चाहिए। 1996 के अधिनियम के सिद्धांतों के आधार पर, समिति यह प्रयास करेगी कि क्या किसी पड़ोसी या स्थानीय संस्था के माध्यम से मालिक से संपर्क साधा जा सकता है या क्या कोई अन्य व्यक्ति पशु की जिम्मेदारी ले सकता है।
6) जब्त पशुओ का कल्याण
यदि 7 दिन के भीतर दावा नहीं किया जाता, तो पशु को ‘नीलामी की वस्तु’ मानने के बजाय उसे ‘संरक्षण की आवश्यकता वाले जीव’ के रूप में देखा जाए। उसे सुरक्षित आश्रय गृह (Shelter Home) में स्थानांतरित किया जाए। नीलामी की प्रतीक्षा के दौरान पशु के पोषण और चिकित्सा देखभाल की जिम्मेदारी राज्य की होगी। पशु के मालिक को नीलामी की नोटिस मिलने के बाद अपनी बात रखने का मौका मिलना चाहिए। कई बार पशुओ के मालिक पशु का रखरखाव नहीं कर पाने के कारण उस पशु का त्याग कर देते हैं। ऐसे मे उस पशु के साथ क्रूरता न हो इसके लिए नीलामी की जगह अडाप्शन का प्रयास भी किया जाना चाहिए। पशु केवल बूढ़ा हो गया हैं इसके लिए अगर कोई पशु का त्याग करता हैं तो उसपर एक समय का जुर्माना लगाया जाना चाहिए जिसका उपयोग उस पशु के कल्याण के लिए किया जा सकता हैं।
7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी
ऐसी परिस्थितियों में जहाँ पशु का मालिक नहीं मिलता, उन्हें नीलाम करने के बजाय सरकारी या मान्यता प्राप्त एनजीओ द्वारा संचालित ‘पशु गोद लेने के केंद्रों’ (Adoption Centers) को सौंपा जाना चाहिए। हस्तांतरण से पहले उनका टीकाकरण और नसबंदी अनिवार्य रूप से पूर्ण की जानी चाहिए। त्याग किए हुए पशुओं को इन केंद्रों को दिया जाना चाहिए।
8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति
आवासीय क्षेत्रों में लावारिस छोड़े गए पालतू पशुओं की नीलामी से प्राप्त राशि का पहला अधिकार उस पीड़ित का होना चाहिए जिसे उस पशु ने नुकसान पहुँचाया है। शेष राशि को ‘पशु कल्याण कोष’ में जमा किया जाना चाहिए, न कि सरकारी राजस्व में।
9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए
नीलामी या व्ययन की पूरी प्रक्रिया की निगरानी के लिए स्थानीय ‘पशु मित्रों’ का एक पैनल होना चाहिए। पुलिस का कार्य केवल नीलामी स्थल पर शांति बनाए रखना होगा, जबकि पशु मित्र यह सुनिश्चित करेंगे कि पशु को खरीदने वाला व्यक्ति उसके साथ मानवीय व्यवहार करेगा और वह कोई कसाई या तस्कर नहीं है।
10) आधुनिकीकरण
‘डौंडी’ और ‘सूचना बोर्ड’ के साथ-साथ ‘सेंट्रलाइज्ड ऑनलाइन पोर्टल’ पर पशु की फोटो और विवरण अपलोड करना अनिवार्य हो। एक ‘एनिमल ट्रैकिंग सिस्टम’ के माध्यम से गुमशुदा पशुओं के डेटा से उसका मिलान किया जाए। अडाप्शन एवं नीलामी की प्रक्रिया भी ई-नीलामी (e-Auction) के माध्यम से पारदर्शी बनाई जानी चाहिए। बूढ़े, बीमार पशुओं को न तो कोई गोद लेता हैं और न ही उनकी नीलामी होती हैं, इसीलिए उनके कल्याण हेतु उन्हे उचित शेल्टर मे रखा जाना चाहिए।
11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर
इस आधुनिक प्रबंधन प्रणाली के लिए ‘पशु कल्याण प्रचारकों’ और ‘डिजिटल रिकॉर्ड प्रबंधकों’ की आवश्यकता होगी। स्थानीय युवाओं को इन भूमिकाओं में नियुक्त किया जा सकता है, जो गुमशुदा पशुओं के मालिकों को ढूंढने और नीलामी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने में प्रशासन की मदद करेंगे।
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