Author name: Rinku Tai

Administrative Lex, Animal Juriprudence, Civil Law, Criminal Lex

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 24

जो कोई भी व्यक्ति ज़ब्ती के बाद पशुओं को कांजी हौस से या उस व्यक्ति से जो पशुओं को कांजी हौस ले जा रहा है या ले जाने वाला है और जो अधिनियम के तहत कानूनी शक्ति का उपयोग कर रहा है उससे छुड़ाएगा उसे इस धारा के तहत दोषी माना जाता था। उपरोक्त अपराधों का दोषी पाए जाने पर, व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष सिद्धदोष होने पर, छह मास (छह महीने) तक के कारावास (जेल) से, या पाँच सौ रुपये तक के जुर्माने से, अथवा दोनों से दंडित किया जाता था। इस अधिनियम मे प्रतिकार केवल एक सौ रुपये तक ही मिलता था पर अपने ही पशुओं को छुड़ाने के प्रयत्न को एक दोष बताकर पाच सौ रुपयों तक का दंड लगाया गया हैं। इससे यही साबित होता हैं की अंग्रेज केवल अपनी तिजोरी भरना चाहते थे।

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पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 23

ब्रिटिश काल में वसूली की यह कठोरता केवल शासन की शक्ति दिखाने के लिए थी। नए अधिनियम में “बलपूर्वक प्रवर्तन” के बजाय “न्यायसंगत उत्तरदायित्व” की नीति अपनानी चाहिए। वसूली का मुख्य उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि पीड़ित पशुपालक की हुई हानि की तुरंत भरपाई करना होना चाहिए। यदि दोषी कोई सरकारी कर्मचारी है, तो वसूली उसके वेतन से सीधे की जानी चाहिए।

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पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 22

अवैध अभिग्रहण सिद्ध होने पर “पशु मित्रों” की रिपोर्ट को साक्ष्य माना जाना चाहिए। पुलिस का कार्य यह सुनिश्चित करना होगा कि मजिस्ट्रेट द्वारा आदेशित प्रतिकर की राशि दोषी व्यक्ति से तुरंत वसूल कर पीड़ित मालिक को दिलाई जाए। दोषी सरकारी कर्मचारी होने पर स्थानीय पशु कल्याण विभाग को उसकी रिपोर्ट स्थानीय निकाय एवं डिजिटल पोर्टल पर भेजनी चाहिए।

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पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 21

मजिस्ट्रेट, जो औपनिवेशिक तंत्र का अधिकारी था, अक्सर गरीब किसान या पशुपालक की शिकायत पर आसानी से विश्वास नहीं करता था। शिकायतकर्ता को अपनी बात को कानूनी रूप से साबित करने के लिए तुरंत गवाहों और सबूतों की आवश्यकता होती थी, जबकि विरोध पक्ष (अभिग्रहणकर्ता) अक्सर स्थानीय ज़मींदार या प्रभावशाली व्यक्ति होता था। इस प्रक्रिया ने गरीब भारतीय शिकायतकर्ता को शुरुआत से ही कमजोर और अविश्वसनीय स्थिति में डाल दिया।

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पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 20

ग्रामीण भारत में, जहाँ संचार और परिवहन सीमित थे, और जहाँ पशुपालक अक्सर दूर-दराज के क्षेत्रों में होते थे, उनके लिए ज़ब्ती के बारे में जानना, पैसा जुटाना, और फिर मजिस्ट्रेट के कार्यालय तक पहुँचकर कानूनी शिकायत दर्ज करना, विशेषकर दस दिन के भीतर, लगभग असंभव था। उस समय अक्सर लोगों को पैदल चलना पड़ता था और निरक्षरता के कारण कई मामलों के बारे मे कहा शिकायत करना यह भी पता नहीं होता था।

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पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 19

यदि मालिक को लगता था कि उसकी ज़ब्ती अवैध है, तो उसे अपनी आजीविका के साधन को बचाने के लिए कांजी हौस रखवाले के साथ बहस करने के बजाय महँगे और समय लेने वाले मजिस्ट्रेट या सिविल न्यायालय के पास जाना पड़ता था। इस नीति ने स्थानीय विवादों के निपटारे को केंद्रीकृत और औपनिवेशिक अदालती व्यवस्था तक सीमित कर दिया। यह गरीब और अनपढ़ भारतीयों को अदालतों के भय और खर्च के कारण न्याय की मांग छोड़ने के लिए मजबूर करता था, जिससे वे प्रशासनिक अन्याय के विरुद्ध लड़ने का साहस खो देते थे।

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Constitutional law

Preamble of UGC Equity Regulations 2026:

The University Grants Commission (UGC) released a new set of rules on January 13, 2026, aimed at ensuring fairness and inclusion within colleges and universities. These rules are officially called the University Grants Commission (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026. This notification acts as an update to older rules from 2012, bringing them in line with the goals of the National Education Policy 2020.

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Constitutional law

Objective of UGC Equity Regulations 2026:

While the objective mentions EWS, the practical application often ignores that general category students can also be economically vulnerable. The regulation often fails to recognize that a student’s general category status does not protect them from poverty. When the equity framework focuses heavily on caste-based identity, the specific struggles of the poor among the general category are often overlooked, leaving them without the same social or institutional support systems.

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