श्रव्य-दृश्य इलेक्ट्रॉनिक साधन
2.5 जमानतपत्र
2.5.1 सरल विश्लेषण
(घ) “जमानतपत्र” से प्रतिभूति के साथ छोड़े जाने के लिए कोई वचनबंध अभिप्रेत है;
2.5.2 सरल विश्लेषण
BNSS की धारा 2 के खंड (घ) में “जमानतपत्र” (Bail Bond) को परिभाषित किया गया है। जमानतपत्र दो मुख्य तत्वों वाला एक कानूनी दस्तावेज है:
- वचनबंध (Undertaking/Bond): यह अभियुक्त या गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा दिया गया एक लिखित वादा या कानूनी दायित्व है। इस वादे में आम तौर पर यह सुनिश्चित करना शामिल होता है कि व्यक्ति पुलिस या अदालत द्वारा निर्दिष्ट स्थान और समय पर उपस्थित होगा।
- प्रतिभूति (Security/Surety): यह वह गारंटी है जो वचनबंध को सुनिश्चित करने के लिए दी जाती है। प्रतिभूति वित्तीय हो सकती है, जैसे एक निश्चित राशि का नकद जमा या संपत्ति, या व्यक्तिगत, जैसे एक या अधिक जमानती – Surety – जो अभियुक्त की उपस्थिति की जिम्मेदारी लेते हैं।
CrPC का दृष्टिकोण: CrPC में जमानती (Bailable) और गैर-जमानती (Non-bailable) अपराधों को परिभाषित किया गया था, और जमानत देने और जमानत बांड निष्पादित करने की प्रक्रियाओं (जैसे धारा 436, 437, 440, 441, आदि) का उल्लेख किया गया था, लेकिन “जमानतपत्र” शब्द को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया था। BNSS मे पहली बार आपराधिक प्रक्रिया कानून में इन आवश्यक शर्तों को परिभाषित करके कानूनी स्पष्टता (Legal Clarity) प्रदान की है।
2.5.3 कोर्ट का विश्लेषण
भारतीय न्याय व्यवस्था ने मुख्य रूप से जमानत (Bail) देने के सिद्धांतों और प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित किया है, न कि केवल “जमानतपत्र” की परिभाषा पर। न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निर्णय जमानत बांड की अंतर्निहित भावना को दर्शाते हैं। जमानतपत्र की शर्तों के बारे मे न्यायालय ने निर्धारित किया है कि जमानत की शर्तें न तो दंडात्मक (Punitive) होनी चाहिए और न ही इतनी कठोर कि अभियुक्त के लिए उन्हें पूरा करना असंभव हो जाए।[1] जमानतपत्र को स्वीकार करना या अस्वीकार करना अदालत के विवेक (Discretion) पर निर्भर करता है।

2.6 बंधपत्र
2.6.1 मूल परिभाषा
(ङ) “बंधपत्र” से प्रतिभूति के बिना छोड़े जाने के लिए कोई वैयक्तिक बंधपत्र या वचनबंध अभिप्रेत है;
2.6.2 सरल विश्लेषण
बंधपत्र (Bond) यह कानूनी रूप से बाध्यकारी एक वैयक्तिक वचनबंध (Personal Undertaking) है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को प्रतिभूति (Surety) के बिना यानी किसी अन्य व्यक्ति की गारंटी या धन/संपत्ति को गिरवी रखे बिना, रिहा किया जाना है। यह उस व्यक्ति का एक लिखित वादा है जिसे रिहा किया जा रहा है। व्यक्ति यह वादा करता है कि वह भविष्य में न्यायालय या पुलिस द्वारा अपेक्षित होने पर उपस्थित होगा।
इस परिभाषा में, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ‘बंधपत्र’ को प्रतिभूति (Surety) से अलग रखा गया है। इसका मतलब है कि यह परिभाषा मुख्य रूप से व्यक्तिगत मुचलके (Personal Bond/Personal Recognizance) पर ज़ोर देती है। यह परिभाषा जमानत (Bail) के उदार सिद्धांत को और अधिक बल देती है, जिसमें गरीब या निम्न-आय वर्ग के अभियुक्तों के लिए केवल व्यक्तिगत मुचलके पर रिहाई को वैधानिक मान्यता मिलती है।
2.6.3 CRPC 1973 में ‘बंधपत्र’ की परिभाषा
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CRPC) में ‘बंधपत्र’ शब्द की कोई अलग से परिभाषा धारा नहीं थी। CRPC में, ‘बंधपत्र’ और ‘प्रतिभूति’ (Surety) शब्दों का प्रयोग जमानत, शांति बनाए रखने, अच्छे व्यवहार, आदि से संबंधित धाराओं में उनके सामान्य अर्थों और संदर्भों के आधार पर किया जाता था। परिभाषा के अभाव मे जमानत की शर्तें तय करने में न्यायालयों को अधिक विवेक (Discretion) का उपयोग करना पड़ता था, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत मुचलके को बढ़ावा दिया था। BNSS मे पहली बार इसे स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया हैं।
2.6.4 न्यायालयों द्वारा ‘बंधपत्र’ (Bond) शब्द की व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स ने ‘बंधपत्र’ और ‘प्रतिभूति’ (Surety) से संबंधित प्रावधानों की व्याख्या करते हुए बंधपत्रों के महत्व और शर्तों को स्पष्ट किया है। चूँकि BNSS 2023 की परिभाषा नई है, CRPC के तहत दिए गए ये न्यायिक विश्लेषण ‘बंधपत्र’ और ‘प्रतिभूति’ के बीच के मूल अंतर और संवैधानिक सिद्धांतों को स्पष्ट करते हैं, जो BNSS में भी लागू होंगे।
हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य की केस मे सुप्रीम कोर्ट ने गरीब अभियुक्तों के संदर्भ में नि:शुल्क कानूनी सहायता और जमानत के उदार सिद्धांतों पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति जमानत की राशि या प्रतिभूति देने में असमर्थ है, तो उसे केवल इस आधार पर जेल में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने इस मामले मे व्यक्तिगत मुचलके (Personal Bond) के उपयोग को प्रोत्साहित किया।[2] एम.पी. राज्य बनाम कैलाशचंद्र के मामले मे सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत देने का उद्देश्य अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करना है, न कि उसे दंडित करना या प्रतिभूति के रूप में बड़ी राशि वसूलना।[3]
मोतीराम बनाम मध्य प्रदेश राज्य की केस मे न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर ने सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से जमानत के प्रावधानों की व्याख्या की। कोर्ट ने कहा कि जमानत की शर्तें ऐसी नहीं होनी चाहिए जो गरीब अभियुक्तों के लिए भेदभावपूर्ण हों। व्यक्तिगत मुचलका ही पर्याप्त होना चाहिए जब तक कि विशेष कारण न हो।[4]
[1] Babu Singh And Ors vs The State Of U.P, [AIR 1978 SUPREME COURT 527]
[2] Hussainara Khatoon vs. State of Bihar [AIR 1979 SUPREME COURT 1369]
[3] M.P. State vs. Kailashchandra [NEUTRAL CITATION NO. 2024:MPHC-IND:26424]
[4] Moti Ram & Ors vs State Of M.P. [1978 CRI APP R (SC) 315, 1978 4 SCC 47, 1978 KER LT 747]
BNSS इस नए कानून मे जमानत से जुड़े जमानतपत्र एवं बंधपत्र की परिभाषाओं से क्या कोर्ट की कार्यवाही का समय बचेगा? आपके विचार कमेन्ट करें एवं चर्चा को आरंभ करिए।
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