१. आधार – अनुचित सामग्री की परिभाषा

साहित्य का मूल उद्देश्य मानवीय मन को समृद्ध करना, मनोरंजन करना और समाज को सही दिशा देना होता है। हालांकि, जब साहित्य में सामाजिक सीमाओं, सभ्यता और नैतिकता का उल्लंघन किया जाता है, तो उसे अनुचित या अश्लील साहित्य कहा जाता है। इस पूरी पुस्तिका का उद्देश्य डिजिटल अश्लील साहित्य के बारे में चर्चा करना है। समय के साथ ऐसी अनुचित सामग्री घर-घर तक पहुंच गई है और इसके दुष्प्रभाव भी दिखाई दे रहे हैं। यह सामाजिक समस्या जितनी बड़ी है, उतना ही जन-जागरण आवश्यक है, इसीलिए यह पुस्तिका लिखी गई है।

यहाँ अनुचित सामग्री का अर्थ मुख्य रूप से ऐसे लेखन से है, जिसमें कलात्मक मूल्यों का अभाव होता है और केवल शारीरिक तीव्र इच्छाओं तथा उत्तेजक दृश्यों का वर्णन होता है। साहित्य में शृंगार रस होने और अनुचितता होने में अंतर है। जब शृंगार का स्थान विकृति ले लेती है और मानवीय रिश्तों या शरीर का केवल वस्तु के रूप में प्रदर्शन किया जाता है, तब वह साहित्य अनुचित ठहरता है।

ऐसे साहित्य का उद्देश्य पाठक या दर्शक का शुद्ध मनोरंजन करना नहीं होता, बल्कि केवल उसके मन की विकृत भावनाओं को बढ़ावा देना होता है। इसका समाज और विशेष रूप से युवा पीढ़ी की मानसिकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे रिश्तों की ओर देखने का दृष्टिकोण दूषित हो जाता है। संक्षेप में, जो साहित्य विचारों से प्रगल्भ करने के बजाय वैचारिक गिरावट की ओर ले जाता है, वह साहित्य अनुचित होता है।

१.१ कानूनी सीमाएं: भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा २९४ के तहत अनुचितता की परिभाषा

भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), २०२३ की धारा २९४ के तहत अनुचित सामग्री से संबंधित कठोर कानूनी प्रावधान किए गए हैं। यह धारा पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा २९२ के समान है। इस धारा के अनुसार, अनुचित पुस्तक, दस्तावेज, चित्र, रेखाचित्र या अन्य कोई भी वस्तु बेचना, किराए पर देना, वितरित करना या सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना अपराध है। कानून की दृष्टि में अनुचित साहित्य का अर्थ ऐसी सामग्री है, जो कामुक है या जो पढ़ने और देखने वाले व्यक्ति के मन में केवल शारीरिक तीव्र इच्छाएं पैदा करती है। जिस साहित्य से व्यक्ति की नैतिकता भ्रष्ट होने या बिगड़ने की संभावना होती है, वह इस कानून के तहत प्रतिबंधित है।[1]

यदि कोई ऐसी सामग्री का विज्ञापन करता है या उसका व्यापार करता है, तो उसके लिए कारावास और जुर्माने का प्रावधान है। हालांकि, विज्ञान, साहित्य, कला या धार्मिक उद्देश्य (सद्भाव) से उपयोग की जाने वाली सामग्री को इससे कुछ अपवाद दिए गए हैं। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), २०२३ की धारा २९४ के अनुसार ऐसी अनुचित सामग्री की बिक्री, वितरण या प्रदर्शन करने वालों के लिए सजा का स्पष्ट प्रावधान है। इस कानून के अनुसार सजा का स्वरूप अपराध की पुनरावृत्ति पर निर्भर करता है।

यदि कोई व्यक्ति पहली बार ऐसे अपराध में दोषी पाया जाता है, तो उसे दो साल तक का कारावास और पांच हजार रुपये तक के जुर्माने की सजा हो सकती है। यदि वही व्यक्ति यह अपराध दोबारा करता है मतलब दूसरी बार या उसके बाद फिर से करता हैं, तो सजा का स्वरूप और अधिक कठोर हो जाता है। ऐसी स्थिति में, दोषी व्यक्ति को पांच साल तक का कारावास और दस हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। नए कानून में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अनुचित सामग्री के वितरण को भी दंडनीय अपराध बताया गया है।

१.२ सामाजिक मानदंड: समाज कैसे तय करता है कि क्या आपत्तिजनक है?

सामाजिक मानदंड समय, काल और संस्कृति के अनुसार बदलते रहते हैं। समाज में क्या आपत्तिजनक है, यह तय करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कारक जिम्मेदार होते हैं। पहला कारक सामूहिक नैतिकता है। समाज के अधिकांश लोग जिन चीजों को अनैतिक या शर्मनाक मानते हैं, उन चीजों को आपत्तिजनक माना जाता है। इसमें पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक परंपराओं का बड़ा योगदान होता है। यदि कोई साहित्य या कलाकृति सार्वजनिक शिष्टाचार का उल्लंघन करती है, तो समाज उस पर प्रतिबंध लगाने की मांग करता है।[2]

दूसरा महत्वपूर्ण मानदंड औसत व्यक्ति की दृष्टि है। कोई साहित्य आपत्तिजनक है या नहीं, यह तय करने के लिए कानून और समाज एक सामान्य सुसंस्कृत व्यक्ति की नजर से उसे देखते हैं। यदि उस साहित्य का उद्देश्य केवल कामुकता फैलाना हो और उससे कोई शैक्षणिक या कलात्मक मूल्य प्राप्त न हो रहा हो, तो उसे अनुचित माना जाता है। भारत हो या कोई अन्य देश, और समय कोई भी हो, अनुचित सामग्री देखकर औसत व्यक्ति की विचारधारा दूषित होती ही है। साथ ही, जिन चीजों से बच्चों या युवा पीढ़ी की मानसिकता पर बुरा असर पड़ने की संभावना होती है, ऐसी सामग्री को समाज तुरंत आपत्तिजनक मान लेता है। संक्षेप में, सामाजिक स्वास्थ्य और नैतिक सीमाओं की रक्षा करना ही किसी भी आपत्ति को तय करने का मानदंड होता है।[3]

१.३ जागरूकता का अभाव: कई भारतीयों को उनके डिजिटल अधिकारों के बारे में जानकारी क्यों नहीं है?

भारत में डिजिटल अधिकारों के प्रति जागरूकता कम होने के पीछे कुछ प्रमुख सामाजिक और तकनीकी कारण हैं। पहला महत्वपूर्ण कारण शिक्षा का अभाव और भाषा की बाधा है। अधिकांश डिजिटल कानून और गोपनीयता की शर्तें अंग्रेजी भाषा में होती हैं, जिसके कारण सामान्य नागरिकों को उनके अधिकार ठीक से समझ नहीं आते। साथ ही, भारत में डिजिटल साक्षरता की तुलना में तकनीकी साक्षरता अधिक है; यानी लोगों को इंटरनेट चलाना तो आता है, लेकिन उस पर मौजूद खतरों और कानूनी अधिकारों की उन्हें कल्पना नहीं होती।[4]

दूसरा कारण प्राइवेसी या गोपनीयता के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण है। भारतीय समाज में अक्सर गोपनीयता को व्यक्तिगत अधिकार की तुलना में गौण स्थान दिया जाता है। लोग आसानी से अपनी व्यक्तिगत जानकारी ऐप्स को दे देते हैं क्योंकि उन्हें उस जानकारी के दुरुपयोग का डर नहीं लगता। अंत में, सरकार और संस्थाओं द्वारा की जाने वाली जन-जागरूकता की कमी भी एक बड़ा कारण है। स्कूलों या कॉलेजों में साइबर कानूनों की शिक्षा नहीं दी जाती। परिणामस्वरूप, डिजिटल दुनिया में उनका शोषण हो रहा है, यह बात कई लोगों के ध्यान में ही नहीं आती।[5]

१.४ डिजिटल बनाम प्रत्यक्ष: ऑनलाइन अनुचितता को परिभाषित करना कठिन क्यों है?

ऑनलाइन अनुचित सामग्री को परिभाषित करना वास्तविक दुनिया की तुलना में अधिक कठिन है। पहला कारण भौगोलिक सीमाओं का अभाव है। इंटरनेट पर सामग्री कहीं से भी अपलोड की जा सकती है। एक देश में जो कानूनी है, वह दूसरे देश में अवैध हो सकता है। ऐसे समय में वैश्विक स्तर पर एक समान परिभाषा तय करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।[6] लेकिन अनुचित सामग्री जो कामुकता बढ़ाती है, उसकी परिभाषा करनी ही होगी, अन्यथा इस समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।

दूसरा कारण सामग्री का स्वरूप और गति है। इंटरनेट पर हर सेकंड भारी मात्रा में जानकारी पैदा होती है। केवल पाठ ही नहीं, बल्कि वीडियो, फोटो, मीम्स और एआई-जनरेटेड सामग्री के कारण क्या वास्तविक है और क्या विकृत, यह तय करना कठिन हो जाता है। प्रत्यक्ष सामग्री की तरह इस पर तत्काल नियंत्रण पाना कठिन होता है।

तीसरा कारण निजी संवाद बनाम सार्वजनिक प्रदर्शन के बीच की धुंधली रेखा है। एन्क्रिप्टेड चैट्स या बंद समूहों में साझा की गई सामग्री व्यक्तिगत स्वतंत्रता है या अपराध, यह तय करते समय गोपनीयता के अधिकार की बाधा आती है। साथ ही, कला और अश्लीलता के बीच का अंतर डिजिटल माध्यम में और अधिक स्पष्ट नहीं रह जाता, जिससे कानून लागू करना जटिल हो जाता है। इन कारणों का सहारा लेकर अक्सर अनुचित सामग्री पोस्ट करने वाले बच निकलते हैं।[7]

१.५ वैश्विक बनाम स्थानीय संघर्ष: जब पश्चिमी मानक भारतीय मूल्यों से टकराते हैं

वैश्विक बनाम स्थानीय मूल्यों का संघर्ष डिजिटल युग की एक बड़ी पहेली है। पश्चिमी देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पसंद को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। वहां अश्लीलता की परिभाषा अक्सर व्यापक होती है, जहां केवल प्रत्यक्ष हिंसा या बिना सहमति के बनाई गई सामग्री को ही अपराध माना जाता है। इसके विपरीत, भारतीय समाज में सामूहिक नैतिकता और पारिवारिक संस्कृति को प्राथमिकता दी जाती है। भारत में पश्चिमी साहित्य का खुलापन अक्सर सामाजिक मूल्यों पर किया गया हमला प्रतीत होता है। इंटरनेट के कारण पश्चिमी मूल्य सीधे भारतीय घरों में पहुंच गए हैं, जिससे सांस्कृतिक संघर्ष की स्थिति पैदा हो गई है।[8]

यह संघर्ष मुख्य रूप से ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के मामले में दिखाई देता है। वैश्विक कंपनियां अपनी अमेरिकी या पश्चिमी नीतियों के अनुसार सामग्री प्रसारित करती हैं, लेकिन भारतीय दर्शकों को वह अक्सर आपत्तिजनक लगती है। इसीलिए भारत में अब ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए अधिक कड़े दिशा-निर्देश लाए जा रहे हैं।[9] यह संघर्ष केवल साहित्य का नहीं है, बल्कि यह दो भिन्न जीवन-पद्धतियों के बीच का वैचारिक युद्ध है। बार-बार पश्चिमी नीतियों का हवाला देकर यह कहने वाले लोग बहुत मिलेंगे कि इस समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता, लेकिन यदि इस विषय पर शोध-पत्र गूगल पर खोजे जाएं, तो वे पश्चिमी विश्वविद्यालयों के ही मिलेंगे, और उनमें एक बात स्पष्ट कही गई है कि ऐसी सामग्री मानसिक विकार पैदा कर सकती है।


[1] [1] Parakram Chauhan, “Obscenity In India: Tracing Judicial Standards”, Indian Journal of Integrated Research in Law, Volume III Issue IV, ISSN: 2583-0538

[2] Madhav Singh Bisht and Dewansh Bharadwaj, “Art, Expression and Law: When Does Creativity Cross the Line into Obscenity” Legal Bites Dt. 24.3.2025 available on https://www.legalbites.in/topics/articles/art-expression-and-law-when-does-creativity-cross-the-line-into-obscenity-1124619, Last Visited on, 1.12.2025

[3] Aishwarya Agrawal, “Law of Obscenity in India”, Law Bhoomi, Dt. 21.3.2025, available on https://lawbhoomi.com/law-of-obscenity-in-india/, Last Visited on. 1.12.2025

[4] Achmad Tavip Junaedia, Harry Patuan Panjaitana, Indri Yovitab, Kristy Veronicaa, Nicholas Renaldoc, Jahrizal Jahrizalb, “Advancing Digital and Technology Literacy through Qualitative Studies to Bridging the Skills Gap in the Digital Age” Journal of Applied Business and Technology, (JABT) 2024: 5(2), 123-133 Dt. 31.5.2024

[5] Saatvika Radhakrishna, “Cyberbullying in India grows as schools, platforms, and the law fail to protect children”, Frontline Dt. 8.8.2025, available at https://frontline.thehindu.com/social-issues/cyberbullying-teenagers-india-law-mental-health-ugc-social-media/article69905344.ece, Last Visited on. 1.12.2025

[6] “Content on Internet must be uploaded with great caution, says Delhi HC”, The Hindu, Dt. 11.10.2025, available at https://www.thehindu.com/news/cities/Delhi/content-on-internet-must-be-uploaded-with-great-caution-says-delhi-hc/article70148303.ece, Last Visited on. 1.12.2025

[7] Mugdha Dwivedi, Aditya Pranav Dwivedi, “Obscenity and the Legal Ambiguity in India: A Critical Analysis”, International Journal for Multidisciplinary Research (IJFMR) E-ISSN: 2582-2160

[8] Sarthak Shukla, “Embracing globalisation or losing identity? The impact of westernisation on Indian Youth” Organiser, Dt. 9.12.2024, https://organiser.org/2024/12/09/268540/bharat/embracing-globalisation-or-losing-identity-the-impact-of-westernisation-on-indian-youth/

[9] “Govt Reaffirms Commitment to Creative Freedom, Enforces OTT Oversight via IT Rules, 2021; Three-Tier Grievance Redressal Mechanism in Place to Regulate OTT Content”, PIB, Dt. 6.8.2025, available at: https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2152954&reg=3&lang=2, Last visited on 1.12.2025

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