८. परकीय प्रभाव और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद

विदेशी कंपनियों का वर्चस्व और उससे उत्पन्न होने वाला सांस्कृतिक साम्राज्यवाद भारतीय जनमानस पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। अश्लील सामग्री के संदर्भ में वैश्विक तकनीकी कंपनियों की भूमिका क्या है? उससे होने वाला सांस्कृतिक पतन कैसा और कितना है? इन प्रश्नों के उत्तर जाने बिना हम अपने देश की संस्कृति की रक्षा कैसे करेंगे?

८.१ डिजिटल उपनिवेशवाद: कानूनों की अनदेखी

डिजिटल उपनिवेशवाद का अर्थ है वैश्विक स्तर की बड़ी तकनीकी कंपनियों (जैसे मेटा, एक्स, गूगल) द्वारा भारतीय डिजिटल अंतरिक्ष पर प्राप्त किया गया नियंत्रण।[1] ये कंपनियां अक्सर स्वयं को भारतीय कानूनों से ऊपर मानती हैं। आपत्तिजनक सामग्री हटाने के संदर्भ में भारत सरकार द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करने में ये कंपनियां अक्सर देरी करती हैं या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उनकी अनदेखी करती हैं। चूंकि उनके सर्वर और मुख्य कार्यालय विदेशों में हैं, इसलिए भारतीय कानूनी ढांचे में उन्हें पकड़ना कठिन हो जाता है। यह एक प्रकार का आधुनिक उपनिवेशवाद ही है, जहाँ विदेशी कंपनियां भारतीयों के डेटा पर नियंत्रण प्राप्त करती हैं और स्थानीय संस्कृति के लिए घातक सामग्री प्रसारित करके लाभ कमाती हैं। भारतीय कानूनों को ताक पर रखकर मनमाना व्यवहार करने वाली ये कंपनियां सामाजिक अस्थिरता का कारण बन रही हैं।

८.२ शालीनता का पश्चिमीकरण: मूल्यों का आयात

सोशल मीडिया के एल्गोरिदम मुख्य रूप से पश्चिमी मूल्यों पर आधारित हैं।[2] इस प्रक्रिया में शालीनता, लज्जा और पारिवारिक सीमाओं जैसे भारतीय मूल्यों को पुराना और दकियानूसी करार दिया जाता है। पश्चिमी देशों की मुक्त कामुकता और नग्नता के मानदंड भारतीय उपयोगकर्ताओं पर थोपे जा रहे हैं। जब कोई पश्चिमी फैशन या व्यवहार वैश्विक स्तर पर वायरल होता है, तो भारतीय युवा पीढ़ी उसका अंधानुकरण करने लगती है। एल्गोरिदम ऐसी ही सामग्री को बढ़ावा देता है जो बोल्ड या भड़काऊ होती है। इससे भारतीय संस्कृति में शालीनता की परिभाषा धुंधली होती जा रही है और पश्चिमी उपभोक्तावादी संस्कृति के मूल्य भारतीयों के घरों में प्रवेश कर रहे हैं। यह केवल कपड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी भारतीय समाज का पश्चिमीकरण किया जा रहा है, जिससे पारंपरिक नैतिकता की नींव डगमगा रही है।

८.३ भारत को लक्ष्य बनाना: जनसंख्या का दुरुपयोग

भारत दुनिया में सबसे बड़े इंटरनेट उपयोगकर्ताओं वाला देश है, इसलिए वैश्विक कामोत्तेजक उद्योग के लिए यह एक बड़ा बाजार बन गया है। कई विदेशी वयस्क वेबसाइट और ऐप्स विशेष रूप से भारतीय उपयोगकर्ताओं को आकर्षित करने के लिए भारतीय भाषाओं की सामग्री, भारतीय पहनावे वाले पात्रों और स्थानीय संदर्भों का उपयोग कर रहे हैं। भारत की विशाल युवा जनसंख्या इन कंपनियों का मुख्य लक्ष्य है। इन कंपनियों को पता है कि भारत में डेटा सस्ता है और स्मार्टफोन का उपयोग बढ़ा है, इसलिए वे जानबूझकर भारतीय संस्कृति के अनुकूल दिखने वाला लेकिन वास्तव में अभद्र कंटेंट तैयार करते हैं। यह केवल एक व्यावसायिक उद्देश्य नहीं है, बल्कि एक बड़ी जनसंख्या को मानसिक रूप से गुलाम बनाने का प्रयास है, जिससे देश की उत्पादक शक्ति अनुचितता के व्यसन में फंस सकती है।

८.४ अधिकारों की प्रस्तुति: स्वतंत्रता का गलत विपणन

अनुचित सामग्री का समर्थन करने के लिए अक्सर ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ और ‘मेरे शरीर पर मेरा अधिकार’ (बॉडी पॉजिटिविटी/चॉइस) जैसे शब्दों का विपणन किया जाता है। अति-कामुकता को प्रगतिशील विचारों के लक्षण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जो निर्माता अनुचित सामग्री बनाते हैं, उन्हें ‘क्रांतिकारी’ या ‘मुक्त विचारों वाला’ बताया जाता है।[3] वास्तव में, स्वतंत्रता का यह विपणन केवल व्यावसायिक लाभ के लिए किया जाता है। इससे युवा पीढ़ी में यह भ्रम पैदा होता है कि नैतिक सीमाओं का पालन करना पिछड़ापन है। अधिकारों की इस गलत प्रस्तुति के कारण युवक-युवतियां स्वयं का शोषण कराने के लिए भी तैयार हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि वे अपनी पसंद से ऐसा कर रहे हैं। स्वतंत्रता का यह मुखौटा वास्तव में नैतिक अराजकता फैलाने का काम कर रहा है।

८.५ सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करना: भू-राजनीतिक परिणाम

अनुचितता का प्रसार केवल एक नैतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके भू-राजनीतिक परिणाम भी गंभीर हैं। जब किसी देश की युवा पीढ़ी अश्लीलता के वशीभूत हो जाती है, तब उस समाज का सामाजिक ताना-बाना कमजोर हो जाता है।[4] पारिवारिक संस्थाओं का बिखरना, विवाह जैसे पवित्र बंधन पर विश्वास कम होना और यौन अपराधों का बढ़ना, ये सभी परिणाम देश की आंतरिक सुरक्षा और प्रगति में बाधक बनते हैं। एक कमजोर और चरित्रहीन समाज किसी भी बाहरी सांस्कृतिक आक्रमण का आसानी से शिकार हो जाता है। विदेशी शक्तियां अनुचितता का उपयोग करके भारतीय युवाओं की एकाग्रता और अनुशासन को नष्ट कर सकती हैं। यह एक प्रकार का ‘सॉफ्ट वॉर’ है, जहाँ प्रत्यक्ष युद्ध किए बिना केवल सांस्कृतिक पतन के माध्यम से देश को भीतर से खोखला बना दिया जाता है। इससे बचने के लिए डिजिटल साक्षरता कैसे बढ़ाई जाए, इसके लिए उचित नीति लागू करना सरकार का मुख्य कर्तव्य है।


[1] Siddharath Shrivastava, “Digital Colonialism and Data Sovereignty: International and National Legal Perspectives in the Digital Era”, Journal of Contemporary Law and Society, Vol 2(4), December 2025, available at: https://informaticsjournals.co.in/index.php/jcls, last visited on 8.12.2025

[2] “How Does Algorithmic Bias Affect Cultural Representation?”, Sustainability Directory, Dt. 19.03.25, available at: https://lifestyle.sustainability-directory.com/question/how-does-algorithmic-bias-affect-cultural-representation/, last visited on 8.12.2025

[3] Dr. Shivani Verma, “The Indecent Representation Of Women By Media: A Legal And Social Challenge”, Ianna Journal of Interdisciplinary Studies, EISSN: 2735-9891 Volume 6, Issue 2, 2024 61

[4] Arjun H B, “The Obscenity Tightrope: Legal Analysis of Judicial Standards, Legal Moralism and Social Debate”, available at: https://static1.squarespace.com/static/5b7ea2794cde7a79e7c00582/t/66ecc1b1b45f3e7e45decb52/1755622824629/the+obscenity.pdf

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