12.1 मूल प्रावधान
1[12. परिबद्ध पशुओं के लिए जुर्माने – पूर्वोक्त रूप में परिबद्ध प्रत्येक पशु के लिए, कांजी हौस रखवाला ऐसा जुर्माना उद्गहठीत करेगा जो शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा तत्समय के लिए विहित मान के अनुसार हो। विभिन्न स्थानीय क्षेत्रों के लिए विभिन्न मान विहित किए जा सकेंगे।
ऐसे उद्गृहीत सब जुर्माने ऐसे अधिकारी की मार्फत जिसे राज्य सरकार निर्दिष्ट करे, जिला मजिस्ट्रेट को भेजे जाएंगे।
जुर्माने और खिलाने के लिए प्रभारों की सूची – जुर्मानों की और पशुओं को खिलाने और पिलाने के लिए प्रभार दरों की एक सूची प्रत्येक कांजी हौस के या उसके निकट किसी सहजदृश्य स्थान पर लगाई जाएगी।]
मूल प्रावधान की पादटिका
1. 1921 के अधिनियम सं० 17 की धारा 2 द्वारा मूल धारा 12 के स्थान पर प्रतिस्थापित भारतीय वन अधिनियम, 1927 (1927 का 17) की धारा 71 भी देखिए। उस अधिनियम की धारा 70 के अधीन परिवद्ध पशुओं के लिए जुमनि के राज्य सरकार भिन्न-भिन्न मापमान नियत कर सकेगी।
12.2 विश्लेषणात्मक आलोचना
यह धारा स्पष्ट करती है कि कितना जुर्माना लिया जाएगा, जुर्माने का पैसा कहाँ जाएगा, और ये जानकारी सार्वजनिक रूप से कैसे उपलब्ध होगी। इस धारा के तीन मुख्य पहलू हैं:
जुर्माने का निर्धारण:
कांजी हौस रखवाला हर ज़ब्त किए गए पशु के लिए जुर्माना वसूल करेगा। यह जुर्माने की दर प्रांतीय सरकार द्वारा निर्धारित की जाती थी। अब राज्य सरकार द्वारा शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा प्रकाशित करने का प्रावधान हैं। सरकार को यह अधिकार था कि वह विभिन्न स्थानीय क्षेत्रों (जैसे शहर, गाँव, या कृषि क्षेत्र) के लिए जुर्माने की अलग-अलग दरें निर्धारित कर सके।
जुर्माने की दरों को स्थानीय समुदायों या ग्राम सभाओं के बजाय, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा प्रांतीय सरकार द्वारा निर्धारित किया जाता था। यह एक केंद्रीकृत प्रणाली थी, जहाँ स्थानीय आर्थिक वास्तविकता के बजाय ब्रिटिश राजस्व हितों को प्राथमिकता दी जाती थी। इस अधिसूचना को प्रकाशित करने के पहले प्रस्तवित दरों पर लोगों के सुझाव अथवा आपत्ति जानने की कोई भी विधि नहीं दी गई हैं।
विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग मान विहित करने का अधिकार सरकार को आर्थिक रूप से अधिक मूल्यवान क्षेत्रों, जहाँ नकद फसलें उगाई जाती थीं और ब्रिटिश राजस्व अधिक था, वहा पर ऊँचा जुर्माना लगाने की शक्ति देता था। इससे एक तरह का भेदभाव होता था और जहा पशुओं के लिए चारागाहों की भूमी कम होती थी वहा के पशुपालकों के लिए ये और भी दमनकारी होता था।
जुर्माने का संग्रह:
इस प्रकार वसूले गए सभी जुर्माने, प्रांतीय सरकार द्वारा निर्दिष्ट किसी अधिकारी के माध्यम से, जिला मजिस्ट्रेट को भेजे जाएंगे। यह सुनिश्चित करता है कि पैसा सीधे ब्रिटिश नियंत्रण वाले कोष में जाए। इससे स्थानीय भारतीय संस्थाओं को इन निधियों के उपयोग पर कोई अधिकार या नियंत्रण नहीं मिलता था।
जुर्माने का मुख्य उद्देश्य फसल को हुए नुकसान की भरपाई करना कम, और राजस्व एकत्र करना तथा पशुपालकों को दंडित करना अधिक था। मतलब उस किसान को भी कुछ नहीं मिलता था जिसकी फसल का नुकसान पशु अतिचार के कारण होता था और पशु पालक भी आर्थिक बोझ के तले दबा रहता था। दोनों का नुकसान करके गोरे अपनी तिजोरी भरते थे।
सार्वजनिक सूची:
लोगों की जानकारी के लिए, जुर्माने की दरों की और पशुओं को खिलाने-पिलाने के प्रभारों (धारा 5) की एक सूची प्रत्येक कांजी हौस पर या उसके पास एक आसानी से दिखने वाले स्थान पर लगाई जाएगी। ये पहले नहीं होता था। 1927 के संशोधन के बाद यह पारदर्शिता अंग्रेजों ने इस प्रावधान मे लाई थी। इस पारदर्शिता के अभाव मे 1871 से लेकर 1927 तक न जाने कितने पशुपालकों को अंग्रेजों ने रोजगारहिन एवं दरिद्र बना दिया था। इस पारदर्शिता के लिए भी न जाने कितना संघर्ष भारतीयों को करना पड़ा था।
12.3 संशोधन हेतु सुझाव
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 12 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कैसे अंग्रेजों ने न्याय के नाम पर एक ऐसी व्यवस्था बनाई थी जिसमें पीड़ित किसान और पशुपालक दोनों का शोषण होता था और सारा धन सरकारी खजाने में जाता था। दोनों पक्ष अगर गरीब हैं तो और भी गरीब हो जाते थे। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
1) कलोनीअल नीति का अंत
ब्रिटिश काल में जुर्माने का एकमात्र उद्देश्य राजस्व बढ़ाना और पशुपालकों को दंडित करना था। नए अधिनियम में जुर्माने की इस लूट-खसोट वाली नीति को समाप्त कर ‘सुधारात्मक और क्षतिपूर्ति’ आधारित नीति अपनानी चाहिए। जुर्माने की दरें राज्य सरकार के बंद कमरों में नहीं, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों और हितधारकों के परामर्श से तय होनी चाहिए। इसके लिए जब भी ये दरें किसी जगह स्थानीय निकाय तय करता हैं तो उन दरों को लागू करने के पहले उन्हे सार्वजनिक करने के हर तरीके, जैसे नोटिस बोर्ड, अखबार मे जाहीर नोटिस, डिजिटल फॉर्म मे लिखित एवं श्राव्य माध्यम से, इत्यादि का उपयोग करना आवश्यक होना चाहिए।
2) संविधान के साथ अनुरूपता
यह धारा अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) के सिद्धांतों के विरुद्ध है क्योंकि यह पीड़ित किसान को उसके नुकसान की भरपाई नहीं दिलाती। नया कानून यह सुनिश्चित करेगा कि वसूले गए जुर्माने का एक बड़ा हिस्सा सीधे उस व्यक्ति को मिले जिसकी फसल या संपत्ति का नुकसान हुआ है, न कि वह केवल सरकारी खजाने में जमा हो।
3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता
शहरी क्षेत्रों में जुर्माने की दरें पशु द्वारा पहुंचाई गई शारीरिक चोट या सार्वजनिक अथवा निजी संपत्ति के नुकसान के आधार पर होनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे लघु और सीमांत किसानों की आर्थिक क्षमता के अनुरूप रखा जाना चाहिए। आवासीय क्षेत्रों में पालतू जानवरों द्वारा गंदगी फैलाने या हमला करने के लिए अलग और स्पष्ट जुर्माने का प्रावधान होना चाहिए। अगर आवारा पशु के अतिचार के कारण नुकसान या चोट लगी हो तो ऐसे आवारा पशु को तुरंत जब्त कर कांजी हौस मे रखा जाए, उसके बर्ताव का अध्ययन कर उसे उचित चिकित्सा दी जाए।
4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार
जिला मजिस्ट्रेट को सारा पैसा भेजने के बजाय, जुर्माने की राशि का प्रबंधन स्थानीय ग्राम पंचायत या नगर निकाय की ‘पशु कल्याण निधि’ द्वारा किया जाना चाहिए। स्थानीय संस्थाओं को यह अधिकार हो कि वे किसी गरीब पशुपालक की स्थिति को देखते हुए जुर्माने की राशि को कम या माफ कर सकें। इसी निधि मे बचे हुए धन का उपयोग स्थानीय निकाय आवारा पशुओ के प्रबंधन एवं देखरेख के लिए भी कर सकती हैं।
5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन
जुर्माने के विवादों को सुलह समिति के पास भेजा जाना चाहिए। 1996 के अधिनियम के तहत, यदि पशु मालिक और पीड़ित किसान आपसी समझौते से क्षतिपूर्ति की राशि तय कर लेते हैं, तो सरकारी जुर्माने को न्यूनतम किया जाना चाहिए ताकि समुदायों के बीच रंजिश न बढ़े।
6) जब्त पशुओ का कल्याण
जुर्माने से प्राप्त आय का एक निश्चित हिस्सा (जैसे 25%) अनिवार्य रूप से उसी कांजी हौस के आधुनिकीकरण और वहां रह रहे पशुओं के स्वास्थ्य व पोषण पर खर्च किया जाना चाहिए। पशुओं से वसूला गया पैसा उन्हीं के कल्याण के काम आना चाहिए।
7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी
आवारा पशुओं के मामले में, जहां कोई मालिक नहीं होता, वहां आवारा पशुओं के टीकाकरण और नसबंदी के लिए पशु कल्याण निधि का कुछ हिस्सा भी इस काम के लिए उपयोग मे लाया जा सकता हैं।
8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति
आवासीय क्षेत्रों में क्षतिपूर्ति की राशि केवल जुर्माना नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें पीड़ित के इलाज का खर्च और मानसिक आघात का हर्जाना भी शामिल होना चाहिए। यह राशि सीधे पीड़ित को दिलाई जानी चाहिए। पीड़ित अगर चाहे तो पशु कल्याण निधि मे दान दे सकते हैं, ऐसे प्रावधान होने चाहिए, दान देनेवाले को आयकर मे कुछ फायदा होने लगेगा तभी लोग ऐसे सरकारी निधियों मे दान देंगे।
9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए
जुर्माने की वसूली की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए ‘पशु मित्रों’ को पर्यवेक्षक (Observer) के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। इससे रखवाले द्वारा रसीद न देने या अधिक पैसे वसूलने जैसी भ्रष्ट प्रथाओं पर लगाम लगेगी।
10) आधुनिकीकरण
जुर्माने और प्रभारों की सूची केवल दीवार पर न लगाई जाए, बल्कि इसे विभाग की वेबसाइट और मोबाइल ऐप पर भी रीयल-टाइम अपडेट किया जाना चाहिए। जुर्माने का भुगतान डिजिटल माध्यम (UPI/Card) से होना चाहिए ताकि भ्रष्टाचार की कोई गुंजाइश न रहे और हर पैसे का हिसाब पारदर्शी हो। अथवा इसे बैंक डिपॉजिट चालान के रूप मे दोषी को दिया जाए। डिजिटल पेमेंट मे कुछ डिस्काउंट रखना चाहिए, इससे लोग बैंक मे कैश डिपॉजिट करने के बजाय डिजिटल पर्याय का उपयोग करेंगे।
11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर
जुर्माने और क्षतिपूर्ति से प्राप्त होने वाली निधि का उपयोग स्थानीय स्तर पर ‘पशु एम्बुलेंस’ चलाने या ‘पशु रक्षक’ तैनात करने के लिए किया जा सकता है। इससे स्थानीय युवाओं को पशु सेवा और प्रबंधन के क्षेत्र में वेतनभोगी रोजगार प्राप्त होगा।
काले धन का समाधान हैं बैंक ट्रैन्स्फर एवं डिजिटल पेमेंट मे कुछ डिस्काउंट देना। मानलों कोई चीज 100 रुपयों की हैं और उसे खरीदने के बाद अगर कोई व्यक्ति कैश पेमेंट करता हैं तो वो उसे 100 रुपयों मे ही मिले पर अगर कोई व्यक्ति उसका डिजिटल भुगतान करता हैं तो वो 5% या 10% के डिस्काउंट पर उस व्यक्ति को मिलनी चाहिए। डिस्काउंट का मायाजाल लोगों से कुछ भी करवा सकता हैं तो फिर डिस्काउंट के लिए उनकी आय को लोग क्यू नहीं बैंक मे जमा करेंगे? काला धन का अर्थ ही है ऐसा धन जिसका कोई रिकार्ड नहीं हैं, और बैंक मे एक रुपये की एंट्री का भी रिकार्ड होता हैं। इसीलिए सरकार बैंक और डिजिटल पेमेंट पर कर लगाने के बजाय उसपर डिस्काउंट का प्रावधान लाए, इससे ज्यादा से ज्यादा लोगों का पैसा रिकार्ड पर आएगा।
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