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सेवा में,
1. प्रधान मंत्री, भारत सरकार, साउथ ब्लॉक, रैसिन हिल्स, नई दिल्ली।
2. विधि एवं न्याय मंत्रालय, शास्त्री भवन, नई दिल्ली।
3. पशुपालन एवं डेयरी विभाग, कृषि भवन, डॉ राजेंद्र प्रसाद रोड, रेल भवन के सामने, राजपथ क्षेत्र, केंद्रीय सचिवालय, नई दिल्ली, दिल्ली 110001
4. भारतीय जीव जन्तु कल्याण बोर्ड मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय (पशुपालन और डेयरी विभाग), 42 कि.मि.पत्थर, दिल्ली-आगरा राजमार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग – 2, ग्राम-सीकरी, बल्लभगढ़, फरीदाबाद, हरियाणा -121004 भारत,
5. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय निर्माण भवन, नई दिल्ली- 110011,
विषय: पशु अतिचार अधिनियम, 1871 में व्यापक संशोधन और आधुनिकीकरण हेतु प्रस्ताव। एकीकृत पशु अतिचार नियंत्रण, पशु स्वामित्व, पशु कल्याण, क्षतिपूर्ति एवं सामाजिक सुरक्षा अधिनियम के लिए सुझाव
आदरणीय महोदय/महोदया,
मैं इस पत्र के माध्यम से आपका ध्यान एक अत्यंत महत्वपूर्ण किंतु उपेक्षित विषय की ओर आकर्षित करना चाहती हूं, जो हमारे देश की ग्रामीण और शहरी दोनों व्यवस्थाओं को प्रभावित कर रहा है। 150 वर्ष से अधिक पुराने पशु अतिचार अधिनियम (Cattle Trespass Act, 1871) की समीक्षा और इसे वर्तमान संवैधानिक ढांचे के अनुरूप ढालना आज के समय की अनिवार्य आवश्यकता बन गया है।
पशु अतिचार की समस्या अब केवल कृषि भूमि या ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गई है। आज हमारे शहरों के आवासीय क्षेत्रों में भी यह एक गंभीर समस्या का रूप ले चुकी है। जब हम पशु शब्द का उपयोग करते हैं, तो इसमें केवल खेती से जुड़े मवेशी ही नहीं, बल्कि पालतू जानवर जैसे कुत्ते, बिल्ली, पंछी और शहरी क्षेत्रों में विचरण करने वाले आवारा पशु और पक्षी भी शामिल हैं।
पशु अतिचार के कारण समाज को बहुआयामी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है:
1. ग्रामीण क्षेत्रों में यह फसलों की बर्बादी, किसानों की आर्थिक हानि और पड़ोसियों के बीच हिंसक संघर्ष का प्राथमिक कारण है।
2. शहरी क्षेत्रों में खुले में घूमते पशु यातायात दुर्घटनाओं, गंदगी और सार्वजनिक असुरक्षा का कारण बनते हैं।
3. यह समस्या अक्सर दो समुदायों या पड़ोसियों के बीच विश्वास की कमी और दीर्घकालिक सामाजिक तनाव को जन्म देती है।
4. शहरों मे आजकल कुत्ते, बिल्ली और पंछी पालने का चलन बढ़ चुका हैं और ऐसे पालतुओं के मालिकों मे इन पशुओं के अतिचार के प्रति कोई जवाबदेही नहीं दिखती।
इस संबंध में मेरा प्रस्ताव है कि कानून को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर संशोधित किया जाए:
पशु मालिक की जवाबदेही: अतिचार की घटना के लिए पशु के मालिक को प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए। पशुओं का प्रबंधन न कर पाना केवल लापरवाही नहीं, बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक क्षति है जिसकी जिम्मेदारी मालिक की होनी चाहिए।
पशु कल्याण और आधुनिकीकरण: कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि सुधार होना चाहिए। जब्त किए गए पशुओं के लिए आधुनिक कांजी हाउस (Pound) की व्यवस्था, उनके स्वास्थ्य की देखभाल और उनके साथ मानवीय व्यवहार सुनिश्चित करना आवश्यक है।
संवैधानिक अनुकूलता: 1871 का यह कानून ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों पर आधारित है। इसे भारत के वर्तमान संविधान, नागरिकों के अधिकारों और आधुनिक प्राणी संरक्षण नियमों के साथ सामंजस्य बिठाने हेतु पुनर्लिखित किया जाना चाहिए।
ब्रिटिश काल के पुराने कानून आज भी न्याय प्रक्रिया को बोझिल और दीर्घ बना रहे हैं। इस अधिनियम का आधुनिकीकरण न केवल विवादों को कम करेगा, बल्कि पशुओं और मनुष्यों के बीच एक संतुलित सह-अस्तित्व का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।
संलग्न आलोचनात्मक विश्लेषण के माध्यम से मैंने इस समस्या के हर पहलू का विस्तार से विश्लेषण किया है। आशा है कि सरकार जनहित में इस विषय पर गंभीरता से विचार करेगी और आवश्यक विधायी कदम उठाएगी।
सादर,
एक आम भारतीय नागरिक
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१५० सालों से भी पुराना कानून अभी भी इस देश में क्यों है?