पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 7

7.1 मूल प्रावधान

कांजी हौस रखवालों के कर्तव्य

7. रजिस्टर रखना और विवरणियां देना – प्रत्येक कांजी हौस रखवाला ऐसे रजिस्टर रखेगा और ऐसी विवरणियां देगा जैसी राज्य सरकार समय-समय पर निर्दिष्ट करे।

कृपया इस ब्रिटिश कालीन कानून को निरस्त करने हेतु नीचे दिए लाल बटन को प्रेस करिए। अपना मेल एप एवं अकाउंट सिलेक्ट करिए, मेल अपने आप टाइप होकर आ जाएगा। आपको केवल सेन्ड करना हैं।

7.2 विश्लेषणात्मक आलोचना

धारा 7 सीधे तौर पर कांजी हौस रखवाले के दैनिक प्रशासनिक कर्तव्यों से संबंधित है। यह धारा रखवाले पर दो मुख्य कर्तव्य डालती है:

रजिस्टर रखना:

प्रत्येक कांजी हौस रखवाला को कुछ रजिस्टर (दस्तावेज या रिकॉर्ड) बनाए रखने होंगे। ये रजिस्टर अतिचार के मामलों, जब्त किए गए पशुओं, पशुओं को छुड़ाए जाने की तारीख, लगाए गए जुर्माने, और पशुओं को खिलाने पर हुए खर्च जैसी सभी महत्वपूर्ण जानकारियों को दर्ज करने के लिए ज़रूरी थे। भले ही रजिस्टर रखने का प्रावधान दिया गया हैं, पर इसका कितना उपयोग कर कितने रिकार्ड स्वतंत्र भारत मे रखे गए इसका कोई डेटा नहीं मिलेगा, क्यू की भलेही इस कानून का निरसन नहीं किया हो, पर इस कानून के अनुसार कार्यवाही भी नहीं की जाती।

विवरणियां देना:

रखवाले को समय-समय पर विवरणियां (Returns) भी देनी होंगी। ये विवरणियां संकलित जानकारी के सारांश होते थे जो जिला मजिस्ट्रेट को भेजे जाते थे। प्रांतीय सरकार (राज्य सरकार) ही यह तय करती थी कि ये रजिस्टर कैसे दिखेंगे और विवरणियां कितनी बार और किस प्रारूप में भेजनी होंगी।

अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों मे भारतीय, कम पढे लिखे लोगों को ही ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता था। रिकार्ड और विवरणियाँ लिखना यह पारदर्शिता के लिए आवश्यक हैं। पर इस प्रावधान का उपयोग कर बोझिल नौकरशाही को और भी जटिल बना दिया गया था। जिला मजिस्ट्रेट रिकार्ड की एक भी गलती के लिए भारतीय सरकारी कर्मचारियों को भी अपमानित करता था जिनसे उनका मानसिक उत्पीड़न हो जाता था। दूसरी तरफ रिकार्ड और कागजात सही से लिखे जाने के लिए इस प्रावधान के कारण पशुपालकों से रिश्वत की मांग करने का बहाना देती थी। यदि पशुओं के मालिक रिकॉर्ड में किसी गलती की शिकायत करते थे, तो उन्हें जटिल नौकरशाही प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता था, जिससे वे उत्पीड़न के शिकार होते थे।

7.3 संशोधन हेतु सुझाव

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 7 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह स्पष्ट करती है कि कैसे कागजी कार्यवाही और जटिल रिकॉर्ड-कीपिंग को दमन और भ्रष्टाचार का हथियार बनाया गया था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:

1) कलोनीअल नीति का अंत

ब्रिटिश काल में रजिस्टरों का उद्देश्य केवल राजस्व की निगरानी और स्थानीय कर्मचारियों पर नियंत्रण था। नई नीति में ‘गोपनीय रजिस्टरों’ की व्यवस्था को समाप्त कर डेटा को ‘सार्वजनिक और पारदर्शी’ बनाया जाना चाहिए। अब रिकॉर्ड का उद्देश्य उत्पीड़न नहीं, बल्कि पशुओं की सुरक्षा और उनके मालिकों की त्वरित पहचान होना चाहिए। यहा तक इस रिकार्ड को कोई भी व्यक्ति सूचना के अधिकार के अंतर्गत प्राप्त कर सके ऐसी व्यवस्था की जाए।

2) संविधान के साथ अनुरूपता

रिकॉर्ड रखने की प्रक्रिया को सूचना के अधिकार (RTI) और अनुच्छेद 21 के तहत पारदर्शिता के सिद्धांतों के साथ जोड़ा जाना चाहिए। यदि किसी पशुपालक को रिकॉर्ड की जटिलता के कारण अपने पशु वापस पाने में देरी होती है, तो यह उसकी आजीविका के अधिकार का हनन है। नया कानून सरल और जवाबदेह रिकॉर्ड-कीपिंग सुनिश्चित करे।

3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता

ग्रामीण क्षेत्रों में रजिस्टरों में पशु के हुलिए के साथ-साथ टीकाकरण की जानकारी एवं मालिक के आधार दर्ज हो। शहरी क्षेत्रों में डिजिटल रिकॉर्ड में पशु की फोटो, उसके गले के पट्टे (Tag) का नंबर और मालिक का आधार लिंक होना चाहिए, जिससे आवासीय सोसायटियों में विवाद होने पर तुरंत साक्ष्य उपलब्ध हो सकें।

4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार

जिला मजिस्ट्रेट को विवरणियां भेजने के बजाय, रखवाले को साप्ताहिक रिपोर्ट स्थानीय ग्राम पंचायत या नगर निकाय की पशु कल्याण समिति को देनी चाहिए। स्थानीय निकायों द्वारा इन रिकॉर्ड्स का ऑडिट किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि किसी भी पशुपालक से अवैध वसूली नहीं की जा रही है। कल्याण समिति मे ऑडिटर की नियुक्ति के लिए उचित प्रावधान दिया जाना चाहिए।

5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन

रजिस्टर में एक विशेष खंड ‘सुलह प्रयास’ का होना चाहिए। इसमें यह दर्ज किया जाए कि रखवाले या स्थानीय समिति ने विवाद सुलझाने के लिए क्या कदम उठाए। 1996 के अधिनियम के तहत, ये रिकॉर्ड मध्यस्थता की कार्यवाही में प्राथमिक साक्ष्य के रूप में उपयोग किए जा सकेंगे। जबतक सुलह समिति की कार्यवाही नहीं होती तबतक अधिनियम के किसी भी प्रावधान के तहत अपील का कोई अधिकार नहीं रहना चाहिए। न्यायालय अथवा मैजिस्ट्रैट के समक्ष समिति के निर्णय के बाद ही मामला जा सके ऐसे प्रावधान होने चाहिए। 

6) जब्त पशुओ का कल्याण

रजिस्टरों में केवल जुर्माने का कॉलम नहीं, बल्कि ‘पशु स्वास्थ्य चार्ट’ होना चाहिए। इसमें पशु को प्रतिदिन दिए जाने वाले चारे की मात्रा, पानी की उपलब्धता और पशु चिकित्सक द्वारा की गई जांच का विवरण अनिवार्य रूप से दर्ज होना चाहिए, ताकि पशु के स्वास्थ्य की उपेक्षा न हो सके। इन सबको डिजिटल पोर्टल पर संगणक अथवा मोबाईल एप द्वारा अपलोड किया जाना चाहिए।

7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी

प्रत्येक कांजी हाउस के रिकॉर्ड में उस क्षेत्र के आवारा पशुओं के टीकाकरण और नसबंदी का एक अलग डेटाबेस होना चाहिए। इससे यह पता चल सकेगा कि किस क्षेत्र में पशुओं की संख्या नियंत्रित है और कहाँ अतिरिक्त ध्यान देने की आवश्यकता है।

8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति

आवासीय क्षेत्रों में होने वाले हमलों का विवरण एक ‘घटना रजिस्टर’ में दर्ज किया जाए। इसमें पीड़ित के बयान, चोट की गंभीरता और पशु के पिछले व्यवहार का रिकॉर्ड होना चाहिए, जिससे क्षतिपूर्ति की राशि तय करने में निष्पक्षता बनी रहे। पाले हुए पशु के हमले को अबतक कानूनी दृष्टि से परिभाषित नहीं किया गया हैं, इसीलिए इस अधिनियम मे इसे उचित तरीके से परिभाषित किया जाना चाहिए। हमला पशु ने किया हैं तो उसके मालिक पर सजा के तौर पर जुर्माना ही लगाया जाना चाहिए। अगर पाला हुआ पशु स्वास्थ्य जांच मे किसी बीमारी से ग्रसित होकर हिंसक बना हो तो उस हिसाब से चिकित्सा के आदेश मालिक को दिए जाने चाहिए एवं जबतक उस पशु की चिकित्सा पूरी नहीं होती तबतक उस पशु को निगरानी मे रखने के भी नियम होने चाहिए। पशु को पालना एक बहुत बड़ा उत्तरदायित्व हैं परंतु आजके युग मे यह केवल एक फैशन बन चुका हैं, और ऐसे पशुओं के मालिक उनके स्वास्थ्य के प्रति बिल्कुल भी सजग नहीं रहते।

9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए

रिकॉर्ड रखने की जिम्मेदारी केवल रखवाले की न हो; स्थानीय पशु मित्रों (Animal Volunteers) को इन रजिस्टरों को प्रमाणित करने का अधिकार मिलना चाहिए। पुलिस की पहुंच केवल विवाद की स्थिति में रिकॉर्ड देखने तक हो, जबकि पशु मित्र यह सुनिश्चित करें कि रिकॉर्ड में कोई हेराफेरी न हो।

10) आधुनिकीकरण

भौतिक रजिस्टरों के स्थान पर ‘क्लाउड-आधारित डिजिटल डेटाबेस’ का उपयोग किया जाना चाहिए। एक मोबाइल ऐप अथवा ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से जब्ती की प्रविष्टि होते ही पशु मालिक के पास एसएमएस जाना चाहिए। इससे ‘बैक-डेट’ में रिकॉर्ड बदलने या रिश्वत मांगने की गुंजाइश खत्म हो जाएगी।

11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर

डिजिटल रिकॉर्ड प्रबंधन और डेटा विश्लेषण के लिए स्थानीय शिक्षित युवाओं को ‘डेटा एंट्री ऑपरेटर’ या ‘पशु गणना सहायक’ के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। यह न केवल प्रशासन को आधुनिक बनाएगा बल्कि युवाओं को तकनीकी क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर भी देगा।


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