२. ऐतिहासिक संदर्भ और उत्क्रांती

अश्लीलता की परिभाषा की ऐतिहासिक यात्रा बहुत ही रोचक है। प्राचीन भारत में साहित्य को देखने का दृष्टिकोण अत्यंत मुक्त था। खजुराहो के मंदिर या कामसूत्र जैसी ग्रंथ संपदा इसके उदाहरण हैं, जहाँ कामशास्त्र को एक कला और विज्ञान की दृष्टि से देखा जाता था। उस समय मानव शरीर का चित्रण अपवित्र नहीं माना जाता था। आज इन दो विषयों के माध्यम से अक्सर वाद-विवाद होते हैं। लेकिन मंदिर और ग्रंथ संपदा अपूर्ण हैं, इसलिए उनका संदर्भ लेकर अनुचित कामुक साहित्य को सही ठहराना गलत है।

परंतु, ब्रिटिश शासन के दौरान विक्टोरियन नैतिकता का प्रभाव बढ़ा। केवल एक शताब्दी पहले, यूरोपीय देशों में पूरे शरीर को ढंकने वाले कपड़े पहने जाते थे। उस समय का सिंड्रेला गाउन सिलने के लिए कम से कम १० मीटर कपड़ा लगता था, यानी नौवारी साड़ी से भी ज्यादा। सौ वर्षों में ऐसा क्या बदल गया है कि आज अंग प्रदर्शन करना स्वतंत्रता का प्रमाण बन गया है? १८६० में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) लागू हुई, जिसमें धारा २९२ के तहत अश्लीलता पर प्रतिबंध लगाया गया। इस दौरान हिकलिन टेस्ट का उपयोग किया जाता था, जिसके अनुसार यदि कोई साहित्य कमजोर मन वाले व्यक्ति को भ्रष्ट करता हो, तो उसे अनुचित माना जाता था।[1]

स्वतंत्रता के बाद, भारतीय न्यायपालिका ने इसमें कई बदलाव किए। १९६० के दशक के रंजीत उदेशी बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने साहित्य में कलात्मक मूल्य और आपत्तिजनक अनुचितता के बीच का अंतर स्पष्ट किया। विकास की यह यात्रा अब डिजिटल युग में पहुंच गई है, जहां सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता के माध्यम से बदलते समय के अनुसार नए मानदंड लागू किए जा रहे हैं। आज केवल शरीर प्रदर्शन को नहीं, बल्कि उसके पीछे के उद्देश्य और समाज पर होने वाले प्रभाव को अधिक महत्व दिया जाता है।

२.१ औपनिवेशिक कानूनों से डिजिटल युग तक: एक कानूनी इतिहास

भारतीय कानूनी इतिहास में अनुचित साहित्य से जुड़ी धाराओं की यात्रा औपनिवेशिक मानसिकता से आधुनिक डिजिटल युग तक अत्यंत रोचक रही है। ब्रिटिश काल में १८६० में भारतीय दंड संहिता लागू हुई। स्वतंत्र भारत में ब्रिटिश न्यायाधीश अलेक्जेंडर हिकलिन द्वारा दिए गए हिकलिन टेस्ट का उपयोग किया जाता था। इस परीक्षण के अनुसार, यदि साहित्य का एक छोटा हिस्सा भी किसी का मन भ्रष्ट कर सकता हो, तो पूरे साहित्य को अनुचित माना जाता था। यह दृष्टिकोण अत्यंत संकुचित था और इसमें लेखक के मूल उद्देश्य को महत्व नहीं दिया जाता था।

स्वतंत्रता के बाद भारतीय न्यायपालिका ने इस औपनिवेशिक परिभाषा में बदलाव करना शुरू किया। २०१४ में सर्वोच्च न्यायालय ने समुदाय मानक परीक्षण (कम्युनिटी स्टैंडर्ड टेस्ट) को स्वीकार किया। इसका अर्थ यह है कि साहित्य का मूल्य केवल एक व्यक्ति की नजर से नहीं, बल्कि समाज के समकालीन विचारों के आधार पर तय किया जाने लगा। इसमें साहित्य की कलात्मकता और सामाजिक उपयोगिता की जाँच की जाने लगी।[2] इस परीक्षण के आधार पर भी ऐसा साहित्य आज गलत ही है। इस अभद्रता को बढ़ावा देने के लिए स्वघोषित बुद्धिजीवी टीवी और सोशल मीडिया पर इसे सामान्य सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, जो अत्यंत गलत है।

२००० में सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम आने पर ऑनलाइन सामग्री के लिए नए नियम बने। अब २०२३ में आई भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) ने इन सभी ऐतिहासिक परिवर्तनों को एकत्रित कर आधुनिक डिजिटल संदर्भ में एक नया कानूनी ढांचा तैयार किया है। इसमें अब केवल मुद्रित साहित्य ही नहीं, बल्कि डिजिटल डेटा, वीडियो और एआई सामग्री को भी शामिल किया गया है। यह आवश्यक है क्योंकि अनुचित साहित्य देखकर कई लोगों के मन में उत्तेजना पैदा होती है और वे छेड़खानी से लेकर विनयभंग तक के कई प्रकार के अपराध करते हैं।

२.२ कला या अनुचितता – मंदिरों की शिल्पकला और साहित्य पर ऐतिहासिक वाद गलत क्यों है?

मंदिरों की शिल्पकला और साहित्य के बीच के संबंध पर होने वाला विवाद अक्सर संदर्भ के अभाव के कारण उत्पन्न होता है। इस विवाद के गलत होने के कुछ प्रमुख कारण हैं। पहला, प्राचीन भारतीय संस्कृति में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों को समान महत्व दिया गया था।[3] मंदिरों की दीवारों पर शिल्पकला केवल शरीर प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि इसे जीवन की पूर्णता का प्रतीक माना जाता था। जिस प्रकार भक्ति महत्वपूर्ण है, उसी प्रकार सृजनशीलता और मानवीय भावनाओं को स्वीकार करना आध्यात्मिक प्रगति का ही एक हिस्सा समझा जाता था। इसलिए ये शिल्प उस समय अश्लील नहीं, बल्कि सामान्य माने जाते थे। साथ ही, सभी मंदिरों में भोग-विलास दर्शाने वाले शिल्प नहीं उकेरे गए थे।[4]

दूसरा कारण कला का उद्देश्य है। अनुचित साहित्य का उद्देश्य केवल कामुकता जगाना होता है, जबकि मंदिरों की मूर्तियाँ उच्च श्रेणी की वास्तुकला और सौंदर्य का नमूना हैं। ये मूर्तियाँ मानव जीवन की विभिन्न अवस्थाओं को दर्शाती हैं। अंग्रेजों के आने के बाद उनकी विक्टोरियन नैतिकता के कारण हम अपनी ही कला को संकुचित नजर से देखने लगे, जिससे यह विवाद और गहरा गया है।[5]

तीसरा कारण यह है कि जब ये मंदिर बनाए गए थे, तब सामान्य लोग हों या राजघराने के लोग, कमर के नीचे लंगोट और कमर ढंकने वाला कपड़ा सभी के लिए अनिवार्य था, जबकि छाती ढंकना एक विकल्प था। ये मंदिर अंग्रेजों के आने से पहले के निर्मित हैं, इसलिए उनका संदर्भ देकर विकृति को बढ़ावा देना मूर्खता है। आज के आधुनिक समय में हम कला और विकृति के बीच का अंतर भूल जाते हैं। ऐतिहासिक कलाकृतियों को आज के समय के अनुचित साहित्य से जोड़ना उस समय के प्रगल्भ विचारों का अपमान करने जैसा है। संक्षेप में, यह साहित्य या कला उस समय के समाज के मुक्त और प्राकृतिक विचारों का प्रतिबिंब थी, जो आज की अश्लीलता की परिभाषा में फिट नहीं बैठती।

२.३ चित्रपट युग: स्वतंत्रता से ९० के दशक तक सेंसरशिप की लड़ाइयां

स्वतंत्रता के बाद भारतीय फिल्मों में अश्लीलता और सेंसरशिप का इतिहास बड़े संघर्ष का रहा है। १९५२ के सिनेमैटोग्राफ अधिनियम ने फिल्म प्रमाणन की पद्धति शुरू की, जिससे सेंसर बोर्ड का जन्म हुआ। शुरुआती दौर में, यानी ५० और ६० के दशक में, सेंसरशिप अत्यंत कड़ी थी। पर्दे पर चुंबन दृश्य या अत्यधिक निकटता दिखाने पर अघोषित प्रतिबंध था। इसी कारण अक्सर फूलों का एक-दूसरे को छूना या दो पक्षियों का करीब आना जैसे प्रतीकों का उपयोग किया जाता था।[6] यह काल कम से कम इस मामले में भारतीय मूल्यों के संरक्षण पर जोर देने वाला था।

७० और ८० के दशक में फिल्मों में हिंसा और थोड़े प्रमाण में ग्लैमर बढ़ा। इस दौरान कई फिल्मों को उनके बोल्ड दृश्यों के कारण सेंसर बोर्ड की कैंची का सामना करना पड़ा। ९० का दशक सही मायने में बदलाव का रहा। इस दौरान गानों में द्विअर्थी शब्दों और नृत्य की कुछ मुद्राओं को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हुआ। उदाहरण के तौर पर, खलनायक या फूल और कांटे जैसी फिल्मों के कुछ गाने सेंसरशिप के घेरे में आए थे। यह लड़ाई केवल दृश्यों तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक नैतिकता के बीच का संघर्ष था। ९० के दशक के अंत में वैश्वीकरण के कारण सेंसरशिप के मानदंडों में कुछ ढील आने लगी, जिसने आगे चलकर आज के ओटीटी युग की स्वतंत्रता की नींव रखी। लेकिन यौन अपराधों को बढ़ावा देने वाले दृश्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर प्रदर्शित करना कितना उचित है? ऐसे दृश्य देखकर मानसिक स्वास्थ्य खराब होता है, क्या यह स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन नहीं है?

२.४ इंटरनेट का विस्फोट: २००० के दशक ने अनुचितपणा की व्याख्या कैसे बदली

२००० के दशक में इंटरनेट का विस्फोट अश्लीलता की परिभाषा बदलने के लिए क्रांतिकारी साबित हुआ। इस दशक में सूचना का लोकतंत्रीकरण हुआ और जो सामग्री पहले केवल मुद्रित रूप में या सिनेमाघरों में मिलती थी, वह सीधे लोगों के कंप्यूटर पर पहुंच गई। इस काल में अनुचितता की परिभाषा सार्वजनिक से हटकर निजी की ओर मुड़ गई। इंटरनेट के कारण लोगों ने अपने घर बैठकर सामग्री देखना शुरू किया, जिससे सार्वजनिक स्थानों पर क्या प्रदर्शित किया जाए, इस पर पुराने कानूनी मानदंड अपर्याप्त पड़ने लगे। इस दौरान एमएमएस स्कैंडल्स और साइबर कैफे में होने वाली अनैतिक गतिविधियां बढ़ीं, जिसने कानून के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दीं।[7]

दूसरा महत्वपूर्ण बदलाव यूजर जनरेटेड कंटेंट (उपयोगकर्ता द्वारा निर्मित सामग्री) था। अब केवल व्यावसायिक लोग ही सामग्री नहीं बना रहे थे, बल्कि सामान्य लोग भी कैमरा फोन के माध्यम से सामग्री तैयार करने लगे। इससे अश्लीलता की परिभाषा केवल व्यावसायिक व्यापार तक सीमित न रहकर व्यक्तिगत गोपनीयता और साइबर अपराध से जुड़ गई। इन्हीं बदलावों का सामना करने के लिए भारत ने २००० में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) लागू किया। इस दशक ने यह सिद्ध किया कि केवल प्रतिबंध लगाकर अश्लीलता नहीं रोकी जा सकती, बल्कि इसके लिए तकनीक आधारित निगरानी और डिजिटल साक्षरता आवश्यक है।[8]

२.५ केस स्टडीज: अनुचितता के कानूनों को आकार देने वाले महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय

भारतीय न्यायपालिका ने विभिन्न मुकदमों के माध्यम से अश्लीलता की परिभाषा स्पष्ट की है। इसमें तीन मुख्य मामले मील का पत्थर साबित हुए हैं।

प्रथम, रंजीत उदेशी बनाम महाराष्ट्र राज्य: यह मामला डी. एच. लॉरेंस की पुस्तक लेडी चैटरलीज लवर पर आधारित था। इसमें सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार हिकलिन टेस्ट का उपयोग किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि साहित्य का उद्देश्य केवल कामुकता फैलाना हो और उसमें सामाजिक हित न हो, तो उसे अनुचित माना जाएगा।[9]

द्वितीय, समरेश बोस बनाम पश्चिम बंगाल: इस निर्णय ने अनुचितता की परिभाषा को और अधिक उदार बनाया। न्यायालय ने कहा कि केवल कामुकता का वर्णन ही अनुचितता नहीं है। लेखक का दृष्टिकोण और साहित्य का साहित्यिक मूल्य जाँचना आवश्यक है। एक सुसंस्कृत व्यक्ति को जो साहित्य केवल विकृत नहीं लगता, वह कानून के दायरे में अनुचित नहीं ठहरता।[10]

तृतीय, अवनीक सरकार बनाम पश्चिम बंगाल (२०१४): यह मामला टेनिस खिलाड़ी बोरिस बेकर के एक नग्न छायाचित्र से संबंधित था। इसमें न्यायालय ने हिकलिन टेस्ट को पूरी तरह नकार दिया और समुदाय मानक परीक्षण (कम्युनिटी स्टैंडर्ड टेस्ट) को स्वीकार किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी चित्र या साहित्य को उसके संपूर्ण संदर्भ में देखा जाना चाहिए, केवल एक हिस्से के आधार पर उसे अनुचित नहीं ठहराया जा सकता। इन मुकदमों ने सिद्ध किया कि कानून अब केवल नैतिकता पर नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कलात्मक मूल्यों पर भी आधारित है।[11]


[1] “Hicklin rule”, EBSCO Knowledge Advantage, available at: https://www.ebsco.com/research-starters/law/hicklin-rule, Last visited on 2.12.2025

[2] Nishtha Chopra, “What is Obscene in India: Is the Community Standards Test the Best Answer?”, Constitutional Law Society, available at: https://clsnluo.com/2023/07/16/what-is-obscene-in-india-is-the-community-standards-test-the-best-answer/, Last visited on 2.12.2025

[3] Rahul Dudhane, “Four Purusharthas: The Hindu Concept of Life’s Purpose and the Path to Dharma, Wealth, Desire, and Liberation”, Hinduism Facts, Dt. 1.4.2025, available at: https://hinduismfacts.org/four-purusharthas/, Last visited on 2.12.2025

[4] Rupsa Chakraborty, “The Motivation Behind the Erotic Sculptures of Khajuraho”, Hubpages, Dt. 19.1.2025, available at: https://discover.hubpages.com/art/the-truth-of-the-erotic-sculptures-on-khajuraho-temples, Last visited on 2.12.2025

[5] PsychologyFor Editorial Team. (2025), “Victorian Morality: What it Was and What Were Its Characteristics” PsychologyFor, https://psychologyfor.com/victorian-morality-what-it-was-and-what-were-its-characteristics/, Last visited on 2.12.2025

[6] Charu Thakur, “100 Years of Cinema: History of kissing on screen”, News 18, Dt. 20.2.2013, available at: https://www.news18.com/news/india/100-years-of-cinema-history-of-kissing-on-screen-591942.html

[7] Sharon aneja, “Obscenity Laws in India: Historical Context, Key Cases & Challenges”, Tax Guru, Dt. 11.11.2024, available at: https://taxguru.in/corporate-law/obscenity-laws-india-historical-context-key-cases-challenges.html,

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[8] Ms. Neha khanna Mr. Rohit Khanna, “The Impact Of Digital Media On Obscenity Standards Vis A Vis Vagueness Of Laws In India”, 2025 IJNRD, Volume 10, Issue 2 February 2025, ISSN: 2456-4184, IJNRD.ORG.

[9] Ranjit D. Udeshi v. State of Maharashtra, AIR 1965 SC 881

[10] Samaresh Bose vs West Bengal, 1972 SCC(CRI) 761

[11] Aveek Sarkar vs West Bengal, (2014) 1 MADLW(CRI) 677

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