जमानत भाग 3: भारतीय हिन्दू ग्रंथों मे उल्लेख

जमानत: भाग 1

जमानत: भाग 2

2.7 जमानत इस परिकल्पना का इतिहास:

जमानत इस शब्द का इतिहास जब भी ढूँढने का प्रयास किया जाता हैं तब ब्रिटिश कलोनीअल पॉलिसी का बड़ा महिमामंडन आपको पढ़ने मिलेगा। बात यहा तक हैं की इसे मानवीय अधिकार का संरक्षक बता कर गोरों को बड़ा ही श्रेय दिया जाता हैं। वैसे पूरी दुनिया पर राज करने के लिए अत्याचारी नीतियाँ अपनाने वाले अंग्रेजों के कानून मे जमानत के नियम न के बराबर थे। व्यक्ति को कैद करने के बाद मामले की सुनवाई के प्रावधान भी ऐसे थे की मामला दीर्घ काल तक प्रलंबित रहे।

ऐसे मे अंग्रेजों की जेलों मे कई लोग कैद किए जाते थे और लंबे समय तक जेल मे ही बंद रहते थे। कैदी को भूखा मरने भी नहीं छोड़ सकते थे क्यू की अगर कोई कैदी भूखे मर जाता था तो जनता विद्रोह कर देती थी। इसके कारण नए कैदियों को जगह भी कम पड़ने लगी और कैदियों के भरण पोषण का खर्च भी बढ़ने लगा था और कर के नाम पर लूटी हुई संपत्ति को खर्च भी करना पड़ रहा था। इसीलिए उन्हे जमानत के कानून को फिर से लागू करना पड़ा।

अंग्रेजों की एक खासियत यह थी की, दुनिया भर मे जो भी मानवीय मूल्यों और मानवीय उन्नति से जुड़ी बात रहती थी उसे वे पहले किसी भी तरह से नष्ट कर देते थे। इतना ही नहीं उस परंपरा या नियम को दमनकारी बताकर बदनाम भी कर देते थे, जैसे उन्होंने भारतीय वर्णव्यवस्था को बदनाम किया था। जब लोग उनकी फैलाई बातों पर भरोसा करने लगते थे, तब वे उसी परंपरा या नियम को अपने हिसाब से बदलकर, फिर से उनके अधीन देशों मे लागू कर देते थे और ये जताते थे की “देखो गोरे कितने अच्छे हैं आपके देश के दमनकारी परंपरा को हटाकर आपको मुक्त कर रहे हैं।“ यह उनकी नीति आज भी हैं और इसे गोरों के वर्चस्व की नीति कहा जाता हैं।[1]

अब बढ़ते कैदियों की समस्या ने गोरों को परेशान कर दिया था, पर इसका उनके पास कोई उपाय नहीं था क्यू की उनकी नीतियाँ ही दमनकारी और अत्याचारी थी। पर इसका इतिहास कुछ न कुछ रहा होगा इसके लिए मैंने सोशल मीडिया के माध्यम से ये जानने का प्रयत्न किया की क्या “जमानत” ये परिकल्पना भारतीय ग्रंथों मे कही लिखी गई थी?[2] वैसे यह विषय इतिहास और संस्कृत के ज्ञाताओं के लिए शोध का विषय हैं, और मैं इन दोनों विषयों मे निपुण नहीं हु, इसके लिए मैंने संस्कृत, इतिहास एवं विधि के ज्ञाताओं को यह प्रश्न पूछा था।

मेरे पूछे प्रश्न पर मुझे उत्तर मिला मेरे एक सोशल मीडिया के मित्र अनाम दर्शी द्वारा। उस उत्तर के अनुसार जमानत इस शब्द से जुड़े surety को संस्कृत ग्रंथों मे “प्रतिभू” कहा जाता था। धर्मशास्त्रों, विशेषकर याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति और कात्यायन स्मृति, में यह नियम था कि यदि किसी व्यक्ति पर कोई आरोप लगा है या कोई दीवानी (civil) विवाद है, तो निर्णय आने तक उसे मुक्त रखा जा सकता है, बशर्ते कोई सम्मानित व्यक्ति उसकी गारंटी ले।[3]

याज्ञवल्क्य स्मृति के श्लोक क्र. 2.35 मे कुछ ऐसा लिखा हैं – “दर्शने प्रत्यये दाने प्रातिभाव्यं विधीयते “. इसका सरल अर्थ हैं की उपस्थिति (दर्शन), विश्वास (प्रत्यय) और भुगतान (दान) के लिए प्रतिभू (Surety) का विधान किया गया है। अगर विस्तार से समझे तो इस श्लोक मे तीन तरह की जमानत का उल्लेख हैं दर्शन प्रतिभू, प्रत्यय प्रतिभू एवं दान प्रतिभू।

दर्शन-प्रतिभू (Appearance Bail) में गारंटर यह उत्तरदायित्व लेता था कि आरोपी न्यायालय के समक्ष उपस्थित होगा। यदि आरोपी भाग जाता था, तो गारंटर को उसे ढूंढकर लाना पड़ता था या जुर्माना भरना पड़ता था। प्रत्यय-प्रतिभू (Confidence/Character Surety) में गारंटर आरोपी की विश्वसनीयता की शपथ लेता था कि “यह व्यक्ति भरोसेमंद है, यह धोखा नहीं देगा।” तथा दान-प्रतिभू (Money/Payment Surety) के अनुसार यदि निर्णय के बाद आरोपी हर्जाना या ऋण चुकाने में असमर्थ होता, तो यह राशि गारंटर को चुकानी पड़ती थी।[4] याज्ञवल्क्य स्मृति की इन परिभाषाओं के अनुसार गारंटी लेनेवाले व्यक्ति पर अनेक उत्तरदायित्व थे। कदाचित इसी कारण कोई भी व्यक्ति, जबतक उसे भरोसा न हो तबतक किसी भी आरोपित के लिए प्रतिभू नहीं बनते थे। यह पहला भाग कदाचित आपको दमनकारी लगे पर हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। प्रतिभू अथवा गारंटर नहीं मिलने के डर से लोग सामाजिक नियमों का पालन बड़ी सजगता से करते थे और इसी डर के कारण लोग अपराध, उस समय की भाषा के अनुसार “पाप” करने से बचते थे।

आचार्य चाणक्य (कौटिल्य) ने भी अर्थशास्त्र में कारावास (Lock-up) से बचने के लिए जमानत की व्यवस्था का उल्लेख किया है। कौटिल्य ने अपराध की गंभीरता के आधार पर आरोपी को छोड़ने की बात कही है, लेकिन इसके लिए उसे पर्याप्त सुरक्षा (Security) जमा करनी पड़ती थी। छोटे अपराधों में, या जहाँ आरोपी के भागने का डर नहीं होता था, उसे किसी ‘प्रतिभू’ (गारंटर) के आधार पर छोड़ दिया जाता था। वृद्ध, बीमार या नाबालिगों के लिए जमानत (Custody release) के नियम उदार थे। यहा तक अपराधों का वर्गीकरण भी भारतीय हिन्दू धर्मशास्त्र ग्रंथों मे लिखा हुआ था। ‘जमानत’ शब्द भले ही विदेशी हो, लेकिन आरोपी को सुनवाई के दौरान मुक्त रखने की प्रक्रिया भारतीय न्याय दर्शन का अभिन्न अंग थी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि न्याय प्रक्रिया भी चलती रहे और किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता भी अनावश्यक रूप से बाधित न हो।[5] पर हमेशा की तरह गोरों ने बिना श्रेय दिए जमानत के कानून को अपने हिसाब से बदल कर फिर से पूरी दुनिया को परिचित कराया और इस चुराए हुए प्रावधान के लिए भी स्वयं का महिमामंडन आज भी कर रहे हैं। ऐसे न जाने कितने ही विषय होंगे जिसका श्रेय गोरे ले रहे हैं क्यू की सनातनी भारतीय चुप हैं।


[1] Shitala: How India Enabled Vaccination, Mitra Desai, Subbu, ISBN: 978-06451034-0-3, 2021

[2] Post By Rinku Tai, Dt. 10.12.2025, available at:https://x.com/rinkutai222361/status/1998634534766784938, last visited on Dt. 10.12.2025

[3] Post By Anaam Darshi, Dt. 10.12.2025, available at: https://x.com/AnaamDarshi/status/1998644973051244868, last visited on Dt. 10.12.2025

[4] ibid Anam Darshi

[5] ibid Anam Darshi

भारतीय हिन्दू धर्मग्रंथों के नियम क्या आज के जमाने मे भी लागू करने योग्य थे? आपके क्या विचार हैं कमेन्ट करिए एवं चर्चा को शुरू करिए।

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