9.1 मूल प्रावधान
9. पशुओं का भार ग्रहण करना और उन्हें खिलाना – कांजी हौस रखवाला पशुओं का तब तक जब तक कि उनका इसमें इसके पश्चात् निर्दिष्ट रूप में व्ययन नहीं कर दिया जाता भार ग्रहण करेगा, उन्हें खिलाएगा और पिलाएगा।
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9.2 विश्लेषणात्मक आलोचना
यह धारा कांजी हौस रखवाले के दो प्रमुख और सतत कर्तव्यों को स्पष्ट करती है:
भार ग्रहण करना (Custody):
कांजी हौस रखवाला सभी जब्त किए गए पशुओं को अपनी अभिरक्षा (Custody) में लेगा। यह अभिरक्षा तब तक जारी रहेगी जब तक कि अधिनियम में बाद में बताए गए तरीके से उन पशुओं का व्ययन (Disposal) नहीं हो जाता। ‘व्ययन’ का अर्थ है, या तो मालिक द्वारा जुर्माना भरकर उन्हें छुड़ा लेना या, यदि मालिक उन्हें नहीं छुड़ाता है, तो उन्हें नीलाम कर देना।
खिलाना और पिलाना (Feeding and Watering):
रखवाला यह सुनिश्चित करेगा कि उसकी अभिरक्षा में रखे गए पशुओं को नियमित रूप से खिलाया और पानी पिलाया जाए। यह काम पूर्णकालिक हैं, पर रखवाले अक्सर दो पदों पर नियुक्त होते थे और दूसरे पद जे भार का बहाना बना कर कई बार समय पर जितना आवश्यक हैं उतना चारा और पाणी भी पशुओ को नहीं देते थे। हालांकि पशुओं को खिलाने और पिलाने का निर्देश एक मानवीय आवश्यकता थी, लेकिन धारा 5 के तहत इन कार्यों के लिए लगने वाले प्रभारों को तय करने का अधिकार जिला मजिस्ट्रेट के पास था। रखवाले द्वारा पशुओं को खिलाने पर हुआ खर्च मालिक को ही चुकाना पड़ता था। यदि कांजी हौस में पशुओं की देखभाल का स्तर खराब होता था, तो भी मालिक को उस ‘देखभाल’ के लिए उच्च शुल्क देना पड़ता था।
‘व्ययन नहीं हो जाता’ वाक्यांश का अर्थ है कि रखवाले को पशुओं को तब तक रखना था जब तक कि मालिक उन्हें छुड़ा न ले या उन्हें बेच न दिया जाए। यदि मालिक वित्तीय कठिनाई के कारण तुरंत जुर्माना नहीं भर पाता था, तो मवेशी लंबे समय तक कांजी हौस में रहते थे, जिससे दैनिक खिलाने का शुल्क लगातार बढ़ता जाता था। यह बढ़ता हुआ शुल्क गरीब पशुपालक पर दबाव डालता था, और कुछ मामलों में, यह शुल्क इतना अधिक हो जाता था कि मालिक के लिए पशुओं को छुड़ाना आर्थिक रूप से असंभव हो जाता था। अंततः, पशुओं को नीलाम कर दिया जाता था, जिससे गरीब मालिक अपनी आजीविका के साधन से हमेशा के लिए हाथ धो बैठता था।
9.3 संशोधन हेतु सुझाव
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 9 का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि कैसे पशुओं की ‘अभिरक्षा’ और ‘भोजन’ को एक व्यापारिक और दमनकारी चक्र में बदल दिया गया था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
1) कलोनीअल नीति का अंत
ब्रिटिश काल में ‘भार ग्रहण’ करने का अर्थ केवल पशु को कैद करना था। नए अधिनियम में इसे ‘संरक्षण’ (Protection) के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए। औपनिवेशिक व्यवस्था में रखवाले की लापरवाही पर कोई दंड नहीं था, लेकिन नए कानून में यदि रखवाले एवं कांजी हौस के कर्मचारियों की अनुपस्थिति या लापरवाही से पशु को कष्ट होता है, तो उसे सेवा से मुक्त करने और उस पर जुर्माना लगाने का प्रावधान होना चाहिए। पशु चिकित्सक के मामले मे भी अगर वह लापरवाही करते हैं तो ऐसे प्रावधान होने चाहिए।
2) संविधान के साथ अनुरूपता
पशु को तब तक कैद रखना जब तक कि उसका शुल्क पशु की कीमत से अधिक न हो जाए, अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 14 के तहत आर्थिक न्याय के विरुद्ध है। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि भोजन और पानी का शुल्क वास्तविक लागत पर आधारित हो और किसी भी परिस्थिति में यह गरीब पशुपालक की आजीविका छीनने का माध्यम न बने।
3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता
शहरी क्षेत्रों में, जहाँ जगह की कमी है, वहां पशुओं को केवल बांधकर रखना क्रूरता है। नए अधिनियम में शहरी आश्रय गृहों के लिए ‘मुक्त क्षेत्र’ (Open Space) का प्रावधान होना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में, चारे की गुणवत्ता के लिए स्थानीय कृषि उत्पादों का उपयोग अनिवार्य किया जाना चाहिए ताकि पशुओं का स्वास्थ्य बना रहे।
4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार
पशु कितने समय तक अभिरक्षा में रहेगा, इसका निर्णय केवल रखवाला या कानून न करे। यदि मालिक 48 घंटे के भीतर पशु नहीं छुड़ा पाता, तो स्थानीय पंचायत या वार्ड समिति को हस्तक्षेप कर शुल्क में रियायत देने या पशु को अस्थायी रूप से मालिक को सौंपने का अधिकार होना चाहिए, ताकि शुल्क का बोझ न बढ़े।
5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन
‘व्ययन’ (Disposal) या नीलामी की नौबत आने से पहले सुलह समिति का अनिवार्य हस्तक्षेप होना चाहिए। 1996 के अधिनियम के सिद्धांतों के आधार पर, समिति यह सुनिश्चित करेगी कि मालिक को अपनी बात रखने का मौका मिले और नीलामी को अंतिम विकल्प के रूप में ही रखा जाए, ताकि किसी की आजीविका नष्ट न हो।
6) जब्त पशुओ का कल्याण
धारा 9 में ‘खिलाना और पिलाना’ केवल जीवित रखने तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसमें ‘उचित पोषण’ और ‘स्वच्छ वातावरण’ शब्द जोड़े जाने चाहिए। रखवाले की यह कानूनी जिम्मेदारी होगी कि वह बीमार पशु को तुरंत चिकित्सा उपलब्ध कराए। यदि पशु की मृत्यु अभिरक्षा में होती है, तो उसका पोस्टमार्टम अनिवार्य हो ताकि रखवाले की जवाबदेही तय हो सके।
7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी
अभिरक्षा के दौरान ही आवारा पशुओं के स्वास्थ्य परीक्षण की व्यवस्था हो। यदि कोई पशु लंबे समय तक ‘व्ययन’ की प्रतीक्षा में है, तो उस दौरान उसका टीकाकरण और नसबंदी पूरी की जानी चाहिए। इसका व्यय सरकारी कोष या ‘स्थानीय पशु कल्याण निधि’ से किया जाना चाहिए।
8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति
आवासीय क्षेत्रों में हमलावर पशुओं की अभिरक्षा के दौरान उनके व्यवहार का अध्ययन (Behavioral Assessment) किया जाना चाहिए। यदि पशु अत्यधिक हिंसक है, तो उसे मालिक को वापस करने के बजाय पुनर्वास केंद्र भेजा जाए और पीड़ित की क्षतिपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए
खिलाने और पिलाने की प्रक्रिया का निरीक्षण ‘पशु मित्रों’ की एक टीम द्वारा साप्ताहिक रूप से किया जाना चाहिए। पुलिस का कार्य केवल यह सुनिश्चित करना होगा कि रखवाला या मालिक किसी भी प्रकार की हिंसा न करें। पशु मित्रों की सक्रियता से रखवाले की ‘दोहरी पद’ वाली लापरवाही पर लगाम लगेगी।
10) आधुनिकीकरण
प्रत्येक पशु के भोजन और पानी के समय को डिजिटल लॉगबुक में दर्ज किया जाना चाहिए। कांजी हाउस में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं ताकि यह प्रमाणित हो सके कि पशुओं को वास्तव में चारा और पानी दिया जा रहा है। यह डेटा सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध होना चाहिए ताकि कोई भी नागरिक पारदर्शिता की जांच कर सके।
11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर
पशुओं को खिलाने और उनकी सफाई के लिए स्थानीय ‘पशु देखभाल सहायकों’ की नियुक्ति की जाए। इससे ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षण और रोजगार मिलेगा। साथ ही, चारे की आपूर्ति के लिए स्थानीय स्वयं सहायता समूहों को जोड़कर एक पारदर्शी आर्थिक तंत्र विकसित किया जा सकता है।
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