भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023: धारा 1
श्रव्य-दृश्य इलेक्ट्रॉनिक साधन
2.3 जमानत
2.3.1 मूल प्रावधान
(ख) “जमानत” से किसी अधिकारी या न्यायालय द्वारा अधिरोपित कतिपय शतौ पर किसी अपराध के कारित किए जाने के अभियुक्त या संदिग्ध व्यक्ति द्वारा किसी बंधपत्र या जमानतपत्र के निष्पादन पर विधि की अभिरक्षा से ऐसे व्यक्ति का छोड़ा जाना अभिप्रेत है।
2.3.2 विश्लेषण
BNSS की धारा 2(1)(ख) के तहत ‘जमानत’ को एक कानूनी प्रक्रिया के रूप में परिभाषित करती है, जिसके तहत किसी अपराध के अभियुक्त या संदिग्ध व्यक्ति को कानूनी हिरासत से रिहा किया जाता है। यह परिभाषा जमानत को कानूनी हिरासत से सशर्त रिहाई के रूप में स्थापित करती है, जो बॉन्ड निष्पादित करने पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा दी जाती है। इसके तीन अंग हैं जो इस प्रकार हैं –
1. रिहाई का आधार (Release Condition): जमानत का अर्थ है विधि की अभिरक्षा (Legal Custody) से रिहा किया जाना। यह रिहाई केवल तभी होती है जब व्यक्ति को अपराध का अभियुक्त या संदिग्ध माना गया हो।
2. शर्तें और प्राधिकारी (Conditions and Authority): रिहाई हमेशा कतिपय शर्तों (Certain Conditions) पर आधारित होती है। ये शर्तें न्यायालय या पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी द्वारा लगाई जाती हैं।
3. सुरक्षा का वचन (Security Pledge): अभियुक्त को रिहा होने के लिए बंधपत्र (Bond) या जमानतपत्र (Bail Bond) पर हस्ताक्षर करना पड़ता है। यह एक कानूनी वादा या सुरक्षा गारंटी होती है कि रिहा होने वाला व्यक्ति जरूरत पड़ने पर न्यायालय के समक्ष उपस्थित होगा और इसमे वो सभी शर्ते भी होती हैं जिसके तहत जमानत मंजूर की गई हैं।
2.3.3 CrPC की परिभाषा से तुलना: समानता और फर्क
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) में ‘जमानत’ (Bail) शब्द को धारा 2 के तहत परिभाषित ही नहीं किया गया था। CrPC की धारा 2(a) केवल ‘जमानती अपराध’ (Bailable Offence) और ‘गैर-जमानती अपराध’ (Non-bailable Offence) को परिभाषित करती थी। जमानत की अवधारणा CrPC के अध्याय XXXIII (धारा 436 से 439) के तहत निहित थी, जो न्यायिक अभ्यास और विवेक पर आधारित थी।
इतने दशकों बाद इस शब्द को पहली बार स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। BNSS की परिभाषा CrPC के तहत दशकों से विकसित हुए जमानत के मूल सिद्धांत को ही वैधानिक रूप देती है। दोनों संहिताओं में जमानत का अर्थ हिरासत से सशर्त रिहाई ही है। दोनों में ही रिहाई के लिए न्यायालय/अधिकारी द्वारा शर्तें लगाना और बंधपत्र (बॉन्ड) निष्पादित करना आवश्यक है।
2.3.4 कोर्ट द्वारा किया गया विश्लेषण
उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने वर्षों से अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से जमानत के अर्थ और सिद्धांतों को विस्तृत किया है। न्यायालय ने बार-बार कहा है कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद है’ (Bail is the Rule, Jail is the Exception)। यह सिद्धांत संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) में निहित है। इसका अर्थ है कि जब तक यह प्रदर्शित न हो जाए कि अभियुक्त को हिरासत में रखना अत्यंत आवश्यक है, उसे रिहा कर देना चाहिए।
गैर-जमानती अपराधों में जमानत देना न्यायालय का विवेकाधिकार होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने ‘स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम बालचंद’ जैसे मामलों में स्थापित किया है कि जमानत देते समय अपराध की प्रकृति, साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की संभावना, अभियुक्त के फरार होने की संभावना, और पीड़ित या गवाहों को धमकाने की संभावना जैसे कारकों पर विचार किया जाना चाहिए।[1]
सुप्रीम कोर्ट ने हाल के निर्णयों में स्पष्ट किया है कि केवल सह-अभियुक्त को जमानत मिल गई है, इस ‘समानता’ (Parity) के आधार पर ही किसी अन्य अभियुक्त को जमानत नहीं दी जा सकती।[2] अदालत को यह देखना होगा कि उस विशेष अभियुक्त की अपराध में क्या भूमिका और स्थिति थी, और न्यायिक आदेशों को कारण बताते हुए पारित किया जाना चाहिए।[3] अतः, BNSS की धारा 2(1)(ख) द्वारा परिभाषित जमानत का अर्थ केवल एक प्रक्रियागत रिहाई नहीं है, बल्कि यह न्यायिक विवेक, संवैधानिक अधिकारों और स्थापित सिद्धांतों के अधीन एक सशर्त स्वतंत्रता है।

2.4 जमानतीय एवं अजमानतीय अपराध
2.4.1 मूल प्रावधान
(ग) “जमानतीय अपराध” से ऐसा अपराध अभिप्रेत है जो प्रथम अनुसूची में जमानतीय के रूप में दिखाया गया है या तत्समय प्रवृत किसी अन्य विधि द्वारा जमानतीय बनाया गया है और “अजमानतीय अपराध” से कोई अन्य अपराध अभिप्रेत है;
2.4.2 सरल विश्लेषण:
BNSS की धारा 2(1)(ग) में ‘जमानतीय अपराध’ (Bailable Offence) और ‘अजमानतीय अपराध’ (Non-Bailable Offence) को परिभाषित किया गया है। CrPC की धारा 2(a) के तहत जो पतिभाषाएं दी गई थी वो जैसी की वैसी इस नए अधिनियम मे भी ली गई हैं।
जमानतीय अपराध (Bailable Offence):
इसका मतलब है कि ऐसे अपराध, जिनमें अभियुक्त को जमानत प्राप्त करना अधिकार होता है। इन अपराधों को संहिता की प्रथम अनुसूची (First Schedule) में स्पष्ट रूप से ‘जमानतीय’ के रूप में दर्शाया गया है। यदि कोई अपराध इस अनुसूची में नहीं है, तो वह किसी अन्य लागू कानून के तहत जमानतीय बनाया गया हो सकता है। उदाहरण: गाली-गलौज, साधारण मारपीट, लापरवाही से गाड़ी चलाना जिससे मामूली चोट लगे।
अजमानतीय अपराध (Non-Bailable Offence):
इसका मतलब है कि जमानतीय अपराधों को छोड़कर कोई भी अन्य अपराध अजमानतीय है। इन अपराधों में जमानत प्राप्त करना अभियुक्त का अधिकार नहीं होता, बल्कि यह न्यायालय के विवेक (Discretion) पर निर्भर करता है। उदाहरण: हत्या, बलात्कार, डकैती, गंभीर धोखाधड़ी।
2.4.4 न्यायालय द्वारा विश्लेषण:
सर्वोच्च न्यायालय ने सीधे तौर पर ‘जमानतीय अपराध’ शब्द का नहीं, बल्कि ‘जमानत देने की शक्ति’ का विस्तृत विश्लेषण किया है, जिससे इस वर्गीकरण का महत्व स्पष्ट होता है। यह वर्गीकरण न्यायालय के अधिकार क्षेत्र और अभियुक्त के अधिकार को निर्धारित करता है। न्यायालय ने कहा कि पुलिस अधिकारी को किसी भी व्यक्ति को केवल संदेह के आधार पर गिरफ्तार नहीं करना चाहिए, खासकर जमानतीय अपराधों के मामलों में, जहां गिरफ्तारी अनावश्यक हो सकती है।[4]
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अजमानतीय अपराधों में जमानत देने की शक्ति का उपयोग करते समय, न्यायालय को मामले की प्रकृति और विशिष्ट परिस्थितियों पर विचार करना चाहिए, न कि केवल यह सोचना चाहिए कि अपराध अजमानतीय है।[5]
न्यायालय ने दोहराया कि अजमानतीय अपराधों में भी, जमानत देने के सिद्धांत को संविधान के अनुच्छेद 21 (स्वतंत्रता का अधिकार) पर आधारित होना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि जमानत से इनकार करना केवल तभी उचित है जब हिरासत की अवधि आवश्यक हो और जमानत से समाज पर कोई हानिकारक प्रभाव पड़ रहा हो।[6] ‘जमानतीय’ और ‘अजमानतीय’ का वर्गीकरण केवल प्रारंभिक प्रक्रिया निर्धारित करता है; अजमानतीय अपराध में भी अनिश्चित काल तक हिरासत रखना न्यायसंगत नहीं है।
[1] State Of Rajasthan, Jaipur vs Balchand @ Baliay on 20 September, 1977 [1977 AIR 2447, 1978 SCR (1) 535]
[2] केवल समानता (Parity) के आधार पर जमानत प्रदान नहीं जा सकती, दृष्टि आईएएस, दि. 2.12.2025 available at https://www.drishtijudiciary.com/hin/current-affairs/bail-cannot-be-granted-solely-on-parity, last visited on 8.12.2025
[3] Brijmani Devi v. Pappu Kumar, [(2022) 4 SCC 497]
[4] Joginder Kumar vs State of UP [(1994) 1 MADLW(CRI) 370, (1994) 1 RECCRIR 641]
[5] Gurbaksh Singh Sibbia vs State of Punjab, [1980 MADLW (CRI) 135, 1980 CRI APP R (SC) 189]
[6] Sanjay Chandra vs CBI, [2011 (13) SCALE 107, (2012) 1 MH LJ (CRI) 516]
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