अनुचित सामग्री का उपभोग करना केवल शारीरिक खिंचाव नहीं है, बल्कि इसके पीछे मानव मस्तिष्क का जटिल न्यूरोसाइंस और गहराई तक जमी हुई मानसिक वजहें हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म इन मनोवैज्ञानिक कमियों का फायदा उठाकर उपयोगकर्ता को इस जाल में फंसाते हैं। उपभोग के इस मनोविज्ञान के विभिन्न पहलुओं को यदि समझ लिया जाए, तो अभिभावक और शिक्षक मिलकर नई पीढ़ी को सही मार्गदर्शन दे सकेंगे।
९.१ डोपामाइन का प्रभाव: व्यसन का न्यूरोसाइंस
जब कोई व्यक्ति अनुचित सामग्री देखता है, तो मस्तिष्क में डोपामाइन नामक रसायन भारी मात्रा में उत्सर्जित होता है। डोपामाइन वह रसायन है जो आनंद और पुरस्कार मिलने का आभास पैदा करता है। प्राकृतिक प्रक्रिया की तुलना में अनुचित सामग्री के कारण यह उत्सर्जन अत्यंत तीव्र और शक्तिशाली होता है। जब मस्तिष्क को बार-बार ऐसी कृत्रिम उत्तेजना की आदत हो जाती है, तब वह सामान्य जीवन के छोटे सुखों की अनदेखी करने लगता है। इसे ही रतिचित्रण (पोर्न) का व्यसन कहा जाता है। यह व्यसन नशीले पदार्थों के व्यसन की तरह ही मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में बदलाव लाता है। उपयोगकर्ता को फिर से वही उच्च स्तर का आनंद प्राप्त करने के लिए बार-बार और अधिक समय तक ऐसी सामग्री की ओर मुड़ना पड़ता है, जिससे बाहर निकलना व्यक्तिगत इच्छाशक्ति के परे चला जाता है।[1]
९.२ असंवेदनशीलता: चरम सामग्री की आवश्यकता
लगातार अनुचित साहित्य देखने के कारण मस्तिष्क की संवेदनशीलता कम होती जाती है, जिसे मेडिकल भाषा में ‘टॉलरेंस’ कहा जाता है। शुरुआत में जो सामग्री उत्तेजित करने वाली लगती थी, वह कुछ समय बाद सामान्य लगने लगती है। इसलिए पहले जैसा ही आनंद पाने के लिए उपयोगकर्ता और अधिक भड़काऊ, हिंसक या विकृत सामग्री खोजने लगता है। इस प्रक्रिया को ‘एस्केलेशन’ कहते हैं। साधारण अश्लीलता से चरम विकृति की ओर जाने वाली यह यात्रा केवल मस्तिष्क की असंवेदनशीलता के कारण होती है।[2] इससे उपयोगकर्ता की वास्तविक जीवन की यौन समझ बिगड़ जाती है और उसे सामान्य मानवीय रिश्ते उबाऊ लगने लगते हैं। यह असंवेदनशीलता व्यक्ति को उस स्तर पर ले जाती है जहाँ वह नैतिक और कानूनी सीमाओं का भान खो बैठता है।
९.३ दूसरों का निजी जीवन देखने की इच्छा: वॉयरिज्म
मानव स्वभाव में दूसरों के निजी जीवन में झांकने की एक सुप्त इच्छा होती है, जिसे मनोविज्ञान के अनुसार वॉयरिज्म कहा जाता है।[3] डिजिटल युग में छिपे हुए कैमरे से लिए गए वीडियो या किसी के निजी पल देखने की तीव्र इच्छा इसी भावना का लाभ उठाती है। उपयोगकर्ता को लगता है कि वह किसी के निजी जीवन का हिस्सा बन रहा है, जो वास्तविक जीवन में संभव नहीं होता। यह इच्छा व्यक्ति को गुमनामी के बल पर दूसरों की गोपनीयता का उल्लंघन करने के लिए प्रेरित करती है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध यह आभासी प्रवेश उपयोगकर्ता को एक अलग ही सत्ता और आनंद का अनुभव कराता है। यह प्रवृत्ति केवल अश्लीलता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दूसरे की लज्जा का आनंद लेने तक फैलती है, जो एक मानसिक विकृति है।
९.४ पलायनवाद बनाम वास्तविकता: तनाव का सामना
बहुत से लोग दैनिक जीवन के तनाव, निराशा या असफलता से भागने के लिए अनुचित सामग्री का उपयोग करते हैं। जब वास्तविकता के संकटों को झेलना कठिन हो जाता है, तब डिजिटल दुनिया का यह कृत्रिम सुख उन्हें एक अस्थायी सहारा लगता है। इसे पलायनवाद (एस्केपिज्म) कहा जाता है।[4] क्रोध पर नियंत्रण पाने के लिए या अकेलेपन को दूर करने के लिए अनुचितता का उपयोग करना एक आत्मघाती रणनीति है। इससे समस्या सुलझने के बजाय उपयोगकर्ता उस दलदल में और गहराई तक धंसता जाता है। वास्तविकता का सामना करने के बजाय आभासी सुख में डूबे रहने के कारण व्यक्ति की निर्णय क्षमता और मानसिक साहस कम हो जाता है। यह पलायनवाद उसे वास्तविक जिम्मेदारियों से दूर ले जाता है, जिससे उसका सामाजिक और व्यावसायिक जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।
९.५ अकेलेपन का प्रभाव: मानवीय संवाद का स्थान
आधुनिक जीवन का बढ़ता अकेलापन लोगों को डिजिटल उपभोग की ओर धकेल रहा है। जब किसी व्यक्ति को समाज या परिवार में पर्याप्त संवाद नहीं मिलता, तब वह इंटरनेट पर आभासी रिश्ते खोजने लगता है। अनुचित सामग्री देखते समय पैदा होने वाली निकटता वास्तव में अकेलेपन पर लगाई गई एक अस्थायी पट्टी होती है। हालांकि, यह डिजिटल उपभोग वास्तविक मानवीय संवाद का स्थान कभी नहीं ले सकता। इसके विपरीत, यह उपयोगकर्ता को अधिक अंतर्मुखी और सामाजिक रूप से अक्षम बनाता है। वह लोगों से प्रत्यक्ष संवाद करने के बजाय स्क्रीन पर मौजूद पात्रों से भावनात्मक रूप से जुड़ने लगता है। यह चक्र व्यक्ति को समाज से तोड़ता है और उसे एक ऐसे एकाकी संसार में धकेल देता है जहाँ केवल अनुचितता ही एकमात्र साथी बची रहती है।
[1] Todd Love, Christian Laier, Matthias Brand, Linda Hatch, and Raju Hajela, “Neuroscience of Internet Pornography Addiction: A Review and Update”, Behav. Sci. 2015, 5, 388-433
[2] NeuroLaunch editorial team, “Obscene Behavior: Legal, Social, and Psychological Implications”, NeuroLaunch, Dt. 22.9.2022, available at: https://neurolaunch.com/obscene-behavior/, last visited on 9.12.2025
[3] Dr Neeshu Rathore, “Exploring the Depths of Voyeurism: A Psychological Perspective”, Psywellpath, Dt. 7.4.2025, available at: https://glossary.psywellpath.com/the-psychology-of-voyeurism, last visited on 9.12.2025
[4] Rahul Yadav “Gratification in the Digital Age: The Rise of Instant Gratification and Its Consequences”, Buzzpeak, Dt. 10.3.2025, available at: https://buzzpeakblog.wordpress.com/2025/03/10/gratification-in-the-digital-age-the-rise-of-instant-gratification-and-its-consequences/, last visited on 9.12.2025

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