इंटरनेट पर अनुचित सामग्री का प्रभाव केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके सामाजिक और पारिवारिक परिणाम अत्यंत दूरगामी हैं। परिवार समाज की आधारभूत संस्था है, जो प्रेम, विश्वास और आपसी समझ पर टिकी होती है। हालांकि, डिजिटल माध्यमों से रिसने वाला अनुचित साहित्य इसी नींव को हिला रहा है। आधुनिक तकनीक के कारण घर में घुसे इस अघोषित संकट की वजह से पति-पत्नी के रिश्ते, बच्चों का पालन-पोषण और पीढ़ियों के बीच संवाद, इन सभी मामलों में गंभीर समस्याएं पैदा हो गई हैं। अनुचित सामग्री के अत्यधिक उपयोग के कारण मानवीय भावनाओं का स्थान यांत्रिक संतुष्टि ने ले लिया है, जिससे सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है। आज के समय में परिवारों को बचाने के लिए इन डिजिटल खतरों के स्वरूप को समझना और उन पर समय रहते उपाय करना अनिवार्य हो गया है।
१२.१ डिजिटल अनुचितता का व्यसन परिवार व्यवस्था को कैसे नष्ट करता है
परिवार व्यवस्था एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारियों और भावनात्मक जुड़ाव पर आधारित होती है। जब परिवार का कोई सदस्य अनुचित सामग्री का आदी हो जाता है, तब उसका पूरा ध्यान घर के बजाय आभासी दुनिया की ओर मुड़ जाता है। यह व्यसन नशीले पदार्थों के व्यसन की तरह ही घातक होता है, क्योंकि इसमें व्यक्ति अपना सामाजिक बोध खो देता है। अनुचित सामग्री के उपयोग के कारण व्यक्ति एकांत में रहना पसंद करता है, जिससे परिवार के अन्य सदस्यों के साथ उसका संवाद पूरी तरह टूट जाता है।[1]
ऐसे व्यसन के कारण पारिवारिक कार्यक्रमों में रुचि न लेना, घर के कामों की अनदेखी करना और निरंतर चिड़चिड़ापन दिखाना जैसे व्यवहार सामने आते हैं। परिवार के अन्य सदस्यों को, विशेषकर जीवनसाथी और बच्चों को, इस बदलाव का कारण समझ नहीं आता, जिससे घर में तनाव का माहौल बन जाता है। आर्थिक मामलों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि अनुचित सामग्री के लिए पैसे खर्च करना या कार्यस्थल पर ध्यान न लगने के कारण नौकरी पर संकट आना जैसे मामले होते हैं। धीरे-धीरे, जिस घर में खुशी होनी चाहिए थी, वहां केवल अविश्वास और दूरी बचती है। इस प्रकार, एक समृद्ध परिवार व्यवस्था इस डिजिटल व्यसन के कारण पूरी तरह चरमरा जाती है।
१२.२ तलाक का कारण: रतिचित्रण वैवाहिक निकटता को कैसे नष्ट करता है
वैवाहिक रिश्ते में शारीरिक और मानसिक निकटता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अनुचित सामग्री इन दोनों स्तरों पर जहर घोलने का काम करती है। जब कोई जीवनसाथी अनुचित सामग्री के अवास्तविक और कृत्रिम चित्रण की तुलना अपने वास्तविक जीवनसाथी से करने लगता है, तब असंतोष पैदा होता है। पर्दे पर दिखने वाले शरीर और क्रियाएं प्राकृतिक नहीं होतीं, लेकिन देखने वाले को वास्तविक जीवन में भी वैसी ही अपेक्षाएं होने लगती हैं। इससे जीवनसाथी के प्रति आकर्षण कम हो जाता है और वैवाहिक जीवन की खुशी गायब हो जाती है।
अक्सर अनुचित सामग्री के कारण पैदा हुई यौन विकृति जीवनसाथी पर जबरदस्ती करने के लिए प्रेरित करती है, जिससे रिश्ते में कड़वाहट आती है। जीवनसाथी को जब इस व्यसन के बारे में पता चलता है, तब उन्हें अपने साथ धोखा होने की भावना महसूस होती है। विश्वास में आई यह दरार इतनी बड़ी होती है कि उसे भरना कठिन हो जाता है। आज के समय में कई तलाक के मामलों में अनुचित सामग्री का व्यसन एक छिपा हुआ लेकिन मुख्य कारण बनकर उभर रहा है।[2] शारीरिक निकटता समाप्त होते ही भावनात्मक रिश्ता भी कमजोर हो जाता है और अंततः सुखी संसार बिखर कर तलाक में बदल जाता है।
१२.३ विश्वास का अभाव: माइक्रो-चीटिंग और ऑनलाइन दुराचार का उदय
डिजिटल युग में धोखे का स्वरूप बदल गया है। प्रत्यक्ष मुलाकात के बिना भी केवल ऑनलाइन माध्यम से किया जाने वाला धोखा रिश्तों में जहर घोल रहा है। वयस्क साइटों पर चैटिंग करना, अजनबियों के साथ यौन संवाद करना या सोशल मीडिया पर लगातार इस तरह की सामग्री खोजना ‘माइक्रो-चीटिंग’ कहलाता है। भले ही इसमें प्रत्यक्ष शारीरिक संबंध न हों, लेकिन यह कृत्य जीवनसाथी के प्रति निष्ठा को तोड़ता है। इससे रिश्ते में पारदर्शिता समाप्त हो जाती है और संदेह का वातावरण पैदा होता है।
ऑनलाइन दुराचार के कारण व्यक्ति अपने जीवनसाथी को समय देने के बजाय डिजिटल पर्दे से ज्यादा जुड़ जाता है। जब जीवनसाथी को यह पता चलता है कि उनका पार्टनर चुपके से ऐसी चीजों में लगा हुआ है, तब उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है। एक बार खोया हुआ विश्वास वापस पाना लगभग असंभव होता है। इस अविश्वास के कारण लगातार झगड़े, एक-दूसरे के फोन चेक करना और मानसिक प्रताड़ना जैसे मामले शुरू होते हैं। ऑनलाइन माध्यमों ने धोखा देना आसान बना दिया है, लेकिन इसके परिणाम वास्तविक जीवन में अत्यंत दर्दनाक होते हैं, जिससे सुंदर रिश्तों का अंत हो जाता है।
१२.४ पीढ़ियों के बीच संघर्ष: माता-पिता और डिजिटल युग के बच्चों के बीच मतभेद
आज के माता-पिता एक पारंपरिक वातावरण में पले-बढ़े हैं, जबकि बच्चे पूरी तरह से डिजिटल दुनिया में पैदा हुए हैं। इन दोनों पीढ़ियों के बीच विचारों की खाई अनुचित सामग्री के कारण और अधिक चौड़ी हो रही है। जब माता-पिता को अपने बच्चों के फोन या कंप्यूटर पर अनुचित सामग्री मिलती है, तब उनकी प्रतिक्रिया अत्यंत तीव्र होती है। माता-पिता को इस बात का धक्का लगता है और वे बच्चों पर कड़े प्रतिबंध लगाने की कोशिश करते हैं। दूसरी ओर, बच्चे इसे अपनी निजी संपत्ति और स्वतंत्रता पर हमला मानते हैं।
इन वैचारिक मतभेदों के कारण संवाद पूरी तरह बंद हो जाता है। माता-पिता को लगता है कि उनके बच्चे बिगड़ गए हैं, जबकि बच्चों को लगता है कि माता-पिता को आधुनिक दुनिया की समझ नहीं है।[3] इस संघर्ष में बच्चे और अधिक विद्रोही हो जाते हैं और चोरी-छिपे ऐसी चीजें देखना जारी रखते हैं। माता-पिता के पास इस विषय पर बच्चों से खुलकर बात करने का कौशल न होने के कारण स्थिति और बिगड़ जाती है। अनुचित सामग्री के कारण पैदा हुई यह दूरी परिवार में प्रेम और सुरक्षा की भावना को नष्ट कर देती है, जिससे बच्चे माता-पिता से भावनात्मक रूप से दूर हो जाते हैं।
१२.५ रोमांस का लोप: रिश्ता जोड़ने के बजाय तत्काल संतुष्टि को प्राथमिकता
सच्चा रोमांस और प्रेम धैर्य, समय और एक-दूसरे को समझने पर निर्भर होता है। लेकिन, अनुचित सामग्री ने तत्काल संतुष्टि (इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन) की आदत डाल दी है। एक क्लिक पर मिलने वाली यौन संतुष्टि व्यक्ति को रिश्ता बनाने के लिए आवश्यक मेहनत से दूर ले जाती है। नई पीढ़ी को किसी के साथ रिश्ता जोड़ना, उसके लिए समय देना और भावनाओं का आदान-प्रदान करने के बजाय डिजिटल पर्दे पर मिलने वाली कृत्रिम संतुष्टि आसान लगने लगी है।
इससे समाज में सच्चे प्रेम और भावना का लोप हो रहा है। इंसान एक-दूसरे से जुड़ने के बजाय केवल अपनी खुशी के बारे में सोचने लगा है। रिश्ते में आने वाली दिक्कतों को दूर करने के बजाय, लोग अनुचित सामग्री का सहारा लेकर अपनी भावनाओं को दबाने की कोशिश करते हैं। इससे समाज में अकेलापन बढ़ रहा है। जब व्यक्ति को सच्चे रोमांस की जरूरत महसूस होती है, तब उसे यह समझ ही नहीं आता कि उसे कैसे प्राप्त किया जाए, क्योंकि उसकी आदत केवल अवास्तविक और कृत्रिम सामग्री तक सीमित हो चुकी होती है। परिणामस्वरूप, समाज में भावनात्मक शून्यता पैदा हो रही है।
१२.६ अंधकार में पेरेंटिंग: डिजिटल उपयोग पर नजर रखने का संघर्ष
आज के समय में पेरेंटिंग यानी माता-पिता का दायित्व निभाना किसी चुनौती से कम नहीं है। इंटरनेट के विशाल विस्तार के कारण बच्चे क्या देख रहे हैं, यह पता लगाना माता-पिता के लिए असंभव हो गया है। इसे ‘अंधकार में पेरेंटिंग’ कहा जा सकता है, क्योंकि माता-पिता को खतरे की आहट तो मिलती है लेकिन यह पता नहीं चलता कि खतरा असल में कहां है। बच्चे तकनीक में माता-पिता से ज्यादा होशियार होने के कारण सर्च हिस्ट्री डिलीट करना या प्राइवेट ब्राउजिंग का उपयोग करना जैसी तरकीबें अपनाते हैं।
माता-पिता लगातार इस डर के साये में रहते हैं कि कहीं उनके बच्चे गलत रास्ते पर तो नहीं जा रहे। इस डर के कारण वे बच्चों के फोन चेक करना या उन पर निगरानी रखना शुरू करते हैं, जिससे बच्चों के मन में माता-पिता के प्रति चिड़चिड़ापन पैदा होता है। डिजिटल साक्षरता की कमी वाले माता-पिता के लिए यह स्थिति और भी खराब होती है। तकनीक का उपयोग करके बच्चों को कैसे सुरक्षित रखा जाए, यह न समझ पाने के कारण कई माता-पिता बेबस महसूस करते हैं। यह संघर्ष माता-पिता के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालता है और घर का माहौल लगातार तनावपूर्ण बना रहता है। इसलिए सेवाभावी संस्थाओं को आगे आना चाहिए और मिलकर डिजिटल साक्षरता पर काम करना चाहिए, यह समय की मांग है।
[1] Siddharth Chauhan, “Parents’ smartphone addiction is destroying families, Vivo CMR study reveals”, Digit, 16.12.2024, available at: https://www.digit.in/features/mobile-phones/parents-smartphone-addiction-is-destroying-families-vivo-cmr-study-reveals.html, last visited on 12.12.2025
[2] Diederik F Janssen, “From Libidines nefandæ to sexual perversions”, History of Psychiatry 2020, Vol. 31(4) 421 –439
[3] Ine Beyens, Loes Keijsers and Sarah M. Coyne, “Social media, parenting, and well-being”, Current Opinion in Psychology 2022, 47

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