पुस्तक की प्रस्तावना

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1.1 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023: अध्याय 1 – प्रारंभिक
‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023’ (बीएनएसएस) भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 का स्थान लेने वाला एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक कानून है। इसका अध्याय 1 संहिता की नींव रखता है, जिसके अंतर्गत पाँच मुख्य धाराएँ (Sections) हैं जो कानून के नाम, दायरे, शब्दावली और अन्य कानूनों के साथ इसके संबंधों को परिभाषित करती हैं।
1.2 मूल प्रावधान
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ।
(1) यह अधिनियम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 कहा जा सकेगा।
(2) इस संहिता के अध्याय 9, 11 और 12 से संबंधित उपबंधों से भिन्न उपबंध, निम्नलिखित पर लागू नहीं होंगे—
(क) नागालैंड राज्य पर;
(ख) जनजातीय क्षेत्रों पर,
किन्तु संबंधित राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, ऐसे उपबंधों या उनमें से किसी को नागालैंड राज्य के संपूर्ण या किसी भाग पर या यथास्थिति, ऐसे जनजातीय क्षेत्रों पर ऐसे अनुपूरक, आनुषंगिक या पारिणामिक उपान्तरणों सहित, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, लागू कर सकेगी।
स्पष्टीकरण— इस धारा में, “जनजातीय क्षेत्र” से वे राज्यक्षेत्र अभिप्रेत हैं, जो 21 जनवरी, 1972 के ठीक पहले संविधान की छठी अनुसूची के पैरा 20 में निर्दिष्ट असम के जनजातीय क्षेत्रों के अंतर्गत आते थे, सिवाय शिलांग नगर पालिका की स्थानीय सीमाओं के भीतर आने वाले क्षेत्रों के।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केंद्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे।
1.3 नाम, विस्तार और प्रारंभ (धारा 1)
बीएनएसएस की पहली धारा कानून को औपचारिक रूप देती है। यह बताती है कि इस संहिता का नाम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 है। यह संहिता जम्मू-कश्मीर सहित पूरे भारत पर लागू होती है। पर इस संहिता के अध्याय 9, 11 और 12 के प्रावधान और उससे जुड़े अन्य प्रावधान पूरे नागालैंड और आसाम के उन जनजातीय क्षेत्रों मे लागू नहीं होंगे जिनका समावेश संविधान की छठी सूची के पैरा 20 मे दि. 21 जनवरी 1972 के ठीक पहले किया गया था।
इसका प्रारंभ (commencement) केंद्र सरकार द्वारा आधिकारिक राजपत्र (Official Gazette) में अधिसूचना जारी करने की तारीख से होगा, जिसका अर्थ है कि यह तुरंत लागू नहीं हुई है बल्कि सरकार द्वारा अधिसूचित होने पर प्रभावी होगी। यह धारा इस नए प्रक्रियात्मक ढांचे की भौगोलिक सीमा और लागू होने की तिथि को निर्धारित करती है। इसीलिए 1 जुलाई 2024 के दिन भारतीय सरकार द्वारा आधिकारिक राजपत्र मे अधिसूचना प्रकाशित कर इस संहिता को पूरे देश मे लागू किया गया।
1.4 नागालैंड और आसाम के कुछ हिस्सों को छूट:
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के कुछ प्रावधानों का नागालैंड राज्य और असम के जनजातीय क्षेत्रों में लागू न होना एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और ऐतिहासिक प्रावधान है। यह छूट मुख्य रूप से भारत के संविधान में निहित विशेष सुरक्षा उपायों और इन क्षेत्रों की अनूठी सामाजिक-सांस्कृतिक तथा कानूनी व्यवस्था को बनाए रखने की इच्छा पर आधारित है।
1. अनुच्छेद 371A के तहत नागालैंड को विशेष संरक्षण
नागालैंड को भारत के संविधान के अनुच्छेद 371Aके तहत एक विशेष संवैधानिक दर्जा प्राप्त है। यह अनुच्छेद स्पष्ट रूप से प्रावधान करता है कि संसद का कोई भी अधिनियम कतिपय मामलों से संबंधित हो, वह नागालैंड राज्य पर तब तक लागू नहीं होगा जब तक कि राज्य की विधान सभा एक प्रस्ताव द्वारा ऐसा करने का निर्णय नहीं लेती। ऐसे मामलों मे नागाओं की धार्मिक या सामाजिक प्रथाएँ, नागा रूढ़िजन्य विधि और प्रक्रिया(Customary Law and Procedure), सिविल और आपराधिक न्याय का प्रशासन जहाँ निर्णय रूढ़िजन्य विधिके अनुसार होते हैं, भूमि और उसके संसाधनों का स्वामित्व और हस्तांतरण, इत्यादि विषय शामिल हैं।[1]
BNSS/CrPC जैसे केंद्रीय कानून, जो आपराधिक न्याय और प्रक्रिया से संबंधित हैं, नागा रूढ़िजन्य विधि और प्रक्रियाओं के क्षेत्र में आते हैं। इसलिए, BNSS और CrPC की धारा 1 (या CrPC की पुरानी धारा 1) के तहत यह छूट दी गई है ताकि नागालैंड अपने पारंपरिक शासन तंत्रऔर रूढ़िजन्य कानूनोंको बनाए रख सके।
2. संविधान की छठी अनुसूची
असम के जनजातीय क्षेत्र (Tribal Areas) और कुछ हद तक नागालैंड के संबंध में, छूट का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण संविधान की छठी अनुसूची है। छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के कुछ जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त जिला परिषदों (Autonomous District Councils – ADCs) के माध्यम से प्रशासन का प्रावधान करती है। ये परिषदें कुछ कानूनी मामलों, जैसे कि विवाह, तलाक, संपत्ति का उत्तराधिकार, और गाँव के प्रशासन पर रूढ़िजन्य कानूनोंके आधार पर कानून बनाने और न्याय प्रशासन करने की शक्ति रखती हैं।[2]
चूंकि BNSS/CrPC केंद्रीय आपराधिक प्रक्रियाएँ हैं, उनका सीधा और पूर्ण अनुप्रयोग छठी अनुसूची के तहत संरक्षित स्वदेशी न्याय प्रणाली और रूढ़िजन्य विधि के साथ टकराव पैदा कर सकता था। इसलिए, BNSS/CrPC के तहत इन क्षेत्रों को कुछ प्रावधानों से छूट दी गई है, जिससे राज्य सरकार को अधिसूचना द्वारा बाद में उन्हें लागू करने की अनुमति मिलती है। जनजातीय क्षेत्रों(Tribal Areas) से तात्पर्य वे क्षेत्र हैं जो 21 जनवरी 1972 से ठीक पहले संविधान की छठी अनुसूची के पैरा 20 में निर्दिष्ट थे।
3. राजनीतिक कारण
कानूनों को लागू न करने का एक महत्वपूर्ण राजनैतिक कारण यह है कि इन क्षेत्रों की विशिष्ट पहचान और संप्रभुता की भावना को मान्यता देना है। नागालैंड और असम के जनजातीय क्षेत्रों के लोगों ने अपनी अनूठी पहचान और परंपराओं को बनाए रखने के लिए ऐतिहासिक रूप से संघर्ष किया है।[3] केंद्र सरकार द्वारा CrPC/BNSS के कुछ प्रावधानों में छूट देना समझौते और संघीय सिद्धांतके प्रति सम्मान को दर्शाता है। यह प्रावधान केंद्र सरकार और स्थानीय जनजातीय समुदायों के बीच एक सहमत तंत्रके रूप में कार्य करता है, जो केंद्रीय कानून को केवल स्थानीय सहमतिसे लागू करने की अनुमति देता है। यह स्थानीय शासन और आत्मनिर्णय को मजबूत करने की दिशा में एक कदम है।
4. BNSS/CrPC में छूट प्राप्त प्रावधान
BNSS की धारा 1(2) के अनुसार, BNSS के अध्याय 9 (सार्वजनिक व्यवस्था और शांति बनाए रखने से संबंधित), अध्याय 11 (पुलिस की निवारक कार्रवाई), और अध्याय 12 (निगरानी और निवारक कार्रवाई से संबंधित) से भिन्न प्रावधान नागालैंड राज्य और जनजातीय क्षेत्रों पर लागू नहीं होते हैं। हालांकि, संबंधित राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा ऐसे प्रावधानों को लागू कर सकती है। इस प्रकार, छूट का सार स्थानीय रूढ़िजन्य विधि और शासन प्रणालियों को केंद्रीय कानूनों के हस्तक्षेप से बचाना है, जैसा कि संविधान के विशेष प्रावधानों द्वारा अनिवार्य है।
1.5 ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति
यह कहना उचित होगा कि BNSS की धारा 1 (जो पहले CrPC, 1973 की धारा 1 में थी, और उससे पहले 1898 की CrPC में भी) ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा शुरू की गई प्रशासनिक परंपरा पर आधारित है। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों ने भारत के कुछ सीमांत और जनजातीय क्षेत्रों को “Excluded Areas” (अपवर्जित क्षेत्र) और “Partially Excluded Areas” (आंशिक रूप से अपवर्जित क्षेत्र) के रूप में नामित किया था।[4]
इन क्षेत्रों को शेष भारत के सामान्य कानूनों और प्रशासनिक ढाँचे से अलग रखा गया था। इसका मुख्य कारण प्रशासनिक सुविधा और जनजातीय विद्रोहों से बचने के लिए उनकी पारंपरिक व्यवस्थाओं को भंग न करने की नीति थी। ब्रिटिश काल की CrPC (1898) में भी यह प्रावधान था कि वह इन क्षेत्रों में अपने आप लागू नहीं होगी, जिससे स्थानीय रूढ़िजन्य विधि चलती रहे। “ब्रिटिश नीति के पीछे वास्तविकता क्या हैं?” ये तो इतिहास के संशोधन का विषय हैं, पर जो भी हैं इस नीति के कारण भारत के पूर्वोत्तर राज्य कही न कही भारत से विभक्त हो रहे हैं।
स्वतंत्रता के बाद, भारत के संविधान निर्माताओं ने इस प्रशासनिक पृथक्करण को समाप्त नहीं किया, बल्कि इसे एक संवैधानिक संरक्षण में बदल दिया।[5] ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति का उद्देश्य अक्सर पृथक करना और अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण बनाए रखना था, लेकिन भारतीय संविधान का उद्देश्य सांस्कृतिक पहचान और प्रशासनिक स्वायत्तता की रक्षा करना था, जैसा कि अनुच्छेद 371A और छठी अनुसूची में निहित है। आपके अनुसार क्या ये प्रथक्करण की नीति आज के आधुनिक युग मे देश मे आवश्यक हैं? जिन लोगों ने अपना मूल प्रकृतिपूजन का धर्म त्याग कर अन्य धर्म को अपना लिया हैं, क्या उन लोगों के लिए ऐसा विशेष छूट देने वाला प्रावधान रखना चाहिए?
[1] Special provision with respect to the State of Nagaland, Constitution of India, available at: https://www.constitutionofindia.net/articles/article-371a-special-provision-with-respect-to-the-state-of-nagaland/, Last visited on 7.12.2025
[2] Provisions as to the Administration of Tribal Areas in the States of Assam, Meghalaya, Tripura and Mizoram Constitution of India, available at: https://www.constitutionofindia.net/schedules/provisions-as-to-the-administration-of-tribal-areas-in-the-states-of-assam-meghalaya-tripura-and-mizoram/, Last visited on 7.12.2025
[3] von Fürer-Haimendorf, Christoph. Tribes of India: The Struggle for Survival. Berkeley: University of California Press, c1982 1982. http://ark.cdlib.org/ark:/13030/ft8r29p2r8/
[4] PESA – 1996, S. S. Mahali, available at https://www.ssmahali.com/pesa, Last visited on 7.12.2025
[5] 70 साल बाद उम्मीदों पर कितना खरा उतरा भारतीय संविधान, अचिन विनायक, Carwan Magazine Hindi, दि. 08 June, 2019, available at https://caravanmagazine.in/reportage/does-constitution-keep-promises-hindi, Last visited on 7.12.2025
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