पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 13

13.1 मूल प्रावधान

अध्याय 4: पशुओं का परिदान या विक्रय

13. जब स्वामी पशुओं का दावा करता है और जुर्मानों और प्रभारों का संदाय करता है तब प्रक्रिया – यदि परिबद्ध पशुओं का स्वामी या उसका अभिकर्ता उपस्थित हो और पशुओं का दावा करे तो कांजी हौस रखवाला ऐसे पशुओं की बाबत उपगत प्रभारों और जुर्मानों के संदाय पर उसे उनका परिदान कर देगा।

स्वामी या उसका अभिकर्ता, पशुओं को वापस ले जाने पर कांजी हौस रखवाले द्वारा रखे गए रजिस्टर में उनके लिए पावती हस्ताक्षरित करेगा।

13.2 विश्लेषणात्मक आलोचना

‘परिदान (Delivery)’ की एक सीधी और औपचारिक प्रक्रिया थी। जब पशुओं का मालिक या उसका प्रतिनिधि (अभिकर्ता) कांजी हौस आता था और अपने पशुओं को वापस लेने का दावा करता था, तो दो चरण पूरे करने होते थे:

भुगतान और परिदान:

कांजी हौस रखवाला पशुओं से संबंधित सभी जुर्माने (धारा 12) और खिलाने-पिलाने के प्रभारों (धारा 5) का पूरा भुगतान प्राप्त करने के बाद ही मालिक को वे पशु सौंप देगा। पशुओं का परिदान जुर्माने और प्रभारों के अनिवार्य संदाय (भुगतान) की शर्त पर निर्भर करता था। यह व्यवस्था एक तरह से ज़ब्ती को जबरन वसूली (Extortion) में बदल देती है, जहाँ मवेशियों को छुड़ाने का एकमात्र तरीका निर्धारित ऊँचे शुल्क का भुगतान करना होता था। ज़ब्ती के बाद हर दिन पशुओं को खिलाने का प्रभार बढ़ता जाता था। यदि गरीब पशुपालक तुरंत पैसा नहीं जुटा पाता था, तो शुल्क इतने बढ़ जाते थे कि उसके पास अपनी आजीविका के लिए आवश्यक पशुओं को बचाने का कोई रास्ता नहीं बचता था। यह नीति गरीबों को उनकी आजीविका से वंचित करने का एक प्रभावी और कानूनी रूप से समर्थित तरीका था।

पावती (रसीद) पर हस्ताक्षर:

पशुओं को वापस ले जाते समय, मालिक या उसके अभिकर्ता को कांजी हौस रखवाले द्वारा रखे गए रजिस्टर में पावती पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य है। यह हस्ताक्षर इस बात का कानूनी प्रमाण होता है कि पशु मालिक को सुरक्षित रूप से सौंप दिए गए हैं और अब रखवाले की जिम्मेदारी समाप्त हो गई है। पावती पर हस्ताक्षर करके, मालिक प्रभावी ढंग से यह स्वीकार करता था कि पूरी प्रक्रिया नियमानुसार हुई है और उसे अब कोई शिकायत नहीं है। यदि मालिक को लगता था कि जुर्माना अनुचित है, या पशुओं की देखभाल ठीक से नहीं की गई है, तो भी उसे पशुओं को वापस लेने के लिए हस्ताक्षर करने पड़ते थे। इस प्रकार, यह प्रावधान गरीब और अक्सर अनपढ़ मालिक को कानूनी रूप से असहाय बना देता था, जिससे वे प्रशासनिक गलती या अन्याय को चुनौती नहीं दे पाते थे।

13.3 संशोधन हेतु सुझाव

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 13 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह दर्शाती है कि कैसे अंग्रेजों ने एक साधारण ‘परिदान’ (डिलिवरी) प्रक्रिया को गरीब पशुपालकों को कानूनी रूप से चुप कराने का माध्यम बना दिया था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:

1) कलोनीअल नीति का अंत

ब्रिटिश काल में पशु की वापसी केवल पैसे के भुगतान पर निर्भर थी, चाहे वह पशु बीमार हो या घायल। नए अधिनियम में इस ‘जबरन वसूली’ की नीति को समाप्त कर ‘सम्मानजनक वापसी’ की नीति अपनानी चाहिए। यदि मालिक को लगता है कि जुर्माना गलत है, तो उसे ‘विरोध के साथ भुगतान’ (Payment under protest) करने और बाद में उसे चुनौती देने का स्पष्ट कानूनी अधिकार होना चाहिए।

2) संविधान के साथ अनुरूपता

यह धारा अनुच्छेद 21 के अंतर्गत न्याय तक पहुंच के अधिकार को सीमित करती है क्योंकि पावती पर हस्ताक्षर करने का अर्थ सभी शिकायतों का अंत मान लिया जाता था। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि पावती केवल पशु प्राप्त करने का प्रमाण हो, न कि रखवाले की लापरवाही या गलत जुर्माने को माफ करने का प्रमाण।

3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता

ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालकों को डिजिटल रसीद दी जानी चाहिए। शहरी क्षेत्रों में, विशेषकर पालतू जानवरों के मामले में, परिदान से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मालिक ने भविष्य में ऐसी लापरवाही न बरतने का शपथ-पत्र दिया है। यदि पशु ने किसी पर हमला किया था, तो उसकी वापसी की प्रक्रिया अधिक सख्त होनी चाहिए। ऐसे हिंसक पालतू पशुओं को तबतक वापस न दिया जाए जबतक उसके मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य का मेडिकल सर्टिफिकेट पशु चिकित्सक द्वारा नहीं दिया जाता। जब्ती से लेकर मेडिकल सर्टिफिकेट एवं शपथ-पत्र देकर पशु की वापसी तक का पूरा खर्च पशु के मालिक को देना आवश्यक किया जाना चाहिए। आजकल विदेशी नस्ल के कुत्ते बिल्ली पालने का फैशन हैं, जिनका रखरखाव करने के लिए उच्च कोटी की विलासिता लगती हैं और विदेशी ब्रांड का ही खाना लगता हैं। सरकारी कांजी हौस मे ऐसे पशुओं की देखभाल के लिए विशेष प्रबंधन करना पड़ता हैं जिसका खर्च बहुत अधिक होता हैं। इसीलिए इस प्रावधान मे विदेशी नस्ल के पालतू पशुओं के लिए अलग से प्रावधान हो जो व्यवस्था के साथ ज्यादा से ज्यादा जुर्माना वसूल कर सके। कई विदेशी नस्ल के पशु भारत के वातावरण को अपना नहीं पाते हैं इसीलिए हिंसक हो जाते हैं और यह एक तरह की पशु क्रूरता फैशन के नाम पर आजकल भारत के शहरी क्षेत्रों मे बढ़ती जा रही हैं।

4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार

यदि पशुपालक जुर्माना देने में सक्षम नहीं है, तो उसे सीधे नीलामी की ओर धकेलने के बजाय स्थानीय ग्राम पंचायत या वार्ड समिति को यह शक्ति दी जानी चाहिए कि वे मालिक की आर्थिक स्थिति देखकर जुर्माने की किश्तें बना सकें या उसे सामुदायिक सेवा के बदले माफ कर सकें।

5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन

पशु की वापसी के समय यदि कोई विवाद (जैसे पशु की खराब सेहत या अत्यधिक शुल्क) उत्पन्न होता है, तो सुलह समिति तुरंत हस्तक्षेप करे। 1996 के अधिनियम के सिद्धांतों के आधार पर, समिति यह सुनिश्चित करेगी कि विवाद के कारण पशु को अनावश्यक रूप से और अधिक समय तक कांजी हाउस में न रहना पड़े।

6) जब्त पशुओ का कल्याण

परिदान के समय पशु की स्वास्थ्य जांच अनिवार्य होनी चाहिए। यदि पशु अभिरक्षा के दौरान बीमार या घायल हुआ है, तो मालिक से प्रभार वसूलने के बजाय प्रशासन को मालिक को हर्जाना देना चाहिए। पशु की ‘फिटनेस रिपोर्ट’ पावती का हिस्सा होनी चाहिए। विदेशी नस्ल के पालतू पशुओं के लिए इस संदर्भ मे थोड़े अलग प्रावधान की आवश्यकता हैं। विदेशी नस्ल के कई कुत्तों को एयर कन्डिशनर मे रखना अनिवार्य होता हैं क्यू की वे भारत की गर्मी को सह नहीं सकते। विशेष व्यवस्था का भार पूर्णत: फैशन के नाम पर विदेशी नस्ल के कुत्ते पालने वाले अमीर मालिकों पर होना चाहिए। जो नस्ल ठंडे वातावरण के लिए बनी हैं उसे भारत के उष्ण वातावरण मे रखना ही एक तरह की पशु क्रूरता है पर फैशन और स्टैटस के नाम पर उस बेजूबान को प्रताड़ित किया जाता हैं।

7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी

यदि कोई व्यक्ति किसी आवारा पशु को गोद लेना चाहता है या उसका स्वामित्व लेना चाहता है, तो उसे परिदान प्रक्रिया के दौरान पशु के टीकाकरण और नसबंदी के प्रमाण पत्र के साथ ही पशु सौंपा जाना चाहिए। इसके लिए आवारा पशुओं का टैग बड़ा काम आ सकता हैं। सभी तरह के पालतू पशुओं को भी टैग एवं उनका डिजिटल रिकार्ड रखना अनिवार्य किया जाना चाहिए।

8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति

आवासीय क्षेत्रों में पशु की वापसी तभी हो जब मालिक ने पीड़ित पक्ष को तयशुदा क्षतिपूर्ति का भुगतान कर दिया हो। कांजी हौस रखवाला यह सुनिश्चित करेगा कि ‘परिदान’ केवल जुर्माने के भुगतान पर नहीं, बल्कि ‘न्याय के पूर्ण होने’ पर आधारित हो।

9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए

पशु की वापसी के समय स्थानीय ‘पशु मित्र’ गवाह के रूप में उपस्थित हो सकते हैं। यह रखवाले द्वारा की जाने वाली बदसलूकी या रिश्वतखोरी को रोकेगा। पुलिस की भूमिका केवल तभी हो जब परिदान के समय मालिक और रखवाले के बीच गंभीर विवाद उत्पन्न हो।

10) आधुनिकीकरण

पावती की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल होनी चाहिए। हस्ताक्षर के साथ-साथ पशु की वापसी के समय की फोटो भी ऐप पर अपलोड की जाए। मालिक को एसएमएस के जरिए एक ‘डिजिटल गेट पास’ प्राप्त हो, जिससे पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहे और रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ न हो सके। स्थानीय निकाय उनके परिक्षेत्र के सभी आवारा एवं पाले हुए एवं विविध ऐनमल शेल्टर मे रह रहे पशुओं को टैग करें। टैग के नंबर के अनुसार उस पशु का पूरा डाटाबेस बनाया जाए। पशु चिकित्सा का व्यवसाय करने वाले कई लोग हैं और ये उनकी भी जिम्मेदारी होंगी की उनके पास चिकित्सा के लिए आए हुए पशु की पूरी जानकारी एवं चिकित्सा की पूरी जानकारी वे पशु कल्याण से जुड़े सरकारी पोर्टल पर अपलोड करें। इससे अगर कोई व्यक्ति पशु को पालने के नाम पर उसके साथ किसी भी तरह की क्रूरता करता हैं तो उसका भी रिकार्ड ट्रैक किया जा सकता हैं। पशुओं के साथ लैंगिक प्रताड़ना के कई मामले सामने आए हैं जिसमे ऐसे भी पशु प्रताड़ित हुए हैं जिन्हे पाला गया था। पशु इस धरती की सुंदरता बढ़ाने के लिए हैं, उनके साथ पालने के नाम पर क्रूरता होनी ही नहीं चाहिए। आधुनिक कानून के अभाव मे लेकिन ये बढ़ते जा रहा हैं।

11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर

परिदान केंद्रों पर ‘पशु मिलन सहायक’ जैसे पदों का सृजन किया जा सकता है जो अनपढ़ पशुपालकों को उनके अधिकारों के बारे में बताएंगे और डिजिटल प्रक्रिया में उनकी मदद करेंगे। यह स्थानीय युवाओं के लिए एक सेवा-आधारित रोजगार का अवसर होगा। अच्छी पगार और प्रोत्साहन मिलने पर पशुओं के कल्याण को अच्छेसे पूरा किया जा सकता हैं। सरकार नियुक्तियाँ करें और उचित वेतन दे तो कई युवा इसे एक अच्छे करियर के रूप मे देख सकेंगे। वेतन मिलता रहा तो माता पिता भी मना नहीं करेंगे।  

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