पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 11

11.1 मूल प्रावधान

111. सार्वजनिक सड़कों, नहरों और बांधों को नुकसान पंहुचाने वाले पशु – सार्वजनिक सड़कों, आमोद-प्रमोद स्थलों, बागानों, नहरों, जल-निकास संकर्मों, बांधों आदि के भारसाधक व्यक्ति और पुलिस के अधिकारी, ऐसी सड़कों, स्थलों, बागानों, नहरों, जल-निकास संक्रमों, बांधों आदि अथवा ऐसी सड़कों, नहरों, जल-निकास संकर्मों या बांधों के पार्थों या डालानों को नुकसान पहुंचाने वाले या वहां भटकते हुए पाए गए किन्हीं पशुओं को अभिगृहीत कर सकेंगे या अभिगृहीत करा सकेंगे,

और 2[उनको चौबीस घंटे के अन्दर] निकटतम कांजी हौस को 2[भेजेंगे या भिजवाएंगे ।]

मूल प्रावधान की पादटिका

1. धारा 11 का वनों को लागू होने के संबंध में देखिए भारतीय वन अधिनियम, 1927 (1927 का 17) की धारा 70; रेल को लागू होने के संबंध में देखिए भारतीय रेल अधिनियम, 1890 (1890 का 9)।

2. 1891 के अधिनियम सं० 1 की धारा 4 द्वारा “अनावश्यक बिलम्ब किए बिना ले जाएगा” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।

11.2 विश्लेषणात्मक आलोचना

यह धारा सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करती है, यह परिभाषित करती है कि किन सरकारी संपत्तियों को अतिचार से सुरक्षित रखा जाना है और कौन से अधिकारी अतिचार करने वाले पशुओं को ज़ब्त कर सकते थे। महत्वपूर्ण सार्वजनिक निर्माण मे शामिल थे, सार्वजनिक सड़कें, आमोद-प्रमोद स्थल (पार्क), नहरें, जल-निकास के कार्य (ड्रेनेज), बाँध, साथ ही, इन सड़कों, नहरों या बाँधों के किनारे या ढलान (Sides or Slopes) को भी सुरक्षा प्रदान की गई थी। अतिचार करने वाले या भटकते हुए पाए गए पशुओं को पकड़ने का अधिकार इन सड़कों, नहरों, बाँधों आदि के भारसाधक व्यक्ति, यानी, वे अधिकारी जो उनके रखरखाव और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार थे और पुलिस के अधिकारी को दिया गया था। ज़ब्त किए गए पशुओं को पकड़ने वाले अधिकारी को चौबीस घंटे के भीतर उन्हें निकटतम कांजी हौस को भेजना या भिजवाना अनिवार्य था।

इस प्रावधान में ब्रिटिश नीति का प्रभाव बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने और आजीविका के पारंपरिक तरीकों पर कठोर प्रतिबंध लगाने में देखा जा सकता है, जो आम भारतीयों पर दंडात्मक प्रभाव डालता था। इस प्रावधान से स्पष्ट होता हैं की पालतू पशुओं को सार्वजनिक रास्तों से भी गुजरने के अधिकार न के बराबर था। ब्रिटिश शासन के लिए सड़कें, नहरें, जल-निकास संकर्म और बाँध जैसे बुनियादी ढांचे अत्यंत महत्वपूर्ण थे। नहरें कृषि राजस्व के लिए और सड़कें, विशेषकर रेलवे सैन्य आवाजाही तथा कच्चे माल के निर्यात के लिए आवश्यक थीं। इस धारा ने इन रणनीतिक संपत्तियों को पशुओं द्वारा होने वाले किसी भी नुकसान से बचाने के लिए कानूनी हथियार प्रदान किया। पशुओं को ‘भटकते हुए’ पाए जाने मात्र पर ही ज़ब्त करने का प्रावधान यह दिखाता है कि प्रशासन कितना सख्त था। यह नीति आजीविका से जुड़े पारंपरिक चारागाह मार्गों का उल्लंघन करती थी, जिससे पशुपालकों के लिए अपने मवेशियों को चराना और पानी पिलाना कठिन हो जाता था।

धारा 11 ब्रिटिश नीति की उस प्राथमिकता को दर्शाती है जिसके तहत साम्राज्य के आर्थिक और सैन्य बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को आम भारतीय पशुपालकों की आजीविका की आवश्यकता से ऊपर रखा गया, और इसके प्रवर्तन के लिए सीधे पुलिस और सरकारी अधिकारियों को कानूनी शक्ति प्रदान करके कठोर नियंत्रण स्थापित किया गया। आजीविका के मौलिक अधिकार का उल्लंघन इस प्रावधान के द्वारा होने के बाद भी इस अधिनियम को अभी भी निरसित नहीं किया गया हैं।

11.3 संशोधन हेतु सुझाव

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 11 का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि कैसे अंग्रेजों ने सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के नाम पर आम भारतीयों के आवागमन और आजीविका के पारंपरिक अधिकारों को छीन लिया था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:

1) कलोनीअल नीति का अंत

ब्रिटिश काल में सार्वजनिक संपत्तियों को ‘रणनीतिक संपत्ति’ मानकर पशुओं के वहां होने मात्र को अपराध माना जाता था। नए अधिनियम में इस ‘दमनकारी सुरक्षा’ की नीति को बदलकर ‘सह-अस्तित्व और प्रबंधन’ की नीति अपनानी चाहिए। पशुओं को केवल ‘भटकने’ के आधार पर जब्त करना बंद होना चाहिए, जब तक कि वे किसी वास्तविक खतरे या गंभीर बाधा का कारण न बन रहे हों।

2) संविधान के साथ अनुरूपता

यह धारा आजीविका के अधिकार (अनुच्छेद 19) और आने-जाने की स्वतंत्रता का उल्लंघन करती है। नया कानून अनुच्छेद 21 के तहत मनुष्य और पशु दोनों के जीवन की गरिमा को ध्यान में रखे। सार्वजनिक स्थानों पर पशुओं की उपस्थिति को केवल ‘राजस्व की हानि’ के बजाय ‘प्रबंधन की आवश्यकता’ के रूप में देखा जाना चाहिए।

3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता

शहरी क्षेत्रों में सार्वजनिक सड़कों और पार्कों में पशुओं के कारण होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए यह धारा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका उद्देश्य ‘जब्ती’ से अधिक ‘सुरक्षा’ होना चाहिए। शहरों में आवारा पशुओं के लिए सुरक्षित कॉरिडोर या शेल्टर की व्यवस्था होनी चाहिए, न कि केवल जेल जैसे कांजी हौस। ग्रामीण क्षेत्रों में नहरों और बांधों के किनारे चराई के पारंपरिक अधिकारों को कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए। नहरों और बांधों के दोनों तरफ फेंसिंग कर देने पर यह संभव हो सकेगा। इससे पाणी मे गिरकर पशुओं की मृत्यु भी नहीं होगी।

4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार

सार्वजनिक संपत्ति के भारसाधक अधिकारियों के बजाय, स्थानीय वार्ड समितियों और ग्राम पंचायतों को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि कौन से क्षेत्र ‘पशु-मुक्त क्षेत्र’ होंगे और कौन से ‘साझा उपयोग’ के लिए होंगे। इससे अधिकारियों की मनमानी और पशुपालकों के उत्पीड़न पर रोक लगेगी।

5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन

सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचने के दावों के मामले में, संबंधित सरकारी विभाग और पशु मालिक के बीच सुलह समिति का हस्तक्षेप अनिवार्य हो। 1996 के अधिनियम के तहत, नुकसान का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए ताकि अधिकारी मुआवजे के नाम पर गरीब पशुपालकों का शोषण न कर सकें।

6) जब्त पशुओ का कल्याण

सार्वजनिक स्थानों से पकड़े गए पशुओं को अक्सर बहुत खराब स्थिति में ले जाया जाता है। नए कानून के तहत, इन पशुओं को ले जाने के लिए आधुनिक और हवादार वाहनों का उपयोग अनिवार्य होना चाहिए। कांजी हाउस पहुँचने तक उनके भोजन और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी पकड़ने वाले विभाग की होगी। बंद वाहनों मे पशुओं को जबरन ठूंस कर कई बार निजी वाहन भी जाते हैं, ऐसे लोगों पर कड़ी कार्यवाही की जाए इस हिसाब से कठोर कानून हो जो पशु क्रूरता को एक बहुत बड़ा अपराध बना दे। ऐसे अपराध के लिए कारावास की शिक्षा की जगह बहुत बड़े जुर्माने का प्रावधान होना चाहिए। इस जुर्माने का उपयोग पशु कल्याण हेतु किया जा सके।

7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी

सार्वजनिक स्थानों पर ‘भटकते हुए’ पाए गए पशु यदि आवारा हैं, तो उन्हें दंड के बजाय ‘देखभाल’ की श्रेणी में रखा जाए। उन्हें तुरंत सरकारी पशु चिकित्सालयों में टीकाकरण और नसबंदी के लिए भेजा जाए, जिससे सार्वजनिक सुरक्षा और पशु कल्याण दोनों सुनिश्चित हो सकें। अगर आवारा पशु को टैग लग जाते हैं तो यह करना और भी सरल हो सकता हैं।

8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति

यदि किसी पालतू पशु के कारण सार्वजनिक सड़क पर कोई दुर्घटना होती है, तो पशु मालिक को पीड़ित व्यक्ति को क्षतिपूर्ति देने के लिए उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए। यह क्षतिपूर्ति प्रक्रिया पारदर्शी और त्वरित होनी चाहिए, जिससे सड़क सुरक्षा के प्रति पशु मालिकों में जवाबदेही बढ़े। हर पालतू पशु के लिए भी टैग लगाना अनिवार्य करने पर यह प्रक्रिया और भी सरल हो सकती हैं।

9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए

पुलिस को केवल तभी बुलाया जाए जब यातायात बाधित हो या सुरक्षा का गंभीर खतरा हो। सामान्य स्थितियों में, प्रशिक्षित ‘पशु मित्रों’ और ‘एनिमल रेस्क्यू टीम’ का उपयोग किया जाना चाहिए। पुलिस की उपस्थिति दमन के लिए नहीं, बल्कि पशु मित्रों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए होनी चाहिए।

10) आधुनिकीकरण

सार्वजनिक संपत्तियों की निगरानी के लिए ड्रोन और सीसीटीवी तकनीक का उपयोग किया जाए। यदि कोई पशु नुकसान पहुंचाता है, तो उसके डिजिटल टैग (Tag) के माध्यम से मालिक की पहचान कर उसे ऑनलाइन एवं जल्द से जल्द प्रत्यक्ष नोटिस भेजा जाए। इससे अधिकारियों को पशुओं को शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने या जब्त करने की आवश्यकता कम होगी।

11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर

सार्वजनिक स्थलों और सड़कों पर पशु प्रबंधन के लिए ‘पशु सुरक्षा सहायकों’ के नए पद सृजित किए जा सकते हैं। स्थानीय युवाओं को इस कार्य में लगाकर उन्हें सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और पशु कल्याण का प्रशिक्षण दिया जाए, जिससे सरकारी विभागों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। सरकारी नौकरी के साथ जुड़ी सम्मान की भावना के कारण कई युवा इसे एक उचित करियर ऑप्शन की तरह देखने लगेंगे। युवा तो ये काम करने के लिए तैयार भी हैं परंतु कुछ आर्थिक लाभ नहीं होता इसीलिए उन्हे मजबूरन ऐसे काम को छोड़ना पड़ता हैं।

आज देश मे बुलेट ट्रेन दौड़ रही हैं। पशुओं को रेल लाइन के आसपास भटकने से रोकने के लिए रेल लाइन के दोनों तरफ उचित फेंसिंग की जानी चाहिए इससे दो फायदे होंगे पहला पशु रेल लाइन के पर नहीं आएंगे और दूसरा जो असामाजिक तत्व रेल लाइन पर अनेक अपराध करने के लिए भटकते हैं वे सब भी प्रतिबंधित हो जाएंगे। कानून मे उचित बदलाव से अनेक समस्याओं का हल किया जा सकता हैं। नहरे, बगीचे, मैदान, रास्ते, रेलवे सभी आवश्यक हैं और इनके लिए उचित फेन्सिंग कर अथवा दीवारे बना कर सुरक्षा करना भी उतना ही आवश्यक हैं।

कृपया इस ब्रिटिश कालीन कानून को निरस्त करने हेतु नीचे दिए लाल बटन को प्रेस करिए। अपना मेल एप एवं अकाउंट सिलेक्ट करिए, मेल अपने आप टाइप होकर आ जाएगा। आपको केवल सेन्ड करना हैं।

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