UGC Act: Section 12: Part 3
This fragmented funding model leads to institutional stagnation, where universities wait years for grants while inflation erodes the value of the allocated funds.
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As the said site was declared as protected monument u/s 3 of the Ancient Monuments Preservation Act, 1904, in 1921, do we really bound to carry over such declaration by the British Government under AMASR Act without any value assessment on the grounds of cultural, historical, artistic, national pride, etc.? Before such assessment we should take a note that British people were only here to loot this nation and we should not glorify any of such person in any way.
The Article 49 of the Constitution of India specifies that it shall be the obligation of the State to protect every monument or place or object of artistic or historic interest, declared by or under law made by Parliament to be of national importance, from spoliation, disfigurement, destruction, removal, disposal or export, as the case may be.”
1. Under Section 2(j) of the AMASR Act, respondents declared the said tomb and circular vault as ancient monument merely on account of its existence for more than 100 years. The said site does not fulfill any criteria of an ancient monument, as it contains only the remains of close person of the then former Governor. This site does not have any historical, archaeological or artistic significance which need to be protected as ancient monument by respondents on government spending.
यह विस्तृत विश्लेषण सिद्ध करता है कि 1871 का यह अधिनियम अब अप्रासंगिक और दमनकारी हो चुका है। इसे पूरी तरह निरस्त कर एक ऐसे नए “एकीकृत पशु कल्याण और अतिचार प्रबंधन अधिनियम” की आवश्यकता है जो पशुओं को “राजस्व की वस्तु” नहीं, बल्कि “जीवंत प्राणी” माने, किसानों और पशुपालकों के हितों में संतुलन बनाए एवं भारतीय पंचायती राज और डिजिटल इंडिया की सोच को आत्मसात करे।
मुजरा करने का सिद्धांत कानूनी रूप से सही है क्योंकि यह किसी को दोहरी क्षतिपूर्ति मिलने से रोकता है। हालाँकि, यह प्रावधान औपनिवेशिक व्यवस्था की उस नीति को दर्शाता है जो राजस्व और पैसे के प्रवाह पर पूर्ण नियंत्रण चाहती थी, खासकर तब जब पैसा राज्य के नियंत्रण वाले कोष से बाहर जा रहा हो। यह मुजरा करने की प्रक्रिया गरीब किसान पर यह साबित करने का बोझ डालती थी कि उसे मजिस्ट्रेट से पहले कोई मुआवजा मिला है या नहीं, जिससे सिविल वाद की कार्यवाही और जटिल हो जाती थी।
यह दोनों न्यायालय अक्सर तहसील अथवा जिले के नगर मे ही स्थित रहते थे। इससे न्याय मे देरी की संभावना बढ़ जाती थी। बिना वकील को नियुक्त किए ये मामले सुलझते नहीं थे। ब्रिटिश नीति ने यह सुनिश्चित किया कि वास्तविक क्षतिपूर्ति पाने का रास्ता इतना कठिन हो कि अधिकांश गरीब किसान इसे अपनाने का साहस न करें। यह एक कानूनी प्रावधान था जो केवल धनी ज़मींदारों और संपन्न वर्गों के लिए उपयोगी था जो सिविल मुकदमे का खर्च उठा सकते थे। गोरों ने बड़ी कुटिलता से स्थानीय पंचोंद्वारा विवाद सुलझाने वाली भारतीय व्यवस्था को समाप्त कर प्रदीर्घ न्यायव्यवस्था इस देश पर केवल इसीलिए लागू की, क्यू की वे चाहते ही नहीं थे की भारतीय जनता को सरलता से न्याय मिले।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 28 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कैसे अंग्रेजों ने “न्याय” को मजिस्ट्रेट के विवेक की बेड़ियों में जकड़ रखा था। यह धारा दिखाती है कि नुकसान की भरपाई करना शासन की प्राथमिकता नहीं थी, बल्कि यह केवल एक विकल्प (option) था जिसे मजिस्ट्रेट अपनी मर्जी से चुन सकता था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
रखवाले के विरुद्ध शिकायतों की जांच का अधिकार स्थानीय निकाय को दिया जाना चाहिए। स्थानीय ग्राम पंचायत या नगर निकाय की “पशु कल्याण समिति” को रखवाले के कार्यों का साप्ताहिक ऑडिट करने और लापरवाही पाए जाने पर तुरंत दंड प्रस्तावित करने का अधिकार होना चाहिए। स्थानीय निगरानी से जवाबदेही बढ़ेगी। ऑडिट एवं जांच के बाद स्थानीय निकाय जो भी निर्णय दे भले ही उसके लिए अपील के अधिकार कांजी हौस के कर्मचारियों को दिए जाने चाहिए।
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 26 पर विश्लेषणात्मक आलोचना इस कानून के एक और भेदभावपूर्ण और दमनकारी पहलू को सामने लाती है। विशेष रूप से सुअरों का उल्लेख करना और फिर राज्य सरकार को जुर्माने की राशि मनमाने ढंग से बढ़ाने की शक्ति देना, औपनिवेशिक तंत्र की उस मानसिकता को दर्शाता है जो सामाजिक रूप से वंचित वर्गों को लक्षित करती थी। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं: