१. परिवर्तन की अनिवार्यता और वर्तमान विमर्श
भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) का आगमन एक ऐतिहासिक मोड़ है। यह संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) का स्थान लेती है, जो स्वयं ब्रिटिश भारत में अधिनियमित ‘कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर, 1898’ की पुनरावृत्ति थी। यह पुस्तक इसी मौलिक वैधानिक परिवर्तन का एक बहुआयामी और व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
इस पुस्तक का केंद्रीय उद्देश्य केवल नए प्रावधानों का दस्तावेजीकरण करना नहीं है, बल्कि प्रत्येक धारा और अध्याय का गहन तुलनात्मक, ऐतिहासिक और आलोचनात्मक मूल्यांकन करना है। यह कार्य इस विश्वास पर आधारित है कि किसी भी कानून की वास्तविक आत्मा को समझने के लिए, उसके कानूनी पाठ के साथ-साथ, उसके उद्गम, उसके द्वारा प्रतिस्थापित किए गए कानून की प्रकृति और उसके कार्यान्वयन की संभावित चुनौतियों को समझना अनिवार्य है।
२. तुलनात्मक विश्लेषण: सीआरपीसी से बीएनएसएस
बीएनएसएस के कुल 531 प्रावधान हैं, जबकि सीआरपीसी में 484 धाराएँ थीं। यह संख्यात्मक वृद्धि ही बताती है कि यह केवल नाम परिवर्तन या मामूली संशोधन नहीं है, बल्कि एक व्यापक पुनर्संरचना है। इस पुस्तक का पहला और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बीएनएसएस के प्रत्येक प्रावधान की तुलना सीआरपीसी के संबंधित प्रावधान से करना है।
इस तुलना में, हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि:
- क्या परिवर्तन केवल शब्दावली या संख्यात्मक क्रम तक सीमित हैं?
- क्या किसी नए प्रावधान से प्रक्रिया में गुणात्मक सुधार आया है?
- क्या किसी प्रावधान को केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए बदला गया है, या यह संवैधानिक न्याय और मानवाधिकारों के सिद्धांतों को मजबूत करता है?
- हम पुलिस हिरासत की अवधि के विस्तार (बीएनएसएस की धारा 187), कुर्की के प्रावधानों को कठोर बनाना, और अनुपस्थित व्यक्तियों के विचारण (ट्रायल) जैसे नए प्रावधानों पर विशेष ध्यान देंगे। प्रत्येक विश्लेषण स्पष्ट रूप से बताएगा कि पुराना कानून क्या था, नया कानून क्या है, और यह बदलाव क्यों किया गया या क्यों नहीं किया गया।
३. औपनिवेशिक नीति की निरंतरता और अलगाव
आपराधिक प्रक्रिया संहिता का उद्गम ब्रिटिश राज के दौरान भारतीय जनता को नियंत्रित करने की नीति में निहित है। दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की कई धाराएँ प्रत्यक्ष रूप से एक औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाती हैं, जहाँ राज्य की शक्ति को नागरिक स्वतंत्रता पर वरीयता दी जाती थी। सरकार का दावा है कि बीएनएसएस इस औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति दिलाएगा।
इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण खंड प्रत्येक प्रावधान के बाद यह विश्लेषण प्रस्तुत करेगा कि उस विशिष्ट नियम का मूल ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति क्या थी, और क्या बीएनएसएस ने वास्तव में उस विरासत को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है। उदाहरण के लिए:
- क्या एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया में पुलिस के विवेक को सीमित किया गया है?
- क्या बीएनएसएस में धारा 178 और निवारक निरोध से संबंधित प्रावधानों में कोई ऐसा बदलाव आया है जो पुलिस को कम मनमानी शक्तियाँ देता हो?
- यह खंड स्पष्ट करेगा कि संहिता कहाँ ‘भारतीय’ न्यायशास्त्र को अपनाती है और कहाँ, संरचनात्मक या वैचारिक कारणों से, औपनिवेशिक प्रशासनिक नियंत्रण की परछाई अभी भी बनी हुई है।
४. क्रियान्वयन की चुनौतियाँ और अप्रभावीता के कारण
किसी भी कानून की सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। बीएनएसएस में कई प्रगतिशील प्रावधान हैं, जैसे कि ई-एफआईआर, समन की इलेक्ट्रॉनिक डिलीवरी, और विचारण की ऑडियो-विजुअल रिकॉर्डिंग। हालांकि, ये प्रावधान भारत के न्यायिक बुनियादी ढांचे की वास्तविकता के सामने गंभीर चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।

इस पुस्तक का सबसे आलोचनात्मक हिस्सा अप्रभावीता के कारणों की पहचान करना है। हम यह जाँच करेंगे कि:
- देश के ग्रामीण न्यायालयों और पुलिस स्टेशनों में आवश्यक डिजिटल और तकनीकी अवसंरचना की कमी इस संहिता के प्रावधानों (जैसे वीडियोग्राफी या ई-समन) को कैसे अप्रभावी बना सकती है।
- नए प्रावधानों की भाषा में निहित अस्पष्टताएँ क्या हैं जो कानूनी व्याख्याओं में विरोधाभास पैदा कर सकती हैं और उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय में अनावश्यक मुकदमेबाजी को जन्म दे सकती हैं?
- संहिता पीड़ित को अधिक अधिकार देती है, लेकिन क्या पुलिस और अभियोजन पक्ष के रवैये में आवश्यक परिवर्तन आए हैं? क्या ये प्रावधान केवल कागज़ पर ही प्रगतिशील बने रहेंगे?
- क्या जाँच एजेंसियों को दी गई नई शक्तियाँ, जैसे कि विस्तारित पुलिस हिरासत, कहीं नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के सिद्धांतों का उल्लंघन तो नहीं करती हैं, जिससे न्याय मिलने की प्रक्रिया बाधित हो सकती है?
५. निष्कर्ष: न्याय के नए युग की नींव
यह पुस्तक भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 को एक ऐसे महत्वपूर्ण कानूनी उपकरण के रूप में देखती है जिसका उद्देश्य न्याय को त्वरित, पारदर्शी और सुलभ बनाना है। यह न केवल कानून का विश्लेषण करती है, बल्कि यह भी इंगित करती है कि यह कानून कहाँ सफल होता है और कहाँ इसे सुधार की आवश्यकता है।
हमारा विश्वास है कि यह गहन, तुलनात्मक और आलोचनात्मक अध्ययन भारतीय आपराधिक न्याय के विद्वानों, अभ्यासकर्ताओं और नीति निर्माताओं के लिए एक अमूल्य संसाधन सिद्ध होगा। यह पुस्तक केवल जानकारी प्रदान नहीं करती, बल्कि एक आवश्यक विमर्श शुरू करती है कि भारत की आपराधिक प्रक्रिया को वास्तव में भारतीय, आधुनिक और न्यायसंगत कैसे बनाया जाए।
यह पुस्तक न्याय की उस नई नींव को समझने का एक प्रयास है, जिस पर भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक प्रभावी और मानवाधिकार-अनुकूल आपराधिक न्याय प्रणाली का निर्माण किया जा सके।
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