4.1 मूल प्रावधान
अध्याय 2: कांजी हौस और कांजी हौस रखवाले
4. कांजी हौसों की स्थापना – कांजी हौस ऐसे स्थानों पर स्थापित किए जांएगे जिनके बारे में जिला मजिस्ट्रेट, राज्य सरकार के साधारण नियंत्रण के अध्यधीन, समय-समय पर निदेश दे।
इस बात का अवधारण कि प्रत्येक कांजी हौस किस ग्राम द्वारा प्रयुक्त किया जाएगा जिला मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाएगा।
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4.2 विश्लेषणात्मक आलोचना
‘कांजी हौस’ (Pound) ऐसे बाड़े या स्थान होते थे जहाँ अतिचार करते हुए पाए गए पालतू पशुओं को अस्थायी रूप से बंद करके रखा जाता था। मवेशियों को ज़ब्त करने के लिए ये स्थान अनिवार्य थे, और जुर्माना तब तक नहीं भरा जाता था जब तक मालिक अपने मवेशियों को छुड़ाने नहीं आते थे।
इस प्रावधान के अनुसार कांजी हौस उन स्थानों पर स्थापित किए जाएंगे जिनके लिए जिला मजिस्ट्रेट समय-समय पर निर्देश देगा। जिला मजिस्ट्रेट को यह निर्देश देने का अधिकार प्रांतीय सरकार के साधारण नियंत्रण के अधीन प्राप्त थे। इन कांजी हौस मे किन किन गावों मे जब्त किए हुए पशु रखे जाएंगे इसका निर्णय भी जिला मजिस्ट्रेट के ही हाथ मे था। यह प्रावधान प्रशासनिक नियंत्रण के माध्यम से आर्थिक दबाव और स्थानीय शक्तियों को दरकिनार करने की ब्रिटिश नीति को परिलक्षित करता था।
जिला मजिस्ट्रेट एक ब्रिटिश-नियुक्त अधिकारी था जो औपनिवेशिक सरकार के प्रति जवाबदेह था। यह प्रावधान ग्राम पंचायतों, मुखियाओं या अन्य स्थानीय स्वशासी निकायों को कांजी हौस की स्थापना और प्रबंधन के संबंध में कोई महत्वपूर्ण शक्ति नहीं देता। इस तरह, ब्रिटिश शासन ने स्थानीय भारतीय संस्थानों की स्वायत्तता को दरकिनार कर दिया और ग्रामीण प्रशासन को भी अपने सीधे नियंत्रण में ले लिया। स्वतंत्र भारत मे भी इस प्रावधान ने पंचायती राज को भी दरकिनार कर दिया।
अंग्रेजों के जमाने मे बने हुए ये कांजी हौस आज किस स्थिति मे हैं? क्या इनका उपयोग आज भी सरकार बूढ़े, बीमार, आवारा प्राणियों के लिए कर रही हैं? आए दिन रास्ते पर भटकते कुत्ते, बिल्ली एवं इस अन्य पालतू जानवरों के कारण तकलीफ होती हैं। अगर इतना ही अंग्रेजों की विरासत को अभिमानपूर्वक ढोना हैं तो उस विरासत का उपयोग इन आवारा जानवरों की देखभाल के लिए किया जा सकता हैं। इनकी रक्षा करना सरकार का संवैधानिक कर्तव्य हैं। कांजी हौस का उपयोग इस उत्तरदायित्व को पूरा करने मे सरकार ले सकती हैं। माना शहरों मे ऐसे कांजी हौस पर्याप्त संख्या मे नहीं हैं, पर सरकार ऐसे पशुओं को इन जगहों पर स्थानांतरित भी कर सकती हैं।
4.3 संशोधन हेतु सुझाव
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 4 का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि कैसे अंग्रेजों ने जिला मजिस्ट्रेट (DM) के पद का उपयोग स्थानीय शासन को कुचलने के लिए किया था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
1) कलोनीअल नीति का अंत
ब्रिटिश काल में कांजी हौस (Cattle Pound) की स्थापना का एकमात्र उद्देश्य दमनकारी नियंत्रण और राजस्व वसूली था। जिला मजिस्ट्रेट के पास इस शक्ति का केंद्रीकरण स्थानीय समुदायों को शक्तिहीन बनाने के लिए किया गया था। नए अधिनियम में इस ‘नियंत्रण’ की मानसिकता को समाप्त कर कांजी हौस को ‘पशु आश्रय एवं सुधार गृह’ के रूप में पुनर्गठित किया जाना चाहिए, जहाँ सत्ता का केंद्र नौकरशाही नहीं बल्कि स्थानीय समाज हो। आज भी कांजी हौस की स्थापना इसी कानून के तहत करने के प्रावधान स्थानीय प्रशासन से जुड़े अधिनियमों मे हैं।
2) संविधान के साथ अनुरूपता
धारा 4 का वर्तमान स्वरूप विकेंद्रीकरण के संवैधानिक सिद्धांत (73वें और 74वें संशोधन) के विरुद्ध है। नया प्रावधान अनुच्छेद 243G के अनुरूप होना चाहिए, जो पंचायतों को स्वशासन की शक्ति देता है। कांजी हौस का प्रबंधन केवल सरकारी आदेश नहीं, बल्कि पशुओं के प्रति दया (अनुच्छेद 51A) और उनके जीवन के संरक्षण के मानवीय मूल्यों पर आधारित होना चाहिए।
3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता
पुराने कानून में कांजी हौस केवल गांवों के लिए थे। नए अधिनियम के अंतर्गत शहरी क्षेत्रों में आधुनिक ‘अर्बन एनिमल शेल्टर्स’ की स्थापना अनिवार्य होनी चाहिए। ये केंद्र केवल गायों के लिए नहीं, बल्कि आवासीय क्षेत्रों में घूमने वाले आवारा कुत्तों, बिल्लियों और अन्य पालतू जानवरों के लिए भी होने चाहिए, ताकि शहरी सड़कों और सोसायटियों में सुरक्षा बनी रहे।
4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार
कांजी हौस की स्थापना और स्थान का चयन जिला मजिस्ट्रेट के बजाय ग्राम पंचायतों और नगर पालिकाओं के हाथ में होना चाहिए। स्थानीय निकायों को यह अधिकार होना चाहिए कि वे अपने क्षेत्र की आवश्यकतानुसार इन केंद्रों का संचालन करें। इससे प्रशासनिक देरी कम होगी और स्थानीय स्तर पर जवाबदेही तय होगी।
5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन
प्रत्येक कांजी हौस या आश्रय गृह के साथ एक ‘सुलह केंद्र’ संबद्ध होना चाहिए। यदि किसी पशु को अतिचार के कारण वहां लाया जाता है, तो सुलह समिति तुरंत मालिक और प्रभावित पक्ष के बीच मध्यस्थता करेगी। इसका उद्देश्य पशु को लंबे समय तक कैद में रखने के बजाय त्वरित समाधान और क्षतिपूर्ति सुनिश्चित करना होगा।
6) जब्त पशुओ का कल्याण
कांजी हौस की वर्तमान जर्जर स्थिति को देखते हुए, नए अधिनियम में इनके बुनियादी ढांचे के लिए कड़े मानक होने चाहिए। इनमें पर्याप्त स्थान, वेंटिलेशन, स्वच्छ पानी, और पशुओं के सोने के लिए उचित व्यवस्था होनी चाहिए। इसे ‘कल्याण केंद्र’ माना जाए न कि ‘जेल’, जहाँ पशुओं के साथ किसी भी प्रकार की क्रूरता कानूनन अपराध हो।
7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी
कांजी हौस का आधुनिकीकरण कर उन्हें ‘पशु स्वास्थ्य केंद्रों’ में बदला जाना चाहिए। यहाँ केवल जब्त पशु ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के आवारा पशुओं को लाकर उनका अनिवार्य टीकाकरण और नसबंदी (ABC – Animal Birth Control) की जानी चाहिए। यह आवारा पशुओं की समस्या का एक स्थायी और वैज्ञानिक समाधान प्रदान करेगा।
8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति
आवासीय क्षेत्रों में यदि कोई पालतू जानवर हमला करता है, तो उसे अस्थायी रूप से इन केंद्रों में रखा जा सकता है जब तक कि जांच पूरी न हो जाए। इन केंद्रों के माध्यम से ही पीड़ित व्यक्ति को मालिक द्वारा दी जाने वाली क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया को प्रमाणित और लागू किया जाना चाहिए। अगर केंद्र के आदेश से कोई व्यक्ति सहमत नहीं हो तो फिर मामला सुलह केंद्र/समिति के समक्ष रखा जाए एवं सुलझाया जाए। सुलह केंद्र/समिति के आदेश अनुसार क्षतिपूर्ति होने के बाद ही पशु के मालिक को अपील का अधिकार दिया जाना चाहिए।
9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए
कांजी हौस के प्रबंधन में स्थानीय ‘पशु मित्रों’ और NGO को आधिकारिक भागीदारी दी जानी चाहिए। पुलिस की भूमिका केवल सुरक्षा तक सीमित हो, जबकि पशुओं की देखभाल और उन्हें पकड़ने की प्रक्रिया पशु प्रेमियों की निगरानी में होनी चाहिए ताकि पशुओं को कोई चोट न पहुंचे और जनता का विश्वास बना रहे।
10) आधुनिकीकरण
कांजी हौस को ‘स्मार्ट शेल्टर्स’ बनाया जाना चाहिए। प्रत्येक केंद्र में आने वाले पशु की जानकारी, उसकी फोटो और स्वास्थ्य स्थिति को एक सेंट्रलाइज्ड पोर्टल पर अपलोड किया जाना चाहिए। सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से इन केंद्रों की निगरानी होनी चाहिए ताकि भ्रष्टाचार और पशुओं की चोरी या उपेक्षा को रोका जा सके।
11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर
कांजी हौस के इस नए स्वरूप से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में व्यापक रोजगार पैदा होगा। पशु चिकित्सक, पैरा-वेटनरी स्टाफ, सफाई कर्मी, चारा आपूर्तिकर्ता और डिजिटल रिकॉर्ड रखने के लिए ऑपरेटरों की आवश्यकता होगी। यह स्थानीय स्तर पर ‘पशु अर्थव्यवस्था’ (Animal Economy) को मजबूती प्रदान करेगा। हर देहात मे एक कांजी हौस आवश्यक हैं। जैसे शहर की जनसंख्या रहेगी उस अनुपात मे कांजी हौस शहरों मे भी बनने चाहिए।
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