पशु अतिचार अधिनियम, 1871: विश्लेषणात्मक आलोचना

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 देश मे अभी भी लागू हैं। भले ही इससे जुड़े मामले अब राज्य सरकारों द्वारा बनाए गए प्रावधानों के आधार पर चल रहे है, लेकिन फिर भी इस कानून का विरोधाभास कही न कही न्याय की प्रक्रिया की गती कम कर देता हैं। इस अध्याय मे इस कानून के हर प्रावधान की विश्लेषणात्मक आलोचना की गई हैं। जैसे की यह कानून अंग्रेजों की पार्लियामेंट ने इस देश पर लागू किया था और इसमे समय समय पर मुख्य संशोधन भी 1947 के पहले ही किए गए थे, और स्वतंत्र भारत मे भी इस कानून मे संविधान के अनुसार कोई खास संशोधन नहीं हुए हैं, इसीलिए इस कानून के हर प्रावधान की आलोचना ब्रिटिश नीतियों को ध्यान मे रख कर ही की गई हैं।

कृपया इस ब्रिटिश कालीन कानून को निरस्त करने हेतु नीचे दिए लाल बटन को प्रेस करिए। अपना मेल एप एवं अकाउंट सिलेक्ट करिए, मेल अपने आप टाइप होकर आ जाएगा। आपको केवल सेन्ड करना हैं।

ब्रिटिश नीतियाँ बड़ी ही कुटिल थी और ये कानून देश की जनता को न धर्म के आधार पर, न जाती के आधार पर, और न ही प्रांत एवं भाषा के आधार पर बाट रहा था, अपितु ये उससे भी ज्यादा कुटिल था और ये लोगों को आर्थिक स्तर के आधार पर बाट रहा था। इस विभाजन के बीज आज जहरीली बेल बनकर पूरे समाज को विखंडित कर रही हैं और ये विभाजन आर्थिक स्तर के आधार पर दो भाइयों के बीच भी हो रहा हैं। यह केवल विभाजन नहीं था, यह समाज मे विद्वेष बढ़ाने का एक ऐसा उपकरण था जो आज भी काम कर रहा हैं। भारत जैसे समाजवादी देश मे इस कानून का कोई औचित्य है ही नहीं। केवल संविधान की प्रस्तावना मे “समाजवादी” इस शब्द को डाल देने से देश नहीं बदलता, उन कानूनों को भी निरस्त करना पड़ता हैं जो समाजवाद के लिए घातक हैं। ऐसे ही असमाजवादी कानूनों मे से एक हैं पशु अतिचार अधिनियम, 1871। आइए इसके हर प्रावधान मे छिपी ब्रिटिश नीतियों को समझते हैं।

पशु अतिचार अधिनियम, 1871: धारा 1

1.1 मूल प्रावधान

पशु अतिचार अधिनियम, 1871

(1871 का अधिनियम संख्यांक 1)1 [13 जनवरी, 1871]

पशुओं द्वारा अतिचार से संबद्ध विधि को समेकित और संशोधित करने के लिए अधिनियम

उद्देशिकायतः पशुओं द्वारा अतिचार से संबद्ध विधि को समेकित और संशोधित करना समीचीन है;

अतः एतद्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है:-

अध्याय 1: प्रारम्भिक

2[1. नाम और विस्तार (1) यह अधिनियम पशु अतिचार अधिनियम, 1871 कहा जा सकेगा; और

(2) इसका विस्तार, 3[उन राज्यक्षेत्रों] के सिवाय 3[जो 1956 के नवम्बर के प्रथम दिन से ठीक पूर्व भाग ख राज्यों में समाविष्ट थे] और प्रेसिडेंसी नगरों तथा ऐसे स्थानीय क्षेत्रों के सिवाय जिन्हें राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा समय-समय पर इसके परिवर्तन से अपवर्जित करे, सम्पूर्ण भारत पर है।

4

मूल प्रावधान की पादटिका

1. यह अधिनियम स्थानीय रूप से निम्नलिखित में संशोधित किया गया:-

1954 के अजमेर अधिनियम सं० 5 द्वारा अजमेर में;

1936 के असम अधिनियम सं० द्वारा असम में

1924 के मुम्बई अधिनियम सं० 9, 1926 के मुम्बई अधिनियम सं० 4, 1931 के मुम्बई अधिनियम सं० 5 और 1959 के मुम्बई अधिनियम सं० 13 द्वारा मुम्बई में;

1935 के मध्य प्रान्त अधिनियम सं० 12, 1937 के मध्य प्रान्त अधिनियम सं० 22, 1948 के मध्य प्रान्त और बरार अधिनियम सं० 27 और 1960 के मध्य प्रदेश अधिनियम सं० 11 द्वारा मध्य प्रदेश में;

1948 के उड़ीसा अधिनियम सं० 15 और 1950 के उड़ीसा अधिनियम सं० 23 द्वारा उड़ीसा में;

1952 के पंजाब अधिनियम सं० 24 और 1959 के पंजाब अधिनियम सं० 18 द्वारा पंजाब में;

1939 के उड़ीसा अधिनियम सं० 6 द्वारा सम्बलपुर जिले में;

1954 के उत्तर प्रदेश अधिनियम सं० 7 द्वारा उत्तर प्रदेश में;

1934 के बंगाल अधिनियम सं० 5 द्वारा पश्चिम बंगाल में और 1947 के बंगाल अधिनियम सं० 14, 1948 के पश्चिम बंगाल अधिनियम सं० 7 और 1956 के पश्चिम बंगाल अधिनियम सं० 4 द्वारा पश्चिम बंगाल में भागतः निरसित किया गया।

1957 के मद्रास अधिनियम सं० 20 द्वारा मद्रास में;

1961 के आन्ध्र प्रदेश अधिनियम सं० 3 द्वारा आन्ध्र प्रदेश में;

1974 के हिमाचल प्रदेश अधिनियम सं० 7 द्वारा हिमाचल प्रदेश में;

1958 के मध्य प्रदेश अधिनियम सं० 23 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से) सम्पूर्ण मध्य प्रदेश को, 1960 के विनियम सं० 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा कुछ उपान्तरणों सहित (1-11-1960 से) नेफा को इस अधिनियम का विस्तारण किया गया तथा 1963 के विनियम सं० 6 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (1-7-1965 से) दादरा और नागर हवेली को तथा 1965 के विनियम सं० 8 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा (1-10-1967 से) संपूर्ण लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र पर यह अधिनियम विस्तारित और प्रवृत्त किया गया।

अधिनियम 1-10-1963 से पांडिचेरी में प्रवृत्त हुजा, देखिए 1963 का विनियम सं० 7 की धारा 3 और अनुसूची 1।

यह अधिनियम 1955 के मैसूर अधिनियम सं० 5 द्वारा बेलारी जिले को और 1961 के केरल अधिनियम सं० 26 द्वारा केरल के मालाबार जिले को लागू होना निरसित किया गया।

2. 1891 के अधिनियम सं० 1 की धारा। द्वारा मूल धारा 1 के स्थान पर प्रतिस्थापित।

3. विधि अनुकूलन (सं० 2) आदेश, 1956 द्वारा “भाग व राज्यों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।

4. 1914 के अधिनियम सं० 10 की धारा 3 तथा अनुसूची 2 द्वारा उपधारा (3) निरसित।

1.2 विश्लेषणात्मक आलोचना

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 एक पुराना भारतीय कानून है, जिसका मुख्य उद्देश्य पशुओं द्वारा अतिचार यानी किसी की संपत्ति या फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले पालतू जानवरों के मामलों को नियंत्रित करने वाले नियमों को व्यवस्थित और बेहतर बनाना था। यह अधिनियम 13 जनवरी, 1871 को लागू किया गया था। इस कानून का नाम ही ‘पशु अतिचार अधिनियम, 1871’ है।

पशु अतिचार अधिनियम, 1871, स्पष्ट रूप से ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन की नीतियों और प्राथमिकताओं का परिणाम था, जिसका प्रभाव इस कानून के निर्माण और विस्तार दोनों पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यह अधिनियम सीधे तौर पर ब्रिटिश शासन की भूमि राजस्व संग्रह और नकद फसलों को बढ़ावा देने की नीति से जुड़ा हुआ था। ब्रिटिश सरकार के लिए कृषि भूमि की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे उनका राजस्व आता था।

कानून ने मवेशियों के अतिचार करने पर उनके मालिकों पर जुर्माना लगाने और मवेशियों को ज़ब्त करने का प्रावधान किया, जिससे पशुपालकों पर नियंत्रण बना रहा और फसलों को नुकसान होने से रोका जा सका। इससे यह सुनिश्चित किया गया कि कृषि गतिविधियाँ, जो ब्रिटिश अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण थीं, बिना बाधा के चलती रहें। अधिनियम की उद्देशिका में ही यह कहा गया है कि इसका उद्देश्य पशु अतिचार से संबंधित मौजूदा कानूनों को समेकित (consolidate) और संशोधित (amend) करना है। इससे पता चलता है कि वे विभिन्न स्थानीय और क्षेत्रीय कानूनों को हटाकर पूरे भारत में एक एकल कानून लागू करना चाहते थे।

पादटिकाओं में उल्लिखित व्यापक संशोधन यह दर्शाते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने इस कानून को अलग क्षेत्रो के लिए अलग बनाने हेतु प्रांतीय सरकारों को भी शक्तियाँ प्रदान की थी। इसीलिए जिस क्षेत्र मे अधिक राजस्व अथवा अधिक नगद फसलें होती थी वहा इस कानून का उपयोग कर गरीब पशुपालकों और किसानों पर और भी अत्याचार होते थे। केवल पशु भटकते हुए भी मिल जाए तो जब्ती के प्रावधान इस कानून मे हैं जो बताते हैं की कैसे भी हो गरीब भारतीयों से उनकी आजीविका छिन ली जाए और बाद मे उन्हे नगद फसलों के खेतों मे मजदूर बना दिया जाए। इससे प्रांतवाद को भी बढ़ावा दिया गया था यह भी स्पष्ट हो रहा हैं।

1.3 संशोधन हेतु सुझाव

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 1 के विश्लेषण और प्रस्तावित एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के आलोक में, यहाँ विस्तृत सुझाव दिए गए हैं:

1) कलोनीअल नीति का अंत

1871 का अधिनियम ब्रिटिश राज की राजस्व सुरक्षा की मानसिकता से बनाया गया था, जहाँ पशु को केवल एक वस्तु और पशुपालक को एक संभावित अपराधी माना जाता था। वर्तमान संदर्भ में, कानून का उद्देश्य दंड देने के बजाय जिम्मेदारी तय करना होना चाहिए। नए अधिनियम के नाम और विस्तार से ‘प्रेसिडेन्सी नगरों’ या ‘भाग ख राज्यों’ जैसे औपनिवेशिक वर्गीकरण को पूरी तरह समाप्त कर, इसे एक आधुनिक और एकीकृत पहचान देनी चाहिए जो शासक और शासित के भाव को समाप्त कर नागरिक जिम्मेदारी पर आधारित हो।

2) संविधान के साथ अनुरूपता

नया अधिनियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) और अनुच्छेद 48 (कृषि और पशुपालन का संगठन) के अनुरूप होना चाहिए। जहाँ पुराना कानून केवल फसलों की सुरक्षा (राजस्व हेतु) की बात करता था, नया कानून अनुच्छेद 51A (g) के तहत ‘प्राणियों के प्रति दयाभाव’ रखने के मौलिक कर्तव्य को भी समाहित करे। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कानून का उपयोग किसी भी वर्ग के विरुद्ध दमनकारी उपकरण के रूप में न हो।

3) ग्रामीण और शहरी जगहों पर उपयोगिता

पुराने अधिनियम का मुख्य केंद्र खेती था, लेकिन आज की वास्तविकता में शहरी क्षेत्रों में पालतू कुत्तों के हमलों और सड़कों पर घूमते आवारा पशुओ की समस्या विकराल है। नए अधिनियम का विस्तार संपूर्ण भारत के ग्रामीण खेतों से लेकर आधुनिक शहरी आवासीय सोसायटियों तक समान रूप से होना चाहिए। इसमें ‘संपत्ति’ की परिभाषा का विस्तार कर उसमें सार्वजनिक सड़कें, पार्क और शहरी घर शामिल किए जाने चाहिए ताकि शहरी निवासियों को भी सुरक्षा मिल सके।

4) स्थानीय संस्थाओं को इस मामले मे विवाद सुलझाने का अधिकार

1871 के कानून ने विवादों को अदालती प्रक्रियाओं में उलझा दिया था। नए सुझावों के अनुसार, ग्राम पंचायतों, वार्ड समितियों और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) को प्राथमिक स्तर पर विवाद सुलझाने की शक्तियां दी जानी चाहिए। स्थानीय संस्थाएं स्थिति को बेहतर समझती हैं, इसलिए छोटे विवादों के लिए उन्हें आर्थिक दंड लगाने और समझौते कराने का अधिकार देकर न्याय प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत किया जाना चाहिए। इससे न्याय भी जल्दी होगा और पशुओं को जल्द से जल्द उनके मालिकों को वापस देने मे सहायता होगी।

5) मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार मामलों के निपटारे के लिए समिति का गठन

पशु अतिचार के अधिकांश मामले पड़ोसियों के बीच होते हैं। इन मामलों को वर्षों तक अदालतों में खींचने के बजाय, मध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 के ढांचे का उपयोग करते हुए ‘पशु विवाद समाधान समितियों’ का गठन किया जाना चाहिए। यह समितियां एक निश्चित समय सीमा (जैसे 30 दिन) के भीतर मध्यस्थता के माध्यम से क्षतिपूर्ति तय करेंगी, जिससे आपसी वैमनस्य कम होगा और सामाजिक समरसता बनी रहेगी।

6) जब्त पशुओ का कल्याण

पुराने कानून में ‘कांजी हाउस’ केवल कैदखाने की तरह थे। नए अधिनियम में प्रावधान होना चाहिए कि जब्त किए गए पशुओं को स्वच्छ आवास, पर्याप्त चारा, पानी और चिकित्सा सहायता मिले। यदि किसी पशु को लापरवाही के कारण जब्त किया गया है, तो उसकी देखभाल का पूरा खर्च मालिक से वसूला जाना चाहिए। पशुओं के प्रति क्रूरता को रोकने के लिए इन केंद्रों का नियमित ऑडिट अनिवार्य किया जाना चाहिए।

7) आवारा पशुओ के टीकाकरण एवं नसबंदी

यह अधिनियम केवल पालतू पशुओं तक सीमित न रहे, बल्कि इसमें आवारा पशुओं के प्रबंधन को भी जोड़ा जाए। स्थानीय निकायों के लिए यह अनिवार्य कानूनी कर्तव्य बनाया जाए कि वे आवारा पशुओं का नियमित टीकाकरण और नसबंदी सुनिश्चित करें। इससे न केवल पशुओं की अनियंत्रित आबादी पर रोक लगेगी, बल्कि रेबीज जैसी बीमारियों से जनता की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।

8) आवासीय क्षेत्र मे पाले हुए जानवरों के कारण होने वाले नुकसान एवं हमले के लिए क्षतिपूर्ति

आज के समय में शहरी क्षेत्रों में पालतू जानवरों (जैसे कुत्ते) द्वारा किए जाने वाले हमले एक गंभीर समस्या हैं। नए अधिनियम में स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए कि यदि किसी पालतू जानवर के कारण किसी व्यक्ति को चोट पहुँचती है या संपत्ति का नुकसान होता है, तो उसका मालिक पूर्णतः उत्तरदायी होगा। क्षतिपूर्ति की राशि का निर्धारण नुकसान की गंभीरता के आधार पर तुरंत किया जाना चाहिए।

9) पुलिस एवं पशु मित्रों का हस्तक्षेप पशु और जनता की सुरक्षा के लिए

अतिचार के मामलों में पुलिस की भूमिका को दमनकारी के बजाय सुरक्षात्मक बनाया जाना चाहिए। साथ ही, मान्यता प्राप्त ‘पशु मित्रों’ और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को कानून के दायरे में शामिल किया जाए जो पशुओं को पकड़ने और उनके पुनर्वास के दौरान मानवीय दृष्टिकोण सुनिश्चित करें। यह समन्वय जनता के आक्रोश और पशुओं के प्रति हिंसा को कम करने में सहायक होगा।

10) आधुनिकीकरण

पशुओं की पहचान के लिए माइक्रोचिपिंग, जिओ-टैगिंग और डिजिटल पंजीकरण को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। एक राष्ट्रीय पोर्टल या ऐप विकसित किया जाए जहाँ हर क्षेत्र के पशुओं और उनके मालिकों का डेटा उपलब्ध हो। इससे अतिचार करने वाले पशु के मालिक की पहचान तुरंत संभव होगी और विवादों का निपटारा पारदर्शी तरीके से डिजिटल माध्यम से हो सकेगा।

11) लोगों के लिए रोजगार के अवसर

इस कानून के प्रभावी क्रियान्वयन से रोजगार के नए द्वार खुलेंगे। आधुनिक गौशालाओं, नसबंदी केंद्रों और पशु पुनर्वास केंद्रों में प्रशिक्षित पशु-सहायकों, प्रबंधकों और डेटा ऑपरेटरों की आवश्यकता होगी। स्थानीय स्तर पर ‘पशु सुरक्षा गार्ड’ और ‘पशु स्वास्थ्य निरीक्षकों’ की नियुक्ति से युवाओं को ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अर्थपूर्ण रोजगार प्राप्त होगा।

कृपया इस ब्रिटिश कालीन कानून को निरस्त करने हेतु नीचे दिए लाल बटन को प्रेस करिए। अपना मेल एप एवं अकाउंट सिलेक्ट करिए, मेल अपने आप टाइप होकर आ जाएगा। आपको केवल सेन्ड करना हैं।

1 thought on “पशु अतिचार अधिनियम, 1871: विश्लेषणात्मक आलोचना”

  1. इसमें पालतू और आवारा कुत्ते बिल्ली का कोई प्रावधान है क्या?

Leave a Reply to Anonymous Cancel Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top