इंटरनेट पर अनुचित सामग्री की समस्या पर केवल चर्चा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस पर तकनीकी और कानूनी स्तर पर कठोर प्रहार करने की आवश्यकता है। अपराधियों और तकनीकी कंपनियों के मनमाने रवैये पर लगाम लगाने के लिए व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करना आवश्यक है।
१९.१ मानवीय मूल्यों की याद दिलाने के लिए कानून का डंडा
अनुचित सामग्री का प्रसार रोकना अब किसी एक व्यक्ति या परिवार का काम नहीं रह गया है, बल्कि यह एक सामूहिक लड़ाई है। इस लड़ाई में तकनीक और कानून दो सबसे प्रभावी शस्त्र हैं। अब तक हम इस समस्या को केवल नैतिक दृष्टिकोण से देख रहे थे, लेकिन अब तकनीकी प्रणाली में ही ऐसे बदलाव करना आवश्यक है जो अश्लीलता को जड़ से रोक सकें। टेक कंपनियों को उनके मुनाफे से बढ़कर मानवीय मूल्यों की याद दिलाने के लिए कानून का डंडा चलाना अनिवार्य हो गया है। डिजिटल दुनिया को सुरक्षित करने के लिए केवल नियमावली होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन नियमों का सख्ती से पालन करने वाली तकनीकी व्यवस्था खड़ी करनी होगी। प्रणाली के स्तर पर बदलाव करके हम इस समस्या के प्रभाव को बड़े पैमाने पर कम कर सकते हैं। ये उपाय केवल अपराधियों को रोकने के लिए नहीं हैं, बल्कि डिजिटल माध्यमों के उपयोग को अधिक जिम्मेदार बनाने के लिए हैं।
१९.२ प्रणाली के स्तर पर उठाए जाने वाले ठोस कदम
अनुचित सामग्री रोकने के लिए सबसे पहले इंटरनेट की बुनियादी प्रणाली में बदलाव करना आवश्यक है। इसमें ‘इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स’ (ISPs) और सर्च इंजनों को अधिक जिम्मेदार बनाना पहला चरण है। जब कोई उपयोगकर्ता अनुचित सामग्री खोजने का प्रयास करता है, तब सर्च इंजन को उसे स्वचालित रूप से चेतावनी देनी चाहिए या ऐसी वेबसाइटों के परिणाम दिखाना बंद कर देना चाहिए। प्रणाली के स्तर पर ‘ब्लॉकलिस्टिंग’ की प्रक्रिया अधिक तीव्र और स्वचालित होनी चाहिए।
साथ ही, ब्राउजर में ‘पेरेंटल कंट्रोल’ की सुविधा केवल वैकल्पिक न होकर डिफ़ॉल्ट रूप में होनी चाहिए। तकनीकी स्तर पर ऐसी फायरवॉल खड़ी की जानी चाहिए जो अनुचित डेटा पैकेटों को पहचानकर उन्हें ब्लॉक कर सकें। केवल वेबसाइटें बंद करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि जिन सर्वरों से यह सामग्री प्रसारित होती है, उन सर्वरों को तकनीकी रूप से अलग करना जरूरी है। जब तकनीकी प्रणाली स्वयं अश्लीलता को नकारने लगेगी, तभी इस व्यवसाय की आर्थिक कमर तोड़ी जा सकेगी। ये बदलाव वैश्विक स्तर पर तकनीकी सहयोग से करना संभव है।
वैश्विक स्तर पर यह जब होगा तब होगा। लेकिन हम इतना तो कर ही सकते हैं कि ऐसी सोशल मीडिया की जगह स्वदेशी प्लेटफॉर्म जैसे आटोप्ले, आपनाट्यूब, आरताई, नायबर्स, कुटुंब, इनबूक, कू आदि को उपयोग में लाना शुरू करें। इन सभी जगहों पर मेरे अकाउंट हैं। जल्द ही विदेशी सोशल मीडिया के बहिष्कार का आंदोलन इन स्वदेशी माध्यमों से शुरू किया जाएगा। तब वहां आएं और विदेशी सोशल मीडिया बहिष्कार आंदोलन का साथ दें। मेरे अकेले करने से कुछ नहीं होगा, लेकिन यदि हम सब मिलकर करेंगे तो बहुत सी चीजें बदलेंगी।
१९.३ आयु सत्यापन: प्लेटफॉर्म पर कठोर प्रवेश नियंत्रण लागू करना
वर्तमान में अनुचित वेबसाइटों पर प्रवेश करने के लिए केवल एक बटन पर क्लिक करना पड़ता है कि ‘मैं १८ वर्ष का हूँ’। यह अत्यंत कमजोर प्रवेश नियंत्रण है। इसके बजाय, ऐसे प्लेटफॉर्म पर कठोर ‘आयु सत्यापन’ (Age Verification) प्रणाली लागू करना अनिवार्य है। इसमें उपयोगकर्ता के आधिकारिक पहचान पत्र या बायोमेट्रिक जानकारी का उपयोग करके ही प्रवेश दिया जाना चाहिए। यह उपाय बार-बार बताया जा रहा है। लेकिन यह कोई स्थायी समाधान नहीं है। ऐसी अनुचित सामग्री को नष्ट करना ही एकमात्र उपाय है। आयु या पहचान सत्यापन के लिए यदि दस्तावेज देना शुरू किया गया, तो व्यक्तिगत जानकारी इन विदेशी कंपनियों को मिल जाएगी। और फर्जी पहचान पत्र बनाना इस देश में आसान है। तो यह उपाय बिल्कुल भी उपयोगी नहीं है। बल्कि इस उपाय से व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग होना शुरू हो जाएगा।
कंपनियां ‘फेस रिकग्निशन’ तकनीक का उपयोग करके उपयोगकर्ता की आयु का अनुमान लगा सकती हैं और उसके अनुसार कंटेंट दिखा सकती हैं। यूरोप के कुछ देशों ने इस दिशा में कदम उठाए हैं। जब तक प्रवेश नियंत्रण कड़ा नहीं होता, तब तक बच्चे इस खतरे के संपर्क में आते ही रहेंगे। यह सत्यापन गोपनीयता का उल्लंघन किए बिना कैसे किया जा सकता है, इस पर तकनीकी काम होना जरूरी है। यह भी अधूरा उपाय है और इसमें भी व्यक्तिगत जानकारी के दुरुपयोग के खतरे हैं। मेरा कहना एक ही है कि ऐसी अनुचित सामग्री इंटरनेट पर होनी ही क्यों चाहिए? इस सामग्री के इतने दुष्प्रभाव पहले बताए गए हैं जो बच्चे, किशोर, वयस्क और वृद्ध सभी के लिए घातक हैं।
१९.४ अपलोड-पूर्व फ़िल्टरिंग: सामग्री फैलने से पहले रोकने के लिए एआई का उपयोग
अनुचित सामग्री एक बार इंटरनेट पर आ गई तो वह जंगल की आग की तरह फैलती है। इसीलिए ‘अपलोड-पूर्व फ़िल्टरिंग’ (Pre-upload Filtering) एक अत्यंत प्रभावी उपाय साबित हो सकता है। इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग करके, कोई भी वीडियो या फोटो प्लेटफॉर्म पर अपलोड होने से पहले ही उसकी जांच की जाएगी। यदि उस सामग्री में अश्लीलता, बाल यौन शोषण या बिना सहमति के बनाए गए दृश्य मिलते हैं, तो वह सामग्री उसी क्षण ब्लॉक कर दी जाएगी। यह उत्तम उपाय है। यूट्यूब पर जैसे वीडियो अपलोड करने के बाद कॉपीराइट के लिए जांच होती है, वैसे ही अनुचित चित्रण के लिए भी हो सकती है। इसलिए इस उपाय पर काम करके इसे जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए ताकि ऐसी सामग्री के लिए जगह ही न रहे।
इस तकनीक के कारण अपराधियों को मंच मिलना ही बंद हो जाएगा। बड़ी टेक कंपनियों के पास ऐसी ‘हैश मैचिंग’ तकनीक पहले से उपलब्ध है, जिसका उपयोग करके वे पहले से प्रतिबंधित वीडियो को दोबारा अपलोड होने से रोक सकते हैं। इस प्रणाली को और अधिक उन्नत बनाकर, संदिग्ध सामग्री को मानवीय समीक्षा (Human Review) के लिए भेजना संभव है। यदि कंपनियों ने इस तकनीक को अनिवार्य रूप से लागू किया, तो ९० प्रतिशत अश्लील सामग्री लोगों तक पहुंचने से पहले ही नष्ट की जा सकती है।
१९.५ गुमनामी खत्म करना: सत्यापित सोशल मीडिया खातों पर चर्चा
इंटरनेट पर अनुचितता और उत्पीड़न का बड़ा हिस्सा ‘गुमनामी’ (Anonymity) की सुविधा के कारण चलता है। अपराधी फर्जी नाम से खाते खोलकर अनुचित सामग्री फैलाते हैं। यदि सोशल मीडिया खातों के लिए पहचान पत्र या अन्य आधिकारिक प्रमाणों के आधार पर ‘सत्यापन’ (Verification) अनिवार्य कर दिया जाए, तो अपराधियों में डर पैदा होगा। जब किसी व्यक्ति की डिजिटल पहचान उसकी वास्तविक पहचान से जुड़ जाएगी, तब वह व्यक्ति अनुचित कृत्य करने का साहस नहीं करेगा।[1] लेकिन इसमें भी फिर वही व्यक्तिगत जानकारी के दुरुपयोग का खतरा है।
इस पर प्राइवेसी के मुद्दे को लेकर बड़ी चर्चा चल रही है, परंतु सुरक्षा को देखते हुए यह एक आवश्यक चरण लगता है। कम से कम जो लोग कंटेंट क्रिएटर हैं या जिनके फॉलोअर्स ज्यादा हैं, उनके लिए यह सत्यापन प्रक्रिया अनिवार्य होनी चाहिए। गुमनामी का पर्दा हटते ही साइबर अपराधियों का पीछा करना पुलिस के लिए आसान हो जाएगा। जिम्मेदार इंटरनेट उपयोग के लिए व्यक्ति को उसके डिजिटल व्यवहार के लिए जवाबदेह ठहराना ही एकमात्र रास्ता है।
१९.६ कंपनियों के अधिकारियों को जवाबदेह ठहराना: कॉर्पोरेट पर्दा भेदना
अक्सर टेक कंपनियां अपराध की जिम्मेदारी केवल उपयोगकर्ता पर डालकर स्वयं मुक्त हो जाती हैं।[2] इसे रोकने के लिए कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों (Compliance Officers) को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराना आवश्यक है। यदि किसी प्लेटफॉर्म पर बार-बार कानून तोड़े जा रहे हैं, तो उस कंपनी के उच्च पदस्थ अधिकारियों पर आपराधिक मामले दर्ज करने का प्रावधान कानून में होना चाहिए। इसे ‘कॉर्पोरेट पर्दा भेदना’ (Piercing the Corporate Veil) कहा जाता है।
जब कंपनियों के अधिकारियों को यह समझ आएगा कि कंपनी की गलत नीतियों के कारण उन्हें जेल जाना पड़ सकता है, तभी वे कंपनियां सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन करेंगी। इसके साथ ही कंपनियों के इस ढुलमुल व्यवहार पर बहुत बड़ा आर्थिक दंड जब तक नहीं लगाया जाता, तब तक कंपनियां अपनी नीतियां नहीं बदलेंगी। कितना भी पैसा हो, वह कभी न कभी खत्म होता है और व्यवसाय करने वाली कंपनियों के लिए उनका पैसा और लाभ ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसलिए आर्थिक दंड और कंपनियों के अधिकारियों को अपराधी घोषित कर व्यक्तिगत जिम्मेदारी निश्चित करने से वे कंपनियां अनुचित सामग्री पर नियंत्रण पाने के लिए युद्ध स्तर पर काम करेंगी। यह कानूनी कदम टेक कंपनियों के मनमाने रवैये पर बड़ा लगाम कसेगा।
१९.७ डेटा स्थानीयकरण: प्लेटफॉर्म को भारत में डेटा संग्रहीत करने के लिए मजबूर करना
भारत में साइबर अपराधों की जांच में सबसे बड़ी बाधा डेटा का विदेश में होना है।[3] इसके लिए ‘डेटा स्थानीयकरण’ (Data Localization) एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी उपाय है। भारत में सेवा देने वाली प्रत्येक टेक कंपनी को भारतीयों का डेटा भारत की भौगोलिक सीमा में स्थित सर्वरों पर संग्रहीत करना अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे भारतीय जांच एजेंसियों को बिना किसी अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया में फंसे तुरंत जानकारी मिल सकेगी।
डेटा भारत में होगा तो पुलिस आईपी एड्रेस, चैट लॉग्स और अन्य सबूत कुछ ही घंटों में प्राप्त कर सकेगी, जिन्हें वर्तमान में प्राप्त करने में महीनों लग जाते हैं। इस उपाय से विदेश में बैठकर भारतीयों को ब्लैकमेल करने वाले या अश्लील रैकेट चलाने वाले अपराधियों को पकड़ना आसान होगा। डिजिटल संप्रभुता के लिए और नागरिकों की सुरक्षा के लिए डेटा स्थानीयकरण केवल एक तकनीकी विषय नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है। इस निर्णय से अश्लीलता के वैश्विक जाल से भारतीय समाज का संरक्षण करना संभव होगा।
इन उपायों को अमल में लाने पर हम इंटरनेट पर अश्लीलता के चंगुल से समाज को बाहर निकाल सकते हैं। इस विषय में अब भारत सरकार ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, २०२३ (DPDP Act 2023) लागू किया है। इस पूरे प्रकरण में यह महत्वपूर्ण निर्णय भारत सरकार ने लिया है। इसके साथ ही हमें अपने स्वदेशी ऐप्स का समर्थन करना चाहिए। एक बार फिर स्वदेशी आंदोलन इस देश के लिए आवश्यक है।
१९.८ कानून के प्रावधान:
ऐसी सामग्री पोस्ट करने वाले के विरुद्ध निम्नलिखित धाराओं के तहत पुलिस शिकायत होती है। ऐसी शिकायतें करने के लिए आप उचित कानूनी मार्गदर्शन ले सकते हैं –
भारतीय न्याय संहिता, २०२३ – धारा ४९, ७९, २९४, २९५, २९६।
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, २००० – धारा ६७, ६७ए, ६७बी।
महिलाओं का अश्लील प्रतिनिधित्व (निषेध) अधिनियम, १९८६।
यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम, २०१२ – धारा १२।
[1] Deepak Gupta, “A Guide to Understanding Digital Identity”, GuptaDeepak, Dt. 2.9.2025, available at: https://guptadeepak.com/customer-identity-hub/a-guide-to-understanding-digital-identity, last visited on 19.12.2025
[2] Lisa M Given, “Do big tech companies have a ‘duty of care’ for users? A new report says they do – but leaves out key details”, Conversation, Dt. 4.2.2025, available at: https://theconversation.com/do-big-tech-companies-have-a-duty-of-care-for-users-a-new-report-says-they-do-but-leaves-out-key-details-248995, last visited on 19.12.2025
[3] Dr. Ram Prakash Chaubey, “Cybercrime investigation in India: An analysis of digital evidence and its role in proving cybercrimes” International Journal of Law, Policy and Social Review, Volume 7, Issue 3, 2025, Page No. 25-31

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