5.1 मूल प्रावधान
5. कांजी हौसों का नियंत्रण। परिबद्ध पशुओं को खिलाने के लिए प्रभारों की दरें – कांजी हौस जिला मजिस्ट्रेट के नियंत्रण के अधीन होंगे, और वह परिबद्ध पशुओं को खिलाने और पिलाने के लिए प्रभारों की दरों को नियत करेगा और समय-समय पर परिवर्तित कर सकेगा।
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5.2 विश्लेषणात्मक आलोचना
धारा 5 दो प्रमुख प्रशासनिक जिम्मेदारियों को स्पष्ट करती है:
कांजी हौस का नियंत्रण:
यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सभी कांजी हौस जिला मजिस्ट्रेट के सीधे नियंत्रण में रहेंगे। यह धारा कांजी हौसों पर जिला प्रशासनिक शक्तियों की प्रधानता को फिर से स्थापित करती है। स्थानीय प्रशासन को जो कई सदियों से इस देश के गाव देहातों मे चला आ रहा था, उसे इस नियंत्रण से बाहर कर दिया गया था। आज जब पंचायती राज का युग हैं, वहा इस केंद्रीयकृत प्रशासनिक नियंत्रण का क्या औचित्य बचता हैं?
खिलाने के लिए प्रभारों की दरें:
जिला मजिस्ट्रेट के पास यह अधिकार है कि वह उन पशुओं को खिलाने और पानी पिलाने के लिए ली जाने वाली प्रभारों की दरों (charges rates) को निर्धारित करे। वह इन दरों को आवश्यकतानुसार समय-समय पर बदल भी सकता था। जिला मजिस्ट्रेट द्वारा ही पशुओं को खिलाने-पिलाने के प्रभारों की दरें तय करने का अधिकार उन्हें एकतरफ़ा आर्थिक शक्ति प्रदान करता था। यदि ये दरें मनमाने ढंग से ऊँची रखी जाती थीं, तो इसका सीधा आर्थिक बोझ मवेशी मालिकों पर पड़ता था। चूंकि अतिचार के कारण जब्त किए गए मवेशियों को छुड़ाने में जितनी देर होती थी, प्रभार उतना ही बढ़ता जाता था। गरीब किसान या पशुपालक, जो अक्सर ग्रामीण साहूकारों के कर्ज में डूबे होते थे, उनके लिए यह एक गंभीर समस्या थी। यह एक ऐसा तंत्र था जो गरीब मालिकों को अत्यधिक आर्थिक दंड देकर दंडित करता था और उन्हें मजबूर करता था कि वे अपने पशुओं को जल्दी से जल्दी छुड़ा लें। यह एक प्रकार का संरचित आर्थिक दमन था।
जिस प्रकार धारा 4 में स्थानीय निकायों को स्थापना से बाहर रखा गया था, उसी प्रकार धारा 5 में उन्हें प्रभार तय करने से भी बाहर रखा गया। प्रभारों का निर्धारण स्थानीय चारे की लागत या स्थानीय समुदाय की आर्थिक क्षमता के आधार पर करने के बजाय, यह एक केंद्र-नियंत्रित अधिकारी के हाथ में था। यह व्यवस्था स्थानीय समुदायों को किसी भी प्रकार की वित्तीय या प्रशासनिक स्वायत्तता से पूरी तरह वंचित करती थी, जिससे उनके हितों की रक्षा करना कठिन हो जाता था।
5.3 संशोधन हेतु सुझाव
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 5 का विश्लेषण सत्ता के विकेंद्रीकरण और आर्थिक न्याय के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह धारा दर्शाती है कि कैसे अंग्रेजों ने पशुओं के ‘भोजन और पानी’ जैसे बुनियादी हक को भी एक वित्तीय दंड और नियंत्रण के औजार के रूप में इस्तेमाल किया। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
1) कलोनीअल नीति का अंत
ब्रिटिश काल में जिला मजिस्ट्रेट द्वारा खिलाने-पिलाने की दरें तय करना स्थानीय अर्थव्यवस्था को नजरअंदाज करने जैसा था। यह नीति पशुपालकों को कर्ज के जाल में फंसाने के लिए इस्तेमाल की जाती थी। नए अधिनियम में इस औपनिवेशिक नियंत्रण को समाप्त कर दरों के निर्धारण को स्थानीय बाजार की कीमतों और चारे की उपलब्धता के आधार पर पारदर्शी बनाया जाना चाहिए।
2) संविधान के साथ अनुरूपता
एक अधिकारी द्वारा मनमाने ढंग से दरें तय करना अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 19 (आजीविका का अधिकार) के सिद्धांतों को प्रभावित करता है। नया कानून यह सुनिश्चित करे कि दरें ‘लाभ कमाने’ के उद्देश्य से नहीं, बल्कि ‘लागत वहन’ करने के सिद्धांत पर आधारित हों। यह पशुओं के प्रति मानवीय व्यवहार के संवैधानिक अधिदेश के भी अनुकूल होगा।
3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता
ग्रामीण क्षेत्रों में चारे की दरें कृषि उपज पर आधारित होनी चाहिए, जबकि शहरी क्षेत्रों में जहां पशुओं के लिए जगह और भोजन महंगा है, वहां नगर पालिकाओं को विशेष कोष बनाना चाहिए। शहरी आश्रय गृहों में भोजन की गुणवत्ता और मात्रा के मानक वैज्ञानिक रूप से तय होने चाहिए ताकि पशुओं के स्वास्थ्य से समझौता न हो।
4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार
जिला मजिस्ट्रेट के बजाय, ग्राम पंचायतों और नगर निकायों की ‘पशु कल्याण समितियों’ को अपने क्षेत्र के लिए प्रभार तय करने का अधिकार होना चाहिए। स्थानीय निकाय यह बेहतर जानते हैं कि उनके क्षेत्र में चारे की वास्तविक कीमत क्या है, जिससे पशु मालिकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा।
5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन
यदि कोई पशु मालिक प्रभारों को अत्यधिक या अनुचित मानता है, तो वह सुलह समिति के समक्ष अपील कर सके। यह समिति 1996 के अधिनियम के सिद्धांतों का पालन करते हुए मालिक की आर्थिक स्थिति और अतिचार की गंभीरता को देखते हुए प्रभारों में रियायत देने का निर्णय ले सकती है, जिससे विवादों का शांतिपूर्ण अंत हो सके।
6) जब्त पशुओ का कल्याण
धारा 5 में ‘खिलाने और पिलाने’ के शब्द को बदलकर ‘पोषण और चिकित्सा देखभाल’ किया जाना चाहिए। केवल पेट भरना पर्याप्त नहीं है; पशु को स्वच्छ पानी, संतुलित आहार और बीमार होने पर उपचार मिलना चाहिए। प्रभारों का एक हिस्सा अनिवार्य रूप से पशुओं के स्वास्थ्य जांच के लिए आरक्षित होना चाहिए।
7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी
कांजी हाउस में आने वाले आवारा पशुओं के भोजन और चिकित्सा का खर्च व्यक्तिगत मालिकों के बजाय ‘स्थानीय पशु कल्याण निधि’ से आना चाहिए। नसबंदी और टीकाकरण के बाद इन पशुओं के आहार की विशेष देखभाल के लिए बजट का प्रावधान इसी धारा के अंतर्गत किया जाना चाहिए।
8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति
आवासीय क्षेत्रों में यदि किसी पालतू पशु को जब्त कर रखा जाता है, तो उसके मालिक से न केवल भोजन का प्रभार लिया जाए, बल्कि उस राशि का उपयोग पीड़ित की सहायता या क्षेत्र की पशु-सुरक्षा व्यवस्था को सुधारने में भी किया जाना चाहिए।
9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए
खिलाने-पिलाने की प्रक्रिया की निगरानी पुलिस के बजाय स्थानीय पशु मित्रों और स्वयंसेवकों को दी जानी चाहिए। वे यह सुनिश्चित करेंगे कि जो पैसा मालिक से लिया जा रहा है, वह वास्तव में पशु के कल्याण पर खर्च हो रहा है या नहीं, जिससे भ्रष्टाचार की संभावना कम होगी।
10) आधुनिकीकरण
प्रभारों की दरें और दैनिक व्यय का विवरण ऑनलाइन पोर्टल पर सार्वजनिक (Public Domain) होना चाहिए। पशु मालिक डिजिटल भुगतान कर सकें और उन्हें पशु के भोजन और स्वास्थ्य की ‘लाइव अपडेट’ या फोटो प्राप्त हो सके। इससे पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी और जवाबदेही बढ़ेगी।
11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर
पशुओं के लिए भोजन (चारे) की आपूर्ति का ठेका स्थानीय स्वयं सहायता समूहों (SHGs) या छोटे किसानों को दिया जाना चाहिए। इससे स्थानीय स्तर पर चारे के व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, जिससे ‘पशु-आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था’ को बल मिलेगा। शहरों मे इसकी आपूर्ति के लिए स्थानीय स्तर पर पशु आहार बनाने वाले कारखानों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। आत्मनिर्भर भारत के तहत ये किया जा सकता हैं एवं विदेशी ब्रांड के लिए उचित स्वदेशी शुद्ध एवं सस्ता पर्याय भी लोगों को मिल सकेगा। देश के युवाओं को इससे रोजगार भी मिलेंगे प्रोडक्षण से लेकर बेचने तक सभी कामों मे देश का युवा काम कर सकेगा।
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