1.2 धारा 2
मूल प्रावधान
2. 1[अधिनियमों का निरसन निरसित अधिनियमों के प्रति निर्देश।] – निरसन अधिनियम, 1938 (1938 का 1) द्वारा निरसित ।
मूल प्रावधान की पादटिका
1. 1914 के अधिनियम सं० 10 की धारा 3 तथा अनुसूची 2 द्वारा उपधारा (3) निरसित।
इस प्रावधान को निरसन अधिनियम, 1938 (The Repealing Act, 1938) द्वारा पूरी तरह से रद्द कर दिया गया है। ‘निरसन अधिनियम’ स्वयं ही एक ऐसा कानून होता है जिसका काम पुराने, बेकार, या अतिव्यापी (overlapping) कानूनों को निरस्त करना होता है, ताकि कानूनी संहिता (statutory books) को साफ और सुव्यवस्थित रखा जा सके। यह कानून भी पुराना, बेकार और अतिव्यापी हैं, इसीलिए इस पूरे कानून को ही निरस्त करना आवश्यक हैं।
कृपया इस ब्रिटिश कालीन कानून को निरस्त करने हेतु नीचे दिए लाल बटन को प्रेस करिए। अपना मेल एप एवं अकाउंट सिलेक्ट करिए, मेल अपने आप टाइप होकर आ जाएगा। आपको केवल सेन्ड करना हैं।
1.3 धारा 3
3.1 मूल प्रावधान
3. निर्वचन-खंड – इस अधिनियम में,-
“पुलिस अधिकारी” के अन्तर्गत ग्राम चौकीदार भी है तथा “पशु” के अन्तर्गत हाथी, ऊंट, भैंसे, घोड़ी, खस्सी, टट्टू, बछड़ी, खच्चर, गधे, सुअर, मेंढे, भेड़, मेष, मेमने, बकरियां और बकरियों के बच्चे भी हैं, 1[और]
2[“स्थानीय प्राधिकारी” से ऐसे व्यक्तियों का निकाय अभिप्रेत है जो किसी विनिर्दिष्ट स्थानीय क्षेत्र के भीतर किन्हीं मामलों के नियंत्रण और प्रशासन से विधि द्वारा तत्समय विनिहित है, और
“स्थानीय निधि” से किसी स्थानीय प्राधिकारी के नियंत्रण या प्रबंध के अधीन कोई निधि अभिप्रेत है।]
मूल प्रावधान की पादटिका
1. 1891 के अधिनियम सं० 1 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित ।
2. साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 3(28) से परिभाषा की तुलना कीजिए जो 14 जनवरी, 1887 के पश्चात् पारित सभी अधिनियमों को लागू होती है।
3.2 विश्लेषणात्मक आलोचना
यह परिभाषा खंड है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पूरे अधिनियम में उपयोग किए गए कुछ महत्वपूर्ण शब्दों का अर्थ सभी के लिए एक समान रहे। इस खंड में तीन प्रमुख शब्दों को परिभाषित किया गया है:
1. पुलिस अधिकारी (पोलिस Officer):
इस अधिनियम के संदर्भ में, ‘पुलिस अधिकारी’ शब्द में न केवल नियमित पुलिस बल के सदस्य शामिल थे, बल्कि ग्राम चौकीदार (गाँव के पहरेदार या गार्ड) को भी शामिल किया गया था। ग्राम चौकीदार को ‘पुलिस अधिकारी’ की परिभाषा में शामिल करना बताता हैं की ब्रिटिश वो हैं स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके कानून और व्यवस्था बनाए रखना चाहते थे। ग्राम चौकीदार अक्सर स्थानीय जमींदारों या प्रभावशाली व्यक्तियों के अधीन काम करते थे। उन्हें पुलिस की कानूनी शक्ति देने से, वे आसानी से गरीब किसानों, पशुपालकों या हाशिये के समुदायों के विरुद्ध इसका दुरुपयोग कर सकते थे। अतिचार एक ऐसा मामूली मामला था जहाँ चौकीदार आसानी से मवेशी ज़ब्त करके और जुर्माने की मांग करके ग्रामीण आबादी पर दबाव बना सकते थे, जो कि गरीब भारतीयों पर एक प्रकार का निम्न-स्तरीय दमन था। एक तरफ गोरों ने गरीबों को नियंत्रित करने के लिए ग्राम चौकीदार को शक्ति दे दी थी और दूसरी तरफ इस ग्राम चौकीदार के माध्यम से गाव के जमींदारों या अन्य धनी व्यक्तियों के विरुद्ध गरीब जनता के मन मे संभ्रम निर्माण कर विभाजन की नीति को भी साध लिया था।
2. पशु (Cattle):
‘पशु’ शब्द का अर्थ बहुत व्यापक है, और यह केवल गायों तक ही सीमित नहीं था। इसमें लगभग सभी बड़े और छोटे पालतू जानवर शामिल थे, जैसे: हाथी, ऊंट, गाय, भैंस, घोड़ी, खस्सी (बैल), टट्टू, बछड़ी, खच्चर, गधे, सुअर, मेंढे (भेड़), भेड़, मेष, मेमने, बकरियां और बकरियों के बच्चे। ‘पशु’ की इतनी विस्तृत परिभाषा, हाथी से लेकर बकरी के बच्चे तक, यह सुनिश्चित करती थी कि कोई भी जानवर अगर किसी ब्रिटिश-सुरक्षित खेत या राजस्व-उत्पादक भूमि को नुकसान पहुँचाता है, तो उसके मालिक को भारी जुर्माना भरना पड़ेगा। चूँकि भारत में बड़ी संख्या में लोग अपनी आजीविका के लिए पशुपालन पर निर्भर थे, और उनके पास ब्रिटिश भूमि नीतियों के कारण चारागाहों की कमी होती जा रही थी, मवेशियों के अतिचार करने पर लगाया गया जुर्माना गरीब परिवारों पर एक अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन जाता था। यह नियंत्रण की एक ऐसी व्यवस्था थी जहाँ पशुपालक को अपनी गलती के लिए भुगतान करना पड़ता था, और वह पैसा स्थानीय पर ब्रिटिश-नियंत्रित निधि में जाता था। इसके माध्यम से गरीब पशुपालकों को अक्सर अपने पशुओं से हाथ धोने पड़ते थे और रोजगारहिन पशुपालक को ब्रिटिश राजस्व की खेती मे मजबूरन मजदूरी करनी पड़ती थी। इस तरह से कठोर नियंत्रण की नीति वाले इस कानून को आज भी देश मे लागू रहने देना सर्वथा अनुचित हैं।
3. स्थानीय प्राधिकारी और स्थानीय निधि (Local Authority and Local Fund):
‘स्थानीय प्राधिकारी’ का अर्थ व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है जिसे किसी विशेष छोटे क्षेत्र के नियंत्रण और प्रशासन के लिए कानूनी रूप से अधिकार दिया गया था। ‘स्थानीय निधि’ का अर्थ वह धन है जो इस ‘स्थानीय प्राधिकारी’ के नियंत्रण या प्रबंधन के अधीन था। स्थानीय निधि अक्सर ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण मे ही रहता था।
3.3 संशोधन हेतु सुझाव
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 3 (निर्वचन-खंड) मे ‘पुलिस’ और ‘पशु’ की परिभाषा को इतना व्यापक रखा गया ताकि दमन का कोई भी रास्ता बंद न हो। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
1) कलोनीअल नीति का अंत
1871 के अधिनियम में ‘पुलिस अधिकारी’ के अंतर्गत ग्राम चौकीदार को शामिल करना ब्रिटिश शासन की उस नीति का हिस्सा था, जिसके तहत वे स्थानीय लोगों का उपयोग स्थानीय लोगों के ही दमन के लिए करते थे। यह चौकीदार अक्सर जमींदारों के हितों की रक्षा करते थे। नए अधिनियम में इस औपनिवेशिक मानसिकता को समाप्त कर ‘पशु रक्षक’ या ‘पशु कल्याण अधिकारी’ जैसे पदों को सृजित किया जाना चाहिए, जो पुलिसिया डंडे के बजाय वैज्ञानिक और मानवीय दृष्टिकोण से काम करें। इन पदों को उचित तरीके से परिभाषित करना चाहिए।
2) संविधान के साथ अनुरूपता
‘पशु’ की परिभाषा में केवल उनकी आर्थिक उपयोगिता देखना संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध है। नया अधिनियम अनुच्छेद 51A (g) के अनुरूप होना चाहिए, जहाँ पशु केवल ‘जब्त करने वाली वस्तु’ नहीं, बल्कि ‘संवेदनशील प्राणी’ माने जाएं। परिभाषा खंड में ‘पशु’ के साथ-साथ ‘पशु कल्याण’ और ‘पशु अधिकार’ जैसे शब्दों को भी संवैधानिक मर्यादा के भीतर परिभाषित किया जाना चाहिए।
3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता
पुराने कानून की पशु सूची ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आधारित थी। नए अधिनियम में परिभाषा को विस्तारित करते हुए इसमें शहरी क्षेत्रों के पालतू जानवरों (जैसे कुत्ते, बिल्लियाँ, पक्षी) और आवारा पशुओं (Stray Animals) को भी स्पष्ट रूप से शामिल किया जाना चाहिए। इससे शहरी आवासीय क्षेत्रों में होने वाले हमलों और विवादों को कानूनी सुरक्षा मिल सकेगी।
4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार
‘स्थानीय प्राधिकारी’ की परिभाषा को केवल सरकारी अधिकारियों तक सीमित न रखकर इसमें निर्वाचित निकायों जैसे ग्राम सभा, वार्ड समिति और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) को कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए। इन्हें अपने क्षेत्र के भीतर पशु संबंधी विवादों को प्रारंभिक स्तर पर निपटाने का वैधानिक अधिकार प्राप्त होना चाहिए। वैसे स्थानिक प्रशासनिक संस्थाओं को ये अधिकार अनेक प्रावधानों मे दिया गया हैं, परंतु इस अधिनियम के पुराने ढ़ाचे के कारण भ्रम निर्माण हो जाता हैं और कार्यवाही मे देरी होती हैं।
5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन
परिभाषा खंड में ही ‘सुलह समिति’ (Conciliation Committee) को परिभाषित किया जाना चाहिए। यह समिति 1996 के अधिनियम के प्रावधानों के तहत कार्य करेगी। इसमें स्थानीय नागरिक, पशु मित्र और कानून के जानकार शामिल होंगे, ताकि पशु अतिचार से उपजे सामाजिक तनाव को अदालती कार्यवाही से पहले ही आपसी सहमति से समाप्त किया जा सके। अगर फिर भी किसी व्यक्ति को इस समिति के निर्णय पर आपत्ति हो तो फिर अपील के प्रावधान से जुड़ी परिभाषाएं भी नए कानून मे शामिल की जानी चाहिए।
6) जब्त पशुओ का कल्याण
पुराने कानून में जब्त पशु को केवल ‘कैदी’ माना जाता था। नए सुझाव के अनुसार, ‘जब्त’ शब्द की परिभाषा में ही ‘अनिवार्य देखभाल’ और ‘सुरक्षा’ जैसे शब्द जोड़े जाने चाहिए। कानून यह स्पष्ट करे कि जब्ती की अवधि के दौरान पशु के भोजन, पानी और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी प्रशासन की होगी और इसमें किसी भी प्रकार की कोताही दंडनीय होगी।
7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी
अधिनियम में ‘आवारा पशु’ (Stray Animal) की एक अलग और स्पष्ट परिभाषा होनी चाहिए। साथ ही, ‘निवारक पशु स्वास्थ्य कार्यक्रम’ को परिभाषित किया जाना चाहिए जिसके तहत स्थानीय प्राधिकारी आवारा पशुओं का टीकाकरण और नसबंदी कराने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होंगे। यह केवल प्रबंधन नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा है।
8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति
कानून में ‘पशु हमले’ (Animal Attack) और ‘लापरवाह स्वामित्व’ (Negligent Ownership) को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए। इसमें न केवल फसलों का नुकसान, बल्कि शहरी क्षेत्रों में मनुष्यों को होने वाली शारीरिक चोट और मानसिक आघात के लिए भी क्षतिपूर्ति का प्रावधान होना चाहिए, जिसकी जिम्मेदारी पशु मालिक की होगी।
9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए
नया अधिनियम ‘पशु मित्र’ (Animal Friend/Volunteer) को एक कानूनी पहचान दे। पुलिस को केवल कानून-व्यवस्था संभालने तक सीमित रखा जाए, जबकि पशुओं को पकड़ने या स्थानांतरित करने का तकनीकी कार्य प्रशिक्षित पशु मित्रों और पशु चिकित्सकों की देखरेख में होना चाहिए, ताकि पशु और जनता दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।
10) आधुनिकीकरण
परिभाषा खंड में ‘डिजिटल पहचान’ (Digital ID) और ‘पंजीकरण’ को शामिल किया जाए। इसमें ‘पशु’ की परिभाषा के साथ उसकी ‘विशिष्ट पहचान संख्या’ (Tagging/Microchip) का अनिवार्य उल्लेख हो। इससे अतिचार के समय मालिक का पता लगाना आसान होगा और न्याय प्रक्रिया में तेजी आएगी।
11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर
अधिनियम के तहत ‘पशु प्रबंधन सहायक’ (Animal Management Assistant) और ‘पशु कल्याण निरीक्षक’ जैसे नए व्यावसायिक पदों को परिभाषित किया जाना चाहिए। इन पदों पर स्थानीय युवाओं की नियुक्ति से एक नया सेवा क्षेत्र विकसित होगा, जो न केवल कानून लागू करने में मदद करेगा बल्कि ग्रामीण और शहरी युवाओं को रोजगार भी प्रदान करेगा। कई पशु प्रेमियों को अगर ऐसा कार्य एवं सम्मान दिया जाए तो वे इसे एक करियर की तरह देख सकेंगे।
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