संविधान सभा की बैठक – 9.12.1946 भाग 2

भाग 1

  1. संविधान सभा के प्रतिनिधियों का चुनाव वयस्क मताधिकार के द्वारा किया जाए ऐसा नियम भी कॉंग्रेस की कार्यकारी समिति ने नवेंबर 1939 मे घोषित किया था।
  2. मार्च 1940 में पाकिस्तान प्रस्ताव (लाहौर प्रस्ताव) पारित होने तक, मुस्लिम लीग संविधान निर्माण के लिए एक संयुक्त संविधान सभा (Constituent Assembly) के विचार का विरोध करती थी। उनका मानना था कि हिंदू-बहुल भारत में मुस्लिम हितों की रक्षा नहीं होगी।
  3. पाकिस्तान प्रस्ताव पारित होने के बाद, मुस्लिम लीग ने दो अलग-अलग संविधान सभाओं की मांग शुरू की: पहली पश्चिमी भारत (मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों) के लिए एक संविधान सभा और दूसरी बाकी भारत (हिंदू-बहुल क्षेत्रों) के लिए दूसरी संविधान सभा। पहली सभा मे केवल मुस्लिम बहुल क्षेत्र के प्रतिनिधि होंगे और दूसरी सभा मे हिन्दू बहुल क्षेत्र के प्रतिनिधि होंगे, ऐसा इसका अर्थ लिया जा सकता हैं, पर मुस्लिम लीग की इस मांग का अर्थ केवल देश के विभाजन से ही जुड़ा हैं। इसके विपरीत काँग्रेस ने एकल संविधान सभा पर जोर दिया, जिसमे सभी समुदायों के प्रतिनिधि होंगे, पर कॉंग्रेस के प्रस्ताव को बार बार मुस्लिम लीग ने अस्वीकृत किया था।
  4. मुस्लिम लीग 1940 से ही परोक्ष रूप से एकल संविधान सभा का विरोध कर रही थी, फिर भी संविधान सभा की कार्यवाही को मुस्लिम लीग के सदस्यों के लिए धीमा करने का प्रयास अन्य भारतीय दलों के प्रतिनिधियों ने ही किया जिसमे अधिकतर हिन्दू प्रतिनिधि ही थे। भले ही 16 अगस्त 1946 के दिन डायरेक्ट एक्शन डे के माध्यम से मुस्लिम लीग ने इस बात का संदेश दे दिया था की उन्हे मुसलमानों का अलग देश चाहिए अगर नहीं मिला तो कत्लेआम होगा, फिर भी दिसंबर 1946 मे आयोजित संविधान सभा के पहले अधिवेशन मे बहुत सारा मूल्यवान समय मुस्लिम लीग को वापस सभा मे आने के लिए मौका देने के नाम पर व्यर्थ किया गया, जिसकी वास्तविकता मे कोई आवश्यकता ही नहीं थी।
  5. मुस्लिम लीग के दो संविधान सभाओं वाली मांग ने ब्रिटिश सरकार को यह भरोसा दिला दिया था की इस देश मे एक संविधान सभा नहीं होगी और न ही एक संविधान बनेगा, इसीलिए 1946 में कैबिनेट मिशन योजना के तहत दो संविधान सभाएँ (हिंदू-बहुल और मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए) गठित की गईं, लेकिन यह योजना विफल रही। भले ही योजना विफल रही फिर भी अंग्रेजों के विभाजन की नीति को मुस्लिम लीग की जिद ने सफल कर दिया और इस देश के दो टुकड़े होंगे ऐसा चित्र 1946 मे ही निर्माण हो गया था।
  6. सप्रू कमिटी ने भी अपनी रिपोर्ट मे 1945 मे ये दावा किया था की भारत का संविधान केवल संविधान सभा द्वारा ही बनाया जा सकता हैं।
  7. ब्रिटिश कैबिनेट मिशन की योजना के अनुसार जो संविधान सभा बनी उसकी पहली बैठक 9 दिसम्बर 1946 को आयोजित की गई थी। यह योजना कॉंग्रेस और लीग के सुझावों से अलग थी, पर लंबे समय से चल रहे राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के लिए अन्य राजनीतिक दलों एवं आम लोगों ने इस योजना को स्वीकार कर लिया था। भले ही कुछ मामलों मे ब्रिटिश कैबिनेट मिशन की योजना विवादास्पद थी, पर देश की स्वतंत्रता के लिए एवं सत्ता हस्तांतरण के लिए इस योजना के अनुसार काम शुरू किया गया था, जो उस समय की मांग थी।
  8. डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा ने अपने भाषण का समापन, कवि इकबाल की पक्तियों से किया था। ये वही कवि जिसने पहले “सारे जहा से अच्छा हिन्दुस्ता हमारा” जैसी कविता लिखकर एक अखंड देश का वर्णन किया था और बाद मे “मुस्लिम है हम वतन हैं …” यह अलग मुस्लिम देश को बढ़ावा देने वाली और अन्य गैर-मुस्लिम मान्यताओं का विरोध करने वाली कविता लिखी थी।[1] और हम भारतीय विभाजन के घाव भूलकर इकबाल के गीतों को गाए बिना नहीं रहते। “मुस्लिम है हम वतन हैं …” यह कविता अपने आप मे पूरी दुनिया पर मुस्लिम राज की बात करती हैं, फिर चाहे इसके लिए खून क्यू न बहाना पड़े। माना जो अच्छा है वो हमने अपनाना चाहिए पर ये बात भी गलत हैं की हम गलत व्यक्ति के शब्दों का उपयोग हमारे देश के वर्णन के लिए करे। देश मे क्या अन्य कवि, लेखक नहीं हैं जिनका लिखा हुआ इस देश का उचित वर्णन करे?
  9. सभा का काम बिना रुके चलते रहे इसके लिए डॉ. सिन्हा ने फ्रैंक एंथनी को सभा का उपाध्यक्ष घोषित किया।
  10. बंगाल प्रांत से नियमानुसार चुने गए सदस्य प्रसन्नदेव राइकूट का निधन सभा का अधिवेशन शुरू होने के पहले हुआ था।
  11. उस दिन संविधान सभा के समक्ष सभी प्रांतों से आए 203 प्रतिनिधियों ने अपना परिचय-पत्र दाखिल किया और रजिस्टर पर हस्ताक्षर कीये थे।

[1] तराना-ए-मिल्ली, अल्लामा इक़बाल

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