इंटरनेट पर अनुचित सामग्री के बढ़ते दुष्प्रभावों को रोकने के लिए भारत में विभिन्न कानूनी प्रावधान किए गए हैं। तकनीक की गति और कानून की व्यापकता के बीच हमेशा संघर्ष रहा है। डिजिटल युग के इन जटिल अपराधों को रोकने के लिए हमारा कानूनी ढांचा कैसे कार्य करता है और उसकी चुनौतियां क्या हैं, इसे समझना आवश्यक है।
१७.१ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक नैतिकता का संतुलन
किसी भी सभ्य समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक नैतिकता के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक होता है। इंटरनेट के आगमन के बाद अनुचित सामग्री के प्रसार को रोकना कानून के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, पोक्सो और नई भारतीय न्याय संहिता के माध्यम से ऐसे अपराधों पर नियंत्रण पाने का प्रयास किया जा रहा है। ये कानून केवल अपराधियों को दंडित करने के लिए नहीं हैं, बल्कि पीड़ितों को सुरक्षा प्रदान करने और डिजिटल दुनिया को सुरक्षित बनाने के लिए तैयार किए गए हैं। हालांकि, साइबर अपराधों के वैश्विक स्वरूप और अपराधियों द्वारा तकनीक के उन्नत उपयोग के कारण इन कानूनों के क्रियान्वयन में कई बाधाएं आती हैं। कानून की व्याख्या करते समय न्यायालय बार-बार व्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक नैतिकता की जांच करते रहते हैं। आज के समय में इस कानूनी ढांचे का अर्थ समझना सामान्य नागरिकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है।
१७.२ आईटी अधिनियम २००० का विश्लेषण: सामर्थ्य और कमजोरी
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) २००० भारत में डिजिटल क्षेत्र को नियंत्रित करने वाला मुख्य कानून है। इस कानून की धारा ६७, ६७ए और ६७बी मुख्य रूप से अश्लील सामग्री के प्रसारण से संबंधित हैं। इस कानून की मुख्य शक्ति यह है कि इसने पहली बार डिजिटल सबूतों को कानूनी मान्यता दी और इंटरनेट पर अश्लीलता के लिए सजा का प्रावधान किया। धारा ६७ए के अनुसार, यौन क्रियाओं को दिखाने वाली सामग्री को इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रकाशित करना एक गैर-जमानती अपराध घोषित किया गया है।
हालांकि, इस कानून में कुछ बड़ी कमियां भी हैं। जब यह कानून बना था, तब सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स का स्वरूप आज जैसा नहीं था। इसलिए एन्क्रिप्शन (Encryption) का उपयोग करने वाले ऐप्स पर नियंत्रण पाने में यह कानून अक्सर विफल रहता है। साथ ही, अश्लील साहित्य की परिभाषा इस कानून में पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं है, जिससे अक्सर कला और अश्लीलता के बीच अंतर करने में कानूनी पेच पैदा होता है। विदेशों में स्थित सर्वर से चलने वाली वेबसाइटों पर कार्रवाई करने के लिए इस कानून में सीमाएं हैं। इन कमजोरियों का लाभ उठाकर अपराधी कानून के चंगुल से बच निकलते हैं।
१७.३ पोक्सो (POCSO) अधिनियम: डिजिटल क्षेत्र में क्रियान्वयन
बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए २०१२ में पोक्सो (POCSO) अधिनियम बनाया गया। डिजिटल युग में बाल अश्लीलता (Child Pornography) एक भीषण अपराध है। पोक्सो अधिनियम के तहत न केवल बच्चों के अश्लील वीडियो बनाना, बल्कि उन्हें देखना या संचित करके रखना (Possession) भी गंभीर अपराध माना गया है। इस कानून के प्रावधान इतने कड़े हैं कि आरोपी को आसानी से जमानत नहीं मिलती और सजा की मात्रा भी अधिक है।
डिजिटल क्षेत्र में इस कानून को लागू करते समय सबसे बड़ी चुनौती बच्चों की पहचान छिपाना और इंटरनेट से उस सामग्री को स्थायी रूप से हटाना है। अक्सर बच्चे खुद ही इस जाल में फंसे होते हैं, ऐसे समय में उन्हें अपराधी न मानकर पीड़ित के रूप में देखना पुलिस के सामने एक चुनौती होती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) लगातार इंटरनेट पर नजर रखकर बाल अश्लीलता की सामग्री खोजता रहता है। हालांकि, डार्क वेब और निजी चैनलों के कारण पोक्सो को पूरी तरह लागू करना कठिन हो जाता है। फिर भी, बच्चों की सुरक्षा के लिए यह कानून एक मजबूत कवच के रूप में खड़ा है।
१७.४ भारतीय न्याय संहिता: नए अपराधों के लिए नए प्रावधान
भारत ने हाल ही में पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) को बदलकर भारतीय न्याय संहिता (BNS) लागू की है। इस नई संहिता में डिजिटल युग के नए अपराधों पर विचार करते हुए कुछ विशेष प्रावधान किए गए हैं। इसमें विशेष रूप से महिलाओं की सहमति के बिना उनके निजी फोटो या वीडियो वायरल करना (Revenge Porn) जैसे अपराधों के लिए स्पष्ट सजा का प्रावधान किया गया है। तकनीक का उपयोग करके किए जाने वाले धोखे और शोषण को इसमें अधिक गंभीरता से लिया गया है।
नए कानून में साइबर स्टॉकिंग और उत्पीड़न की परिभाषा को अधिक व्यापक बनाया गया है। अश्लील साहित्य का उपयोग करके ब्लैकमेल करने वाले अपराधियों पर कड़ी कार्रवाई करने के लिए इस संहिता में प्रावधान हैं। भारतीय न्याय संहिता का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि पीड़ित को न्याय दिलाना है। इसमें डिजिटल सबूत इकट्ठा करने की प्रक्रिया को अधिक तेज और पारदर्शी बनाने पर जोर दिया गया है। इन नए बदलावों से अश्लील साहित्य से संबंधित अपराधों को दर्ज करना और उनकी जांच करना पुलिस के लिए अधिक आसान होने की उम्मीद है।
१७.५ न्यायिक उदाहरण: न्यायालय अधिकारों और विनियमन का संतुलन कैसे बनाते हैं
न्यायालयों ने विभिन्न मामलों में अश्लील साहित्य के संबंध में महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि निजी जीवन में अश्लील साहित्य देखना अपराध नहीं है, लेकिन बाल अश्लीलता देखना या किसी भी प्रकार का अश्लील साहित्य प्रसारित करना अपराध है। न्यायालय हमेशा धारा १९ के तहत मिलने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धारा २१ के तहत मिलने वाले सम्मान से जीने के अधिकार के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करते हैं।
कई न्यायिक निर्णयों में टेक कंपनियों को ऐसे निर्देश दिए गए हैं कि उन्हें शिकायत मिलते ही २४ घंटे के भीतर अश्लील सामग्री हटानी चाहिए। न्यायालयों का मानना है कि तकनीकी कंपनियां केवल मंच होने का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। ‘श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ’ जैसे प्रसिद्ध मामले से इंटरनेट पर स्वतंत्रता की परिभाषा स्पष्ट हुई है। न्यायालय लगातार यह रेखांकित करते हैं कि डिजिटल स्वतंत्रता असीमित नहीं है और इसे दूसरों के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचानी चाहिए। ये उदाहरण भविष्य में कानूनों के क्रियान्वयन के लिए दिशा-निर्देशक साबित होते हैं।
१७.६ महिलाओं का अश्लील प्रतिनिधित्व निषेध अधिनियम: आज की प्रासंगिकता
महिलाओं का अश्लील प्रतिनिधित्व (निषेध) अधिनियम (Indecent Representation of Women (Prohibition) Act), १९८६ मूल रूप से विज्ञापनों, पुस्तकों और बोर्डों पर अश्लीलता रोकने के लिए बनाया गया था। आज के इंटरनेट युग में भी इस कानून की प्रासंगिकता बनी हुई है। महिलाओं को केवल उपभोग की वस्तु के रूप में दिखाने वाली सामग्री पर प्रतिबंध लगाने के लिए इस कानून का उपयोग किया जाता है। महिलाओं की प्रतिष्ठा को हानि पहुंचाने वाला कोई भी चित्रण इस कानून के अनुसार अपराध है।
समय के साथ इस कानून में सुधार करके इसमें डिजिटल माध्यमों को भी शामिल किया गया है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स या सोशल मीडिया पर विज्ञापनों में जब महिलाओं का अनुचित प्रदर्शन होता है, तब इस कानून का सहारा लिया जाता है। भले ही हमारे पास आईटी एक्ट है, लेकिन महिलाओं की अस्मिता की रक्षा के लिए यह विशेष कानून अधिक प्रभावी साबित होता है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य समाज में महिलाओं की छवि को स्वस्थ रखना है। आज के समय में जब अश्लीलता को अभिव्यक्ति के नाम पर बेचा जाता है, तब यह कानून मूल्यों की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होता है।

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