- 9 दिसंबर 1946 के दिन संविधान सभा की पहली बैठक आयोजित की गई थी। यह बैठक संविधान सभागृह, नई दिल्ली मे आयोजित की गई थी। सबेरे 11 बजे बैठक शुरू हुई।
- संविधान सभा के अस्थायी सभापती – सयुक्त प्रांत के प्रतिनिधि आचार्य जे. बी. कृपलानी ने सभा की शुरुवात अपने भाषण से की और उन्होंने सभा के अस्थायी सभापती डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को घोषित किया।
- डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा पुराने कॉंग्रेसी थे। 1920 तक वे कॉंग्रेस के सदस्य थे और एक बार वे कॉंग्रेस के सचिव (सेक्रेटरी) भी रह चुके हैं। 1910 से 1920 के बीच वे साम्राज्यीय विधायी परिषद (इम्पीरीअल लेजिस्लेटिव कौंसिल) के सदस्य थे। 1921 मे वे केन्द्रीय विधायी परिषद (सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली) के सदस्य बने और बाद मे उसके अध्यक्ष के रूप मे भी उन्होंने काम किया था। उस समय उन्हे बिहार और ओरिसा राज्य की सरकार मे कार्यकारी सलाहकार (इग्ज़ेक्यटिव कौनसेलेर) एवं वित्त सदस्य (फाइनैन्स मेम्बर) का भी पद दिया गया था। आठ साल तक वे पटना विश्वविद्यालय (यूनिवर्सिटी) के कुलपति (वाइस-चांसेलर) भी थे।[1]
- अंग्रेजी शासन के समय इतने महत्त्वपूर्ण पद पर कार्य करने का मौका किसे मिलता था? – ज्यादातर मामलों मे ये सभी पद जिनका कार्यभार डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने संभाला था उनपर ब्रिटिश व्यक्ति या ब्रिटिश नीतियों का समर्थन करने वाले भारतीयों को ही नियुक्त किया जाता था। ब्रिटिश काल मे विविध विश्वविद्यालयों के द्वारा ब्रिटिश मूल्यों को बढ़ावा दिया जाता था। ब्रिटिश नेतृत्व ने भारतीयों को इन पदों पर नियुक्त करके “प्रतिनिधित्व का भ्रम” पैदा किया, ताकि विरोध को कम किया जा सके।[2]
- भारत के संविधान सभा के अधिवेशन के प्रारंभ होने की शुभकामनाए देने वाले तीन पत्र डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने पढ़कर सुनाए। ये पत्र अमेरिका के ऐक्टिंग सेक्रेटरी ऑफ स्टेट; चीन के मिनिस्टर ऑफ फारेन अफेयर्स वांग शी चेन और आस्ट्रेलिया की सरकार द्वारा भेजे गए थे।
- खान अबदूस समद खान की इलेक्शन पिटिशन – ब्रिटिश बलूचिस्तान के प्रतिनिधि के रूप मे नवाब मोहम्मद खान जोगजाई के चुने जाने पर आपत्ति उठानी वाली इलेक्शन पिटिशन उसी प्रांत के खान अबदूस समद खान ने दाखिल की थी। उस पिटिशन पर फैसला आना बाकी था। जबतक किसी भी इलेक्शन पिटिशन का निर्णय नहीं हो जाता तबतक जिस व्यक्ति का चुनाव प्रतिनिधि के रूप मे हुआ हैं वही संविधान सभा का सदस्य रहेगा ऐसा नियम डॉ. सिन्हा ने बताया।
- ब्रिटेन में संविधान सभा की जरूरत इसलिए नहीं पड़ी क्योंकि वहाँ संसद ही संविधान निर्माता भी है और संविधान बदलने वाली भी। भारत जैसी संविधान सभा का कॉन्सेप्ट ब्रिटिश व्यवस्था से नहीं, दूसरे देशों से आया है।
- स्विट्ज़रलैंड के संविधान मे अनेक उपयोगी विशेषताएं हैं इसीलिए संवैधानिक कानून के अनेक अभ्यासकों ने इस संविधान का उपयोग भारतीय संविधान सभा ने अपने विधान निर्माण मे करना चाहिए ऐसी सलाह दी थी। इसीलिए डॉ. सिन्हा ने अपने भाषण मे इस संविधान का बारिकाई से अभ्यास करने की सलाह दी।
- फ्रांस का अनुभव उपयोगी है, पर उसका संविधान बार-बार बदला है इसलिए पूरी तरह भरोसे लायक नहीं। फिर भी फ्रांस की संविधान-निर्माण प्रक्रिया का अध्ययन अवश्य करना चाहिए और जितना भी लाभ हो सके, लेना चाहिए। डॉ. सिन्हा ने आगे फ्रांस के संविधान के विषय मे ये सलाह दी।
- फ्रांस के संविधान निर्माता वास्तविकता मे अमेरिका के संविधान निर्माताओं से प्रभावित थे। अमेरिका का संविधान एक उदात्त विधान हैं, जिसका उपयोग फ्रांस के साथ ही ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के अन्य राज्यों ने एक मोडेल की तरह किया था। इसीलिए अमेरिका के संविधान के प्रावधानों का उचित अभ्यास एवं उपयोग भी किया जाना चाहिए। अमेरिका के संविधान के आधार पर बने कॅनडा के संविधान को ब्रिटिश संसद ने 1867 मे मान्यता डी थी। औसट्रेलिया एवं साउथ अफ्रीका के भी संविधान अमेरिका के संविधान के थोड़ा बहुत अपना लिया था। पूरीतरह अमेरिकन संविधान का अध्ययन कर इस देश की वास्तविक आवश्यकता के अनुसार उन प्रावधानों मे बदलाव करना चाहिए। – डॉ. सिन्हा [3]
- स्वराज ब्रिटिश संसद का मुफ्त तोहफा नहीं होगा। यह भारत की पूर्ण स्वतंत्र इच्छा की अभिव्यक्ति होगी, जो संसद के एक कानून (Act of Parliament) के जरिए घोषित की जाएगी। लेकिन ब्रिटिश संसद उस इच्छा को सिर्फ औपचारिक रूप से मान्यता (ratify) देगी – जैसे कोई संधि (treaty) पर हस्ताक्षर करते हैं। यानी जब समझौता होगा, तो ब्रिटिश संसद भारत के लोगों की इच्छा को सिर्फ स्वीकार करेगी, जो उनके स्वतंत्र रूप से चुने हुए प्रतिनिधियों ने व्यक्त की होगी। – मोहनदास करमचंद गांधी, 1922[4]
- यह सम्मेलन भारत के लिए आत्म-निर्णय के अधिकार (right of self-determination) की मांग करता है। और इस सिद्धांत को लागू करने का एकमात्र तरीका यह है कि भारत के सभी वर्गों के प्रतिनिधियों वाली एक संविधान सभा बुलाई जाए, जो भारत के लोगों को स्वीकार्य संविधान बनाए। – स्वराज्य पार्टी, 1934
- जो नीति ऊपर दिए दोनों वक्तव्यों मे लिखी गई हैं उसे अखिल भारतीय कॉंग्रेस समितिने मई 1934 मे मान्यता दी थी और संविधान सभा के द्वारा भारतीय संविधान के निर्माण की नीति को कॉंग्रेस ने दिसम्बर 1936 मे आयोजित फैजपुर सेशन मे पूर्ण स्वीकृति दे दी थी।
[1] Constituent Assembly Of India Debates (Proceedings)- Volume I Dt. 9.12.1946
[2] भारत में ब्रिटीश साम्राज्य का प्रभाव और उपनिवेशवाद, कौशल सिंह भाटी, November – December 2024 IJIRMPS | ISSN: 2349-7300, Volume 12 Issue 6
[3] Constituent Assembly Of India Debates (Proceedings)- Volume I Dt. 9.12.1946
[4] Ibid
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