पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 10

10.1 मूल प्रावधान

अध्याय 3: पशुओं को परिबद्ध करना

10. भूमि को नुकसान पंहुचाने वाले पशु – किसी भूमि का कृषक या अधिभोगी,

या कोई व्यक्ति जिसने किसी भूमि पर फसल की खेती करने या उपज के लिए नकद उधार दिया है,

या ऐसी फसल या उपज अथवा उसके किसी भाग का क्रेता या बन्धकदार,

ऐसी भूमि पर अतिचार करने वाले और उसको या उस पर की किसी फसल या उपज को नुकसान पहुंचाने वाले किन्हीं पशुओं को अभिगृहीत कर सकेगा या अभिगृहीत करा सकेगा तथा 1[उनको 24 घण्टे के अन्दर] उस कांजी हौस को 1[भेज सकेगा या भिजवा सकेगा] जो उस ग्राम के लिए स्थापित हो जिसमें वह भूमि आस्थित है।

अभिग्रहण करने वाले को पुलिस द्वारा सहायता – पुलिस के सब अधिकारी, अपेक्षित किए जाने पर, (क) ऐसे अभिग्रहण के प्रतिरोध को, और (ख) ऐसे अभिग्रहण करने वाले व्यक्तियों से छुड़ाए जाने को, रोकने में सहायता करेंगे।

मूल प्रावधान की पादटिका

1891 के अधिनियम सं० 1 की धारा 3 द्वारा “उनको अनावश्यक विलम्ब किए बिना ले जाएगा या पंहुचवाएगा” के स्थान पर प्रतिस्थापित।

10.2 विश्लेषणात्मक आलोचना

यह धारा ‘पशुओं को परिबद्ध करना’ अध्याय की शुरुआत करती है और यह परिभाषित करती है कि किन परिस्थितियों में और कौन व्यक्ति अतिचार करने वाले पशुओं को पकड़ सकता है, और उन्हें कहाँ ले जाया जाएगा। अभिग्रहण का अधिकार भूमि का कृषक या अधिभोगी, वित्तदाता, क्रेता, बन्धकदार इत्यादि को दिया गया था। भूमि का कृषक या अधिभोगी अर्थात वह व्यक्ति जो भूमि की खेती करता है या उस पर कानूनी कब्जा रखता है। वित्तदाता/क्रेता/बन्धकदार अर्थात वह व्यक्ति जिसने फसल उगाने के लिए नकद उधार दिया है, या जिसने फसल या उसके किसी भाग को खरीदा है, या जिसने उसे गिरवी रखा है। इनमें से कोई भी व्यक्ति उन पशुओं को पकड़ सकता है या पकड़वा सकता है जो उनकी भूमि पर अतिचार कर रहे हैं और उस भूमि, फसल या उपज को नुकसान पहुँचा रहे हैं। यह उस समय के गरीब भारतीय किसानों और चरवाहों के विरुद्ध धनी साहूकारों और ज़मींदारों को कानूनी हथियार सौंपने जैसा था। इस कारण धनवान और गरीब भारतीयों मे आपसी रंजिश भी निर्माण होने लगी थी और विभाजन आर्थिक स्तर के अनुसार होने लगा था। गोरों ने आर्थिक स्तर के आधार पर बोया हुआ जहर आज भी भारतीय समाज को खोखला कर रहा हैं। निश्चित ही गोरों के पास विलक्षण कुटिल बुद्धी थी।

ज़ब्त किए गए पशुओं को पकड़ने वाले को 24 घंटे के भीतर उस कांजी हौस में भेजना या भिजवाना अनिवार्य था जो उस गाँव के लिए स्थापित किया गया है जहाँ वह भूमि स्थित है। अभिग्रहण करने वाले को पुलिस की सहायता भी प्राप्त होती थी जिससे ज़ब्ती के दौरान कोई प्रतिरोध न हो और पकड़े गए पशुओं को किसी व्यक्ति द्वारा छुड़ाया न जा सके। यह सुनिश्चित करता था कि ज़ब्ती की प्रक्रिया में कोई भी प्रतिरोध न हो और पशुपालकों द्वारा पशुओं को छुड़ाने के किसी भी प्रयास को कानूनी बल द्वारा कुचला जा सके। इस प्रावधान ने ब्रिटिश प्रशासन की शक्ति को सीधे तौर पर निजी संपत्ति मालिकों और पूंजीपतियों के पक्ष में खड़ा कर दिया। यदि कोई गरीब पशुपालक अपने पशुओं को अन्यायपूर्ण ज़ब्ती से बचाने की कोशिश करता था, तो उसका सामना स्थानीय अभिग्रहणकर्ता से नहीं, बल्कि पूरी औपनिवेशिक पुलिस व्यवस्था से होता था। यह स्थिति गरीब भारतीयों के लिए न्याय तक पहुँच को लगभग असंभव बना देती थी और एक प्रकार का संरचित अत्याचार था और विभाजन भी था।

10.3 संशोधन हेतु सुझाव

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 10 पर विश्लेषणात्मक आलोचना यह बताती हैं कि कैसे अंग्रेजों ने “पुलिस सहायता” और “24 घंटे की मोहलत” का उपयोग करके ग्रामीण भारत में धनी साहूकारों को गरीब पशुपालकों के विरुद्ध एक दमनकारी शक्ति के रूप में खड़ा कर दिया था। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:

1) कलोनीअल नीति का अंत

ब्रिटिश काल में यह धारा केवल संपत्ति के मालिकों और वित्तदाताओं के हितों की रक्षा करती थी। नए अधिनियम में इस पक्षपातपूर्ण ढांचे को समाप्त कर ‘न्यायसंगत संतुलन’ की नीति अपनानी चाहिए। पशु पकड़ने का अधिकार केवल नुकसान की स्थिति में होना चाहिए, न कि केवल शत्रुता निकालने के लिए। साहूकारों और बंधकदारों को सीधे पशु पकड़ने की शक्ति देना आर्थिक दमन को बढ़ावा देता है, जिसे अब पूरी तरह समाप्त किया जाना चाहिए।

2) संविधान के साथ अनुरूपता

पुलिस का उपयोग केवल दमन के लिए करना अनुच्छेद 21 और 14 के विरुद्ध है। नए कानून में प्रावधान होना चाहिए कि पुलिस की भूमिका केवल शांति व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित हो। पशु पकड़ने की प्रक्रिया में ‘शक्ति प्रदर्शन’ के बजाय मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाए, जो अनुच्छेद 51A (g) के तहत पशुओं के प्रति दयाभाव के संवैधानिक कर्तव्य को पूरा करे।

3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता

ग्रामीण क्षेत्रों में यह कानून फसलों की सुरक्षा सुनिश्चित करे, लेकिन शहरी क्षेत्रों में इसका विस्तार सार्वजनिक स्थानों और आवासीय सोसायटियों तक होना चाहिए। शहरों में यदि कोई पशु किसी के निजी परिसर या सार्वजनिक पार्क में नुकसान पहुंचाता है, तो उसे पकड़ने का अधिकार स्थानीय निवासी या सुरक्षाकर्मी को होना चाहिए, परंतु 24 घंटे के बजाय उसे ‘तत्काल’ (अधिकतम 2-4 घंटे में) सूचित और स्थानांतरित करना अनिवार्य हो।

4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार

पशु पकड़ने के बाद उसे सीधे कांजी हौस भेजने के बजाय, पहली सूचना स्थानीय ग्राम पंचायत या वार्ड समिति को दी जानी चाहिए। स्थानीय संस्थाएं यह सुनिश्चित करेंगी कि पशु को वास्तव में नुकसान पहुँचाने के कारण पकड़ा गया है या आपसी रंजिश के कारण। इससे अनावश्यक मुकदमों और पुलिस के हस्तक्षेप में कमी आएगी।

5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन

धारा 10 के तहत पशु पकड़ने वाले और पशु मालिक के बीच सुलह समिति का हस्तक्षेप अनिवार्य किया जाना चाहिए। 1996 के अधिनियम के सिद्धांतों का पालन करते हुए, समिति यह तय करेगी कि क्या नुकसान की भरपाई आपसी बातचीत से हो सकती है। इससे पशु को कांजी हाउस भेजने की नौबत ही नहीं आएगी और सामाजिक समरसता बनी रहेगी।

6) जब्त पशुओ का कल्याण

24 घंटे की समय सीमा का उपयोग अक्सर पशुओं को भूखा रखने के लिए किया जाता था। नए कानून में यह अनिवार्य होना चाहिए कि पशु को पकड़ने के पहले घंटे के भीतर पानी और चारा दिया जाए। यदि 24 घंटे के भीतर पशु को कांजी हौस नहीं पहुँचाया जाता या उस दौरान उसकी देखभाल में लापरवाही होती है, तो पकड़ने वाले व्यक्ति पर ही दंड लगाया जाना चाहिए।

7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी

अतिचार करने वाले पशु यदि आवारा हैं, तो उन्हें पकड़ने की जिम्मेदारी केवल पीड़ित व्यक्ति की नहीं, बल्कि स्थानीय निकाय की होनी चाहिए। ऐसे पशुओं को सीधे टीकाकरण और नसबंदी केंद्रों पर भेजा जाना चाहिए ताकि उनकी आबादी का वैज्ञानिक प्रबंधन हो सके और भविष्य में अतिचार की घटनाएं कम हों। इसके लिए ऐसे केंद्र की स्थापना का अधिकार स्थानीय निकाय को दिया जाना चाहिए अथवा हर साल आवारा पशु टीकाकरण एवं नसबंदी का कार्यक्रम लेने का अधिकार दिया जाना चाहिए। इतने आवारा पशुओ को भलेही सरकार आवास नहीं दे सकती हो परंतु उनकी गिनती एवं टैग लगाकर उनका एक परिचय डाटाबेस बना सकती हैं। इससे उनके लिए आवश्यक टीकाकरण एवं नसबंदी करना तथा उनकी आवश्यकता के अनुसार चिकित्सीय देखभाल करना सरल हो जाएगा।

8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति

आवासीय क्षेत्रों में पालतू जानवरों द्वारा किए गए नुकसान के मामलों में क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया त्वरित होनी चाहिए। यदि किसी पालतू पशु ने हमला किया है या संपत्ति को नुकसान पहुँचाया है, तो रसीद या साक्ष्य के आधार पर मालिक को उत्तरदायी ठहराकर पीड़ित को तत्काल हर्जाना दिलवाया जाना चाहिए। स्थानीय निकाय एवं 1996 के कानून के अनुसार गठित समिति ऐसे मामलों मे तुरंत निपटारा करे।

9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए

पुलिस की सहायता केवल तभी ली जाए जब हिंसक विरोध की आशंका हो। सामान्यतः, पशु पकड़ने और ले जाने की प्रक्रिया में स्थानीय ‘पशु मित्रों’ की उपस्थिति अनिवार्य होनी चाहिए। पशु मित्र यह सुनिश्चित करेंगे कि पशु के साथ कोई क्रूरता न हो और उसे सुरक्षित वाहन में कांजी हौस पहुँचाया जाए।

10) आधुनिकीकरण

पशु पकड़ने की घटना का वीडियो साक्ष्य (Video Evidence) अनिवार्य होना चाहिए ताकि बाद में झूठे आरोपों से बचा जा सके। जैसे ही पशु पकड़ा जाए, मोबाइल ऐप के माध्यम से उसका फोटो और स्थान पोर्टल पर अपलोड हो जाना चाहिए। इससे ‘अज्ञात मालिक’ के बहाने पशु को गायब करने या बेचने की घटनाओं पर रोक लगेगी।

11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर

पशुओं को सुरक्षित रूप से पकड़ने और स्थानांतरित करने के लिए प्रशिक्षित ‘एनिमल हैंडलिंग स्क्वाड’ का गठन किया जा सकता है। इसमें स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण देकर रोजगार दिया जाए। यह दस्ता न केवल किसानों की मदद करेगा, बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी पेशेवर तरीके से पशु प्रबंधन का कार्य करेगा। अगर पशु प्रेमी युवाओं को सरकार स्वयं रोजगार देंगी तो इस कार्य को एक सम्माननिय आजीविका की तरह लोग देखने लगेंगे।


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1 thought on “पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 10”

  1. Email भेजो भाई जल्दी जल्दी। मैने भेज दिया है।

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