जमानत भाग 3: भारतीय हिन्दू ग्रंथों मे उल्लेख
2.8.1 मूल प्रावधान
(च) ‘आरोप’ के अंतर्गत. जब आरोप में एक से अधिक शीर्ष हों, आरोप का कोई भी शीर्ष है।
2.8.2 सरल विश्लेषण
सरल शब्दों में, ‘आरोप’ एक औपचारिक सूचना या विशिष्ट कथन है जो एक अभियुक्त (Accused) को यह बताता है कि उसने कौन-सा अपराध किया है। यह किसी भी आपराधिक मुकदमे की शुरुआत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। अक्सर, एक ही घटना में एक व्यक्ति एक साथ कई अपराध कर सकता है. उदाहरण के लिए, एक ही कृत्य से हमला और चोट पहुंचाना। ‘शीर्ष’ का अर्थ है विशिष्ट अपराध का खंड (Specific count of an offence)।
यदि आरोप-पत्र में एक से अधिक अपराधों का उल्लेख है (यानी कई ‘शीर्ष’ हैं), तो ‘आरोप’ शब्द का प्रयोग उन प्रत्येक विशिष्ट शीर्ष के लिए किया जा सकता है। संक्षेप में, ‘आरोप’ पूरी कानूनी दस्तावेज़ को भी संदर्भित करता है, और उस दस्तावेज़ के अंदर उल्लिखित प्रत्येक अलग-अलग अपराध (शीर्ष) को भी संदर्भित करता है।
भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure, 1973) की धारा 2(ख) मे दी गई परिभाषा हूबहू BNSS मे भी ली गई हैं। यह परिभाषा समावेशी (inclusive) है, न कि संपूर्ण (exhaustive)। चूंकि ‘आरोप’ शब्द का प्रयोग BNSS में विभिन्न संदर्भों में किया गया है, यह परिभाषा केवल यह सुनिश्चित करती है कि जहां कहीं भी ‘आरोप’ शब्द आता है, वह एक से अधिक अपराधों के आरोप पत्र में प्रत्येक व्यक्तिगत अपराध को भी शामिल करता है।
2.8.3 कोर्ट द्वारा ‘आरोप’ का विश्लेषण
सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने मुख्य रूप से ‘आरोप’ के कानूनी महत्व पर जोर दिया है, खासकर इसके आरोपण (Framing of Charge) और दोषसिद्धि (Conviction) के संबंध में। न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि आरोप का मुख्य उद्देश्य अभियुक्त को स्पष्ट और सटीक जानकारी देना है कि उसे किस विशिष्ट अपराध के लिए मुकदमे का सामना करना है। यह अभियुक्त को अपनी प्रतिरक्षा (Defence) तैयार करने में सक्षम बनाता है। एक दोषपूर्ण आरोप (Defective Charge) अभियुक्त के लिए पूर्वाग्रह (Prejudice) पैदा कर सकता है।[1]
2.8.4 ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति का प्रभाव
‘आरोप’ की अवधारणा, जिसमें आरोप का स्पष्ट रूप से लिखित होना, आरोपों का संयोजन (Joinder of Charges), और आरोप लगाने की प्रक्रिया शामिल है, सीधे तौर पर अंग्रेजी कॉमन लॉ (English Common Law) से ली गई है। औपनिवेशिक शासन के तहत, इस संहिता का प्राथमिक उद्देश्य कानून और व्यवस्था बनाए रखना और राज्य की शक्ति को मजबूत करना था, न कि नागरिक अधिकारों की रक्षा करना। हालाँकि, समय के साथ, इन प्रावधानों को निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों के साथ जोड़ा गया है।
2.8.5 संवैधानिकता
‘आरोप’ लगाने के प्रावधान और सिद्धांत पूरी तरह से संवैधानिक हैं। वे भारतीय संविधान के निम्नलिखित मूल सिद्धांतों को सीधे लागू करते हैं:
- अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण: ‘आरोप’ का प्रावधान अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के मौलिक अधिकार का एक अनिवार्य हिस्सा है। किसी भी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उसे यह स्पष्ट रूप से न बताया जाए कि उस पर कौन सा आरोप है।
- अनुच्छेद 22(1): गिरफ्तारी और निरोध से सुरक्षा: यह अनुच्छेद कहता है कि गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों के बारे में जल्द से जल्द सूचित किया जाना चाहिए। ‘आरोप’ लगाने की प्रक्रिया उसी संवैधानिक अधिदेश को न्यायिक कार्यवाही के चरण में विस्तार देती है।

2.8.6 भारतीय धर्मग्रंथों में ‘आरोप’ की अवधारणा
‘आरोप’ (Charge) शब्द का प्रयोग, जैसा कि हम इसे आधुनिक कानूनी संदर्भ में समझते हैं यानी, एक लिखित, औपचारिक दोषारोपण, प्राचीन भारतीय धर्मग्रंथों में सीधे इस रूप में नहीं मिलता है। हालाँकि, उस समय की व्यवस्था में ‘दोषारोपण’, ‘अभियोग’, और ‘न्याय’ की अवधारणाएँ स्पष्ट रूप से मौजूद थीं। प्राचीन हिंदू न्याय प्रणाली, जैसे मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति में, एक औपचारिक अभियोग, प्रायः मौखिक, एक ‘वाद’ (Suit) या ‘अभियोग’ के रूप में जाना जाता था। अभियोग लगाने वाले को ‘वादी’ और जिस पर आरोप लगाया जाता था, उसे ‘प्रतिवादी’ या ‘अभियुक्त’ कहा जाता था। न्याय की प्रक्रिया में अभियोग को सिद्ध करने के लिए साक्ष्य जैसे गवाह, दस्तावेज इत्यादि, प्रस्तुत करने की आवश्यकता होती थी, जो आधुनिक ‘आरोप’ के सार के अनुरूप ही है।[2] भले ही प्राचीन भारत मे यह प्रक्रिया मौखिक होती थी, फिर भी इसके नियम बड़े ही स्पष्ट थे।
ब्रिटिश कंपनी राज के आरंभ मे कई बार व्यक्ति को कैद करने बाद भी जल्दी बताया भी नहीं जाता था की उसे कैद किस अपराध के लिए किया गया हैं। 1857 की स्वतंत्रता क्रांति के बाद कई कानूनों मे बदलाव करना ब्रिटिश राज के लिए आवश्यक हो गया था, क्यू की 1857 के क्रांति के कई अभियुक्त अभी भी कैद मे थे और भले ही क्रांति विफल रही पर उस मशाल ने हर नागरिक के मन मे स्वतंत्रता की ज्योति जला दी थी। इसके साथ ही विभाजनकारी नीतियों के चलते जगह जगह हिन्दू मुस्लिम दंगे भी हो रहे थे। इन दोनों स्थितियों को रोकने के लिए गोरों को अपने कानून मे बदलाव लाने जरूरी थे। इसीलिए CrPC का पहला अधिनियम 1862 मे देश मे लागू किया गया जिसमे कई मूल्य भारतीय न्यायविधि के अंग्रेजों को लाने पड़े थे और वो उन्होंने अपने फायदे के हिसाब से बदलकर लाए भी थे।
[1] V. C. Shukla vs State (Delhi Administration) [1980 AIR 1382, 1980 SCR (3) 500]
[2] Judiciary System in Ancient India, Indian Institute of Legal Studies, available at: https://www.iilsindia.com/blogs/judiciary-in-ancient-india/, Last visited on 10.12.2025
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