आज के सूचना प्रौद्योगिकी के युग में इंटरनेट ज्ञान का अथाह भंडार बन गया है, लेकिन इसके साथ ही यह अनुचित सामग्री के प्रसार का एक मुख्य माध्यम भी साबित हुआ है। स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट की उपलब्धता के कारण आज बच्चों के हाथों तक यह घातक सामग्री पहुंच गई है। यह समस्या केवल नैतिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास को लगी एक दीमक है। बच्चे देश का भविष्य होते हैं, लेकिन अनुचित सामग्री के चंगुल के कारण यह भविष्य अंधकारमय होता दिख रहा है। उम्र के हिसाब से न समझ आने वाली जानकारी और दृश्यों के संपर्क में आने के कारण बच्चों की विचार प्रक्रिया में विकृति पैदा हो रही है। यह सामग्री केवल एक क्लिक पर उपलब्ध होने के कारण अभिभावकों के लिए अपने बच्चों पर नजर रखना कठिन हो गया है। अनुचित सामग्री के कारण निर्मित होने वाली आभासी दुनिया का प्रभाव बच्चों के वास्तविक जीवन के रिश्तों, व्यवहार और उनकी शिक्षा पर गहराई से पड़ रहा है। इस विषय की गंभीरता को देखते हुए इसके विभिन्न असुरक्षित समूहों और उनकी समस्याओं पर गहराई से विचार करना समय की मांग बन गई है।
११.१ खोया हुआ बचपन: वयस्क सामग्री के जल्दी संपर्क में आने का प्रभाव
बचपन जीवन का सबसे निर्दोष और संवेदनशील समय होता है। इस काल में बच्चों के मन पर जो संस्कार पड़ते हैं, वे उनके जीवनभर के व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। हालांकि, अनुचित सामग्री के जल्दी संपर्क में आने के कारण इस निर्दोषता पर बड़ा आघात होता है। जब कोई छोटा बच्चा या किशोर अनजाने में या जिज्ञासावश ऐसी सामग्री की ओर मुड़ता है, तब उसके मस्तिष्क में समय से पहले ही कई रासायनिक बदलाव घटित होते हैं। जिन यौन क्रियाओं का अर्थ समझने की उनकी उम्र नहीं होती, उन क्रियाओं का विकृत प्रदर्शन देखकर बच्चों के मन में डर और भ्रम पैदा होता है।[1]
इस असामयिक संपर्क के कारण बच्चों के खेलने-कूदने की उम्र में उनके मन में वयस्क विषयों के विचार घर करने लगते हैं। प्राकृतिक विकास का क्रम बाधित होता है। ऐसे बच्चों में समाज और मानव शरीर को देखने का दृष्टिकोण उम्र से पहले ही बदल जाता है, जिससे उनका बचपन खो जाता है। वे बच्चे के रूप में सोचने के बजाय खुद को एक कृत्रिम और विकृत वयस्क दुनिया का हिस्सा समझने लगते हैं। इससे पैदा होने वाली मानसिक बेचैनी उनके स्वाभाविक विकास को रोकती है और बच्चे समय से पहले परिपक्व होने लगते हैं, जो उनके भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक होता है।
११.२ किशोरों में अनुचित सामग्री निर्माण का सामान्य होना
आज के सोशल मीडिया के युग में खुद का प्रदर्शन करने की होड़ किशोरों में बड़े पैमाने पर देखी जाती है। अनुचित सामग्री के प्रभाव के कारण कामुकता का प्रदर्शन करना एक फैशन या साहस का काम है, ऐसी गलत धारणा इन युवक-युवतियों में पैदा हो गई है।[2] इसे पीयर प्रेशर यानी साथियों का दबाव भी कहा जाता है। बच्चे अक्सर अपने साथी को प्रभावित करने के लिए या सिर्फ मजे के लिए अपनी निजी तस्वीरें या वीडियो तैयार करते हैं। उन्हें इस बात की गंभीरता नहीं होती कि डिजिटल दुनिया में एक बार भेजी गई जानकारी कभी भी पूरी तरह नष्ट नहीं की जा सकती।
ऐसी सामग्री तैयार करना एक सामान्य बात है, ऐसा उन्हें लगने के कारण उनके नैतिक मूल्यों का पतन होता है। यह प्रवृत्ति उन्हें भविष्य में अपराध की ओर या गंभीर संकट में ले जा सकती है। ऐसे कार्यों से न केवल उनकी छवि धूमिल होती है, बल्कि उनके मन में खुद के प्रति सम्मान भी कम हो जाता है। जब ये वीडियो या फोटो दूसरों तक पहुंचते हैं, तब उससे पैदा होने वाला सामाजिक दबाव बच्चों को आत्महत्या जैसे चरम कदम की ओर धकेलता है। इस प्रकार, अनुचित सामग्री का प्रभाव किशोरों को उनके जीवन के सबसे बड़े खतरों की ओर धकेल रहा है।
११.३ साइबरबुलिंग और बदनामी: लीक हुई निजी तस्वीरों के परिणाम
साइबरबुलिंग आज के समय का एक अत्यंत क्रूर प्रकार है। जब किसी किशोर की निजी जानकारी या तस्वीरें सार्वजनिक हो जाती हैं, तब उसका फायदा उठाकर उन्हें मानसिक प्रताड़ना दी जाती है। इंटरनेट पर एक बार कोई चीज वायरल हो गई तो वह लाखों लोगों तक पहुंच जाती है।[3] ऐसे समय में पीड़ित बच्चे के लिए समाज के सामने जाना कठिन हो जाता है। उन्हें स्कूल, कॉलेज और रिश्तेदारों से मिलने वाला व्यवहार अत्यंत अपमानजनक होता है। साइबर अपराधी इस स्थिति का फायदा उठाकर पैसों की मांग करते हैं या उन्हें और अधिक अनुचित कार्य करने के लिए मजबूर करते हैं।
इस बदनामी के कारण बच्चों के मन पर गहरे घाव होते हैं। उन्हें निरंतर ऐसा लगता है कि पूरी दुनिया उन्हीं की ओर देख रही है और उनका मजाक उड़ा रही है। इससे पैदा होने वाला अवसाद (डिप्रेशन) इतना तीव्र होता है कि बच्चे लोगों से बात करना बंद कर देते हैं और खुद को एक कमरे में बंद कर लेते हैं। कई बार माता-पिता को इस बात का अंदाजा नहीं होता और जब पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। साइबरबुलिंग केवल मानसिक प्रताड़ना नहीं है, बल्कि यह एक युवा जान के भविष्य को उजाड़ने वाला हथियार साबित हो रहा है।
११.४ ग्रूमिंग ग्राउंड्स: शिकारी पीड़ितों को खोजने के लिए प्लेटफॉर्म का उपयोग
ऑनलाइन दुनिया में बच्चों का शोषण करने के लिए घात लगाकर बैठे अपराधियों को प्रीडेटर्स या शिकारी कहा जाता है। अनुचित सामग्री में रुचि रखने वाले या इंटरनेट पर ज्यादा समय बिताने वाले बच्चों को ये शिकारी अपना लक्ष्य बनाते हैं। वे शुरुआत में बच्चों से मीठी बातें करके, उनकी तारीफ करके या उन्हें महंगे उपहारों का लालच देकर दोस्ती करते हैं। इस प्रक्रिया को ग्रूमिंग कहा जाता है। एक बार बच्चों का विश्वास जीत लिया तो ये शिकारी उनसे उनके निजी जीवन के बारे में सवाल पूछने लगते हैं और धीरे-धीरे उन्हें अनुचित कार्यों की ओर मोड़ते हैं।[4]
सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग चैट रूम्स और डेटिंग ऐप्स इन लोगों के लिए शिकार करने के प्रमुख स्थान हैं। बच्चे अपनी भावनाओं को किसी के सामने व्यक्त करने की कोशिश में इस जाल में फंस जाते हैं। एक बार पीड़ित बच्चा इस जाल में फंस गया तो उसे ब्लैकमेल करके उसका शारीरिक और मानसिक शोषण किया जाता है। इस प्रक्रिया में बच्चों का इतना नुकसान होता है कि वे किसी को भी बताने से डरते हैं। अपराधी इसी डर का फायदा उठाकर उनका शोषण जारी रखते हैं। इंटरनेट पर अनुचितता का यह एक बहुत ही गहरा और भयावह पहलू है जो बच्चों की सुरक्षा को सीधी चुनौती देता है।
११.५ शैक्षणिक नुकसान: ध्यान भटकना और पढ़ाई में गिरावट
शिक्षा की उम्र में बच्चों की एकाग्रता ही उनकी सफलता की कुंजी होती है। लेकिन अनुचित सामग्री का व्यसन बच्चों के मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में बदलाव लाता है। ऐसी सामग्री से मस्तिष्क में डोपामाइन नामक रसायन का स्तर अचानक बढ़ जाता है, जिससे अस्थायी आनंद मिलता है। इसके बार-बार उपयोग से मस्तिष्क को इस तीव्र उत्तेजना की आदत हो जाती है, परिणामस्वरूप पढ़ाई जैसे शांत और एकाग्रता के काम में बच्चों को रुचि नहीं रहती। किताबें पढ़ना या गणित के सवाल हल करना उन्हें अत्यंत उबाऊ लगने लगता है।
ऐसी सामग्री के प्रभाव में रहने वाले बच्चे निरंतर उन्हीं विचारों में खोए रहते हैं, जिससे उनकी स्मरण शक्ति क्षीण होती है। कक्षा में शिक्षकों द्वारा पढ़ाया गया उन्हें समझ नहीं आता और परीक्षा के समय वे ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। रात देर तक इंटरनेट का उपयोग करने के कारण उनकी नींद पूरी नहीं होती, जिससे उन्हें दिन में थकान महसूस होती है और उनकी सीखने की क्षमता कम होती है। शैक्षणिक प्रगति गिरने के कारण बच्चों में खुद के प्रति हीन भावना पैदा होती है और वे शिक्षा से दूर हो जाते हैं। इस प्रकार, जिस उम्र में बच्चों को अपना करियर बनाना चाहिए, उस उम्र में वे अनुचित सामग्री के चंगुल में फंसकर अपना भविष्य बर्बाद कर लेते हैं।
[1] Lakshmi Sravanti, Arul Jayendra, Pradeep Velusamy, Kiragasur Madegowda Rajendra, and John Vijay Sagar Kommu, “Childhood Digital Exposure to Sexual Content: Through the Lens of Developmental Psychopathology”, Journal of Psychosexual Health, Volume 7, Issue 2, April 2025, Pages 115-119
[2] Semen Sebsbiea, and Anteneh Tsegaye, “Adolescents’ exposure to explicit sexual content on digital media: a quantitative, cross-sectional study”, International Journal Of Adolescence And Youth, 2025, VOL. 30, NO. 1, 2527305
[3] “What is Cyber Defamation?”, Geek for Geek, Dt. 23.7.2025, available on: https://www.geeksforgeeks.org/computer-networks/what-is-cyber-defamation/, last visited on 11.12.2025
[4] “Online Predators in India: What Every Parent Needs to Know (and Do)”, How to Lab, https://www.how2lab.com/internet/security/online-predators

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