6.1 मूल प्रावधान
1[6. कांजी हौस रखवालों की नियुक्ति। कांजी हौस रखवाले अन्य पदों को धारण कर सकेंगे। कांजी हौस रखवालों का लोक सेवक होना राज्य सरकार प्रत्येक कांजी हौस के लिए एक कांजी हौस रखवाला नियुक्त करेगी। कोई कांजी हौस रखवाला एक ही समय पर सरकार के अधीन कोई अन्य पद धारण कर सकेगा। प्रत्येक कांजी हौस रखवाला भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा ।]
मूल प्रावधान की पादटिका
1. भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा धारा 6 के स्थान पर प्रतिस्थापित।
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6.2 सरल अर्थ
इस धारा के तीन मुख्य बिंदु हैं, जो इसकी प्रशासनिक संरचना को स्पष्ट करते हैं:
नियुक्ति:
यह व्यवस्था करती है कि प्रांतीय सरकार, आज के समय मे राज्य सरकार प्रत्येक कांजी हौस के लिए एक व्यक्ति को कांजी हौस रखवाला के रूप में नियुक्त करेगी। यह एक केंद्रीकृत नियुक्ति प्रक्रिया थी। इस पद के लिए उन्हे ही मौका मिलता था जो अंग्रेजी शासन द्वारा मान्यताप्राप्त पाठशालाओं से पढ़ाई कर चुके थे। स्थानीय गुरुकुलों से शिक्षित लोगों को अंग्रेज कभी भी कोई सरकारी पद पर नियुक्त नहीं करते थे, इसके कारण गुरुकुलों मे लोगों ने अपने बालकों का दाखिला करना कम कर दिया था। इस तरह भारत की शिक्षा व्यवस्था पर भी उन्होंने आघात किया था।
अन्य पद पर नियुक्ति:
कांजी हौस रखवाले को यह अनुमति दी गई थी कि वह एक ही समय में सरकार के अधीन कोई अन्य पद भी धारण कर सकता था। इसका अर्थ है कि यह काम जरूरी नहीं कि पूर्णकालिक हो, और सरकार अपने संसाधनों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने के लिए एक ही व्यक्ति को दोहरी जिम्मेदारी दे सकती थी। कांजी हौस जहा पशुओं को जब्त कर बांधकर रखा जाता था, उसकी देखरेख और पशुओं को समय समय पर खिलाना और पाणी पिलाना यह वास्तविकता मे पूर्णकालिक कार्य हैं, पर गोरों की नजर मे पशुओं की देखभाल उतनी मायने ही नहीं रखती थी।
ब्रिटिश प्रशासन कम वेतन वाले स्थानीय लोगों को नियुक्त करते थे जो पहले से ही किसी अन्य पद पर थे, जैसे ग्राम चौकीदार या पटवारी, और उन्हें कांजी हौस की अतिरिक्त जिम्मेदारी दे देते थे। ऐसे मे ये रखवाले अपनी मर्जी से जो काम इन्हे जरूरी लगेगा दोनों पदों मे से वो पहले कर सकते थे और बाद मे कांजी हौस के काम कर सकते थे। कई बार तो अन्य पद के भार का बहाना बना कर गरीब पशुपालक को कई दिनों तक उसके पशु न देने का भी प्रयास किया जाता था, जिससे जुर्माने की रकम बढ़ती जाए। कई बार ये अंग्रेजों की नौकरी करने वाले रखवाले अपनी व्यक्तिगत शत्रुता भी गरीब पशुपालकों पर इसके माध्यम से निकालते थे। चूँकि इन रखवालों का वेतन अक्सर कम होता था और उनके पास अतिचार के मामलों में पशुपालकों को परेशान करने की शक्ति होती थी, वे आसानी से भ्रष्टाचार या जबरन वसूली में लिप्त हो सकते थे। ऐसे ही ब्रिटिश नीतियों ने इस देश मे भ्रष्टाचार को एक आवश्यक प्रक्रिया बना दिया हैं। इसीलिए हर ब्रिटिश पॉलिसी को कानूनों से निकालना चाहिए तभी देश का भ्रष्टाचारमुक्त होना संभव हैं।
लोक सेवक की कानूनी स्थिति:
प्रत्येक कांजी हौस रखवाला भारतीय दण्ड संहिता (Indian Penal Code), 1860 के अर्थ में लोक सेवक (Public Servant) समझा जाता था। यह पदनाम उसे कानूनी संरक्षण और विशिष्ट शक्तियाँ प्रदान करता था। रखवाले को ‘लोक सेवक’ का दर्जा देने से वह सरकार के कानूनी ढांचे के अंतर्गत आ जाता था। इस दर्जे ने उसे मवेशियों को ज़ब्त करने, शुल्क वसूलने और ज़ब्ती का विरोध करने वालों के साथ कानूनी बल का उपयोग करने का अधिकार दिया। गरीब ग्रामीण और पशुपालक इस ‘लोक सेवक’ से डरते थे क्योंकि उसके पास सरकार का कानूनी समर्थन था। यह स्थिति मामूली सरकारी अधिकारियों द्वारा छोटी-छोटी शक्तियों का दुरुपयोग करने की औपनिवेशिक व्यवस्था को बढ़ावा देती थी, जो ग्रामीण स्तर पर उत्पीड़न का कारण बनता था।
6.3 संशोधन हेतु सुझाव
पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 6 का विश्लेषण के अनुसार एक व्यक्ति को ‘दोहरी जिम्मेदारी’ देकर पशुओं की उपेक्षा को वैधानिक बनाया गया और ‘लोक सेवक’ का दर्जा देकर उसे दमन का कवच प्रदान किया गया। प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:
1) कलोनीअल नीति का अंत
ब्रिटिश काल में रखवाले को ‘लोक सेवक’ का दर्जा इसलिए दिया गया था ताकि वह सरकारी संरक्षण में जनता का शोषण कर सके। नए अधिनियम में इस पद को ‘दंडात्मक’ के बजाय ‘सेवा’ उन्मुख बनाया जाना चाहिए। नियुक्तियों में स्थानीय शैक्षिक योग्यताओं और पशु-संवेदनशीलता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, न कि केवल सरकारी वफादारी को। भ्रष्टाचार के इस युग मे सरकारी वफादारी की उम्मीद भी गलत हैं।
2) संविधान के साथ अनुरूपता
एक लोक सेवक को असीमित शक्तियां देना और उसे जवाबदेही से मुक्त रखना अनुच्छेद 14 और 21 के विरुद्ध है। नया अधिनियम यह सुनिश्चित करे कि यदि कोई रखवाला अपने पद का दुरुपयोग कर किसी पशु या नागरिक को प्रताड़ित करता है, तो उसके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्यवाही हो। लोक सेवक होने का अर्थ ‘जनता का स्वामी’ नहीं बल्कि ‘पशु और जनता का रक्षक’ होना चाहिए।
3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कांजी हौस रखवाले का पद एक पूर्णकालिक ‘पशु कल्याण अधिकारी’ का होना चाहिए। उसे पशुओं के व्यवहार, शहरी सुरक्षा और पशु-क्रूरता निवारण नियमों का ज्ञान होना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में इस पद को पंचायतों के अधीन रखा जाना चाहिए ताकि नियुक्ति और निगरानी दोनों स्थानीय स्तर पर हो सकें।
4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार
रखवाले की नियुक्ति और उसके कार्य प्रदर्शन की समीक्षा का अधिकार जिला मजिस्ट्रेट के बजाय स्थानीय ग्राम पंचायत या वार्ड समिति के पास होना चाहिए। यदि रखवाला पशुओं को देने में जानबूझकर देरी करता है या व्यक्तिगत दुश्मनी निकालता है, तो स्थानीय संस्थाओं को उसे निलंबित करने या जुर्माना लगाने का अधिकार होना चाहिए।
5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन
रखवाले की भूमिका केवल पशु को बांधने तक सीमित न हो। वह सुलह समिति के एक सहायक के रूप में कार्य करे, जो पशु मालिक और शिकायतकर्ता के बीच संवाद की पहली कड़ी बने। 1996 के अधिनियम के ढांचे के भीतर, रखवाले को विवादों को बढ़ाना नहीं बल्कि उन्हें सुलझाने में मदद करने वाला मध्यस्थ बनाया जाए।
6) जब्त पशुओ का कल्याण
पशुओं की देखभाल एक पूर्णकालिक जिम्मेदारी है। नए कानून में स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए कि रखवाले का प्राथमिक कार्य पशुओं का स्वास्थ्य और पोषण सुनिश्चित करना है। यदि कोई रखवाला किसी अन्य सरकारी पद पर है, तो उसे पशु कल्याण की जिम्मेदारी से मुक्त रखा जाना चाहिए ताकि पशुओं की उपेक्षा न हो। ‘दोहरी जिम्मेदारी’ के नाम पर पशुओं को भूखा रखना कानूनी अपराध माना जाना चाहिए।
7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी
आधुनिक रखवाले को केवल ‘पहरेदार’ नहीं बल्कि ‘पशु स्वास्थ्य समन्वयक’ होना चाहिए। उसका दायित्व होगा कि वह पशु चिकित्सकों के साथ समन्वय कर आवारा पशुओं का टीकाकरण और नसबंदी का रिकॉर्ड रखे। इस कार्य के लिए उसे विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। रखवाले इस काम को करते रहे इसके लिए कुछ न कुछ प्रोत्साहन भी दिया जाना चाहिए।
8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति
आवासीय क्षेत्रों में रखवाले की जिम्मेदारी होगी कि वह हमले के बाद जब्त किए गए पशु की सटीक रिपोर्ट तैयार करे। उसकी यह रिपोर्ट क्षतिपूर्ति तय करने में एक महत्वपूर्ण साक्ष्य (Evidence) बनेगी, जिससे पीड़ित को न्याय मिलने में देरी नहीं होगी।
9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए
रखवाले को अकेले कार्य करने के बजाय ‘पशु मित्रों’ के साथ मिलकर काम करना चाहिए। पुलिस का हस्तक्षेप केवल तभी हो जब कानून-व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो। पशु मित्रों की मौजूदगी भ्रष्टाचार पर लगाम लगाएगी और यह सुनिश्चित करेगी कि रखवाला अपनी शक्तियों का दुरुपयोग न करे। पशु मित्र आगे आकार इस कानून के तहत जो भी कार्य हैं वो करें इसके लिए उचित प्रोत्साहन उन्हे भी दिया जाना चाहिए। प्रोत्साहन मिलने पर अन्य युवा भी इस काम को एक अच्छे व्यवसाय के रूप मे देख सकेंगे।
10) आधुनिकीकरण
रखवाले के सभी कार्यों को डिजिटल किया जाना चाहिए। पशु की जब्ती से लेकर उसकी वापसी तक का सारा डेटा उसे एक मोबाइल ऐप पर दर्ज करना अनिवार्य हो। ‘लोक सेवक’ के रूप में उसकी जवाबदेही को बायोमेट्रिक उपस्थिति और डिजिटल लॉगबुक के माध्यम से पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। यह सभी जानकारी जनता को भी देखने हेतु सार्वजनिक हो।
11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर
कांजी हौस रखवाले के पद को एक सम्मानित ‘व्यावसायिक पद’ बनाया जाए। इसके लिए पशुपालन में डिप्लोमा या डिग्री धारक स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता दी जाए। इससे हजारों शिक्षित युवाओं को अपने ही क्षेत्र में ‘पशु प्रबंधन’ के क्षेत्र में गरिमापूर्ण रोजगार मिलेगा और सरकारी भ्रष्टाचार कम होगा। आधुनिकीकरण के लिए जो पोर्टल एवं एप बनाया जाएगा उसके प्रबंधन, व्यवस्थापन एवं रखरखाव के लिए भी कई युवाओं को रोजगार मिल सकेगा।
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